पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६३३

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है जिसने अपनी पाँचौ इन्द्रियोंको जीत लिया है। जो मास्तिक, जिसका संभय दूर नहीं पा , जो लोभी, क्रूर, दाभिक वा विषयासतर पर बड़ों बार निरर्थक तर्क करता है, उसे तोधका कमा महो मिलता। तोर्यस्नान करते हैं, वे कभी भी पापोंसे मुक्त नहीं होते। जो शोतोष्णको सहकर धोरतासे विधिपूर्वक तोर्थ- ओवल शरीरका मैल दूर करनेसे हो मनुष्य निर्मल नहीं यात्रा करते हैं, वे स्वर्ग गामो होते है। हो जाता, मनसे मलको निवास देनेमे हो मनुष्य यथार्थ तीर्थ यात्राके लिए जानेवाले व्यक्षिको प्रथमतः घरमें में निर्मल हो सकता है। तोर्थ यात्राका वास्तविक संयत हो कर उपवास करना चाहिए । पोछे यथामति उहेश चित्तका यदि प्राप्त करना है। यदि पन्तःकरणका गणेश, पिटगण, ब्राह्मण भोर साधु पोको पूजा करना भाव पवित्र नपा, तो दान, तप, या, शौच, ही सेवा, उचित है । तदनन्तर पारण करके नियम पवलम्बनपूर्वक सत्काथा श्रवण पादि सदनुझान करने पर भी कोई फम्न मानन्दसे यात्रा करनी चाहिए। तोयं यावासे लौट नहीं होता । मनुष्य अपनो इन्द्रियोंको जय करके चाहे कर पुनः पितरों को पूजा को जाता है। ऐसा करनेसे नहाँ क्यों न बैठा, वहीं उसके लिए कुरुक्षेत्र, मैमि. उसका फल मिलता है। तोर्थ में ब्राह्मणको परोषा न षारण्य और पुष्कर पादि तीर्थ खान है। जो लोग करनो चाहिए। कोई पब मांगे तो उसे यथालि देना राग देष मादि मलोंको दूर करके विशुभानरूप जल- चाहिए और किसी पर क्रोध न करना चाहिए। तिल- में मान करते हैं, नहींको उत्कष्ट गति प्रास होतो है। पिष्ट और गुड़से वाह भी करना पड़ता है। बारम पर्व खावरतोयं-गङ्गा पाटि पुण्यप्रदेशको स्थावर प्रदान और पावाइन करना उचित नहीं। काल विपक्ष तीर्थ कहते हैं। जैसे शरीरका अवयव विशेष पवित्र हो या न हो, किसी तरहका विज्ञान रहनेसे हो बार माना जाता है, उसी तरह पृथिवोके भी कुछ प्रदेश पुण्य- पोर तर्पण करना चाहिए। प्रसाधोन तीर्थ में जाकर तम माने जाते है। स्थावर और मानसले में जो लोग यदि बान किया जाय, तो उसका फल प्राज होता है, नित्य अवगाहन करते है, हमको उत्साट फलको प्रालि किन्तु तो यात्राके निमित्त सान करनेसे पल साम होती है। (काशीख.) नहीं होता। तोथ यात्रासे पापात्मानों के पाप नष्ट होते तीर्थ यात्राका जो फल होता है, वह फल विपुल और यथा-सम्पत्र व्यक्तियोंको यथोक फल प्राश होता दक्षिणाके साथ बहुतर याहारा भो नहीं होता। जो है। जो दूसरे के लिए तीर्थ यात्रा करते , उन पोड़म बैग लोग हाथ, पर पौर मनको मयत करके विद्या, तपस्य फल प्राप्त होता है और जो प्रसाधीन यात्रा करते हैं, पौर कीर्ति सम्पब हो चुके हैं, उन्होने यर्थाथ में तीर्थ फल उनको पाधा फल प्राप्त होता है। जिमके लिए कुमको प्राप्त किया है। प्रतिग्रहसे निहत्त हो कर जो व्यक्ति प्रतिकति बना कर उसे तोथ में खान कराया जाता है। जिस किसी तरह सन्तुष्ट रहता है, इसोको तीर्थका उस व्यक्तिको अष्टमांश फल प्रास होता। तीर्थ फल मिलता है। जो व्यक्ति दाधिक नहीं, जिन में उपवास और मस्तक-मुण्डन करना चाहिये। भारम्भ निष्फल हो चुके हैं, जो सम्म पङ्गोंसे निवृत्त, तीर्थ में मस्तक मुडानमे थिरोगत समस्त पाप नष्ट होते कोपरहित, जिसेन्द्रिय, सत्यवादो, स्थिरवत और है। जिस दिन तीर्थ में जामा हो, उसके पहले दिन उप- समस्त प्राणियोको अपने समान देखते, वे ही तीर्थ का वास करना चाहिये पोर तीर्थ में पहुंची तोबार करना फल भोगते हैं। इन्द्रियोंको मयत करके, श्रद्धा पोर चाहिए । काशो, काचो, माया, पयोध्या हारका, मधुरा धोरताके साथ तीर्थ भ्रमण करनेसे पापो मनुथ विराज और पवन्ती ये सात पुरी मोचपद एवं गोयल और हो जाते हैं। माधुपोंकी तो बात हो क्या ? सौर्थानुमरण केदार उनसे भी ज्यादा मुक्तिप्रद । करनेसे तिथं गयोनि वा कुदेशमें जब नहीं होता । तीथ तीर्थराज प्रयागसे पविमला छेत्र विशेष मुक्तिप्रद भ्रमणकारोश्यति दुःखी नहीं होता और अन्त में स्वर्गः । प्रविमुक्तक्षेत्र में जो निर्वाण वा मुक्त होते हैं, वे फिर बासो होता है। जिसकी बानी, जो पापामा और कहीं भी जमा नहीं क्षेत। पचान्ध जितने भी मुधिषित Vol. Ix. 156