पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६७३

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विख्यात हो गया । कलिङ्गाराज रम गानकी कथा सुन- यंगने नारदका पाक्षेप सुनकर कहा, 'नारद तुम पब- कर यहां आये और उनसे बोले, कौशिक ! त म सहचरों- तक गौतथास्त्र में पारदर्शी नहीं हुए हो। तुम्ब रुके के साथ मेरा यशोगाम करो। यह सुन कर कौशिकने सदृश होने में पभी बहुत विलम्ब है। जब मैं वणरूपमें कहा,-'महाराज ! मेरी जिहा या वाक्य कभी भी अमरण करगा तब तुम्हारे लिये गानशिक्षाका उपाय हरिके सिवा किसो दूम का यहां तक कि इन्द्रका भो कर दूंगा। बाद नारदने. जब सम्पर्ण रूपसे गीत स्तव नहीं करता।' बाट उनके शिथोंने भो राजासे इस अधिक्षत किया, सब तुम्ब रुके प्रति उनका हेषभाव तरह कहा। इस पर राजाने अत्यन्त कम हो कर अपने हुा। (भद्भुतराम) भृत्योंसे कहा 'तुम लोग अत्यन्त उच्चस्तरसे मेरा गुणगान तुम्ब स्वीणा-सका प्रचलित नाम तम्ब ग या तान. करी, जिससे इनका गान कोई सुन न सके ।' भृत्योंके पुरा है। यह एक सूखेहुए गोल कह के खोनले और एक मान प्रारम्भ करने पर उन समस्त ब्राह्मणों और कोशिकने बामके डंडेसे बनता है। तुम्बुर गन्धर्व म यन्त्रका अत्यन्त दु:खित हो कर्णरोध किया तथा काष्ठा, सृष्टिकर्ता है, रमोसे इसका नाम तुम्बुरुवोणा पड़ा द्वारा एक दूसरेका कर्ण भेद किया। पीछे गजाने बल है। गीत और वाद्यके समय सुर-विराम निवारण के लिये पूर्वक गाममें नियुक्र किया। इस भयमे सबों ने अपना इस यन्त्रका प्रयोजन पड़ता। इसमें दो लोहे और दो अपना जिताय छेदन किया। राजाने इस व्यापारसे पोतलके तार लगे रहते हैं, इसका मुर बन्धन बामसे इस अत्यन्त कुछ हो कर सभीको देशसे निकलवा दिया। वे प्रकार है- सबके सब उत्तरको ओर रवाना हुए। उन लोगोंका पि-लौ-लौ-पि भोग शेष हो गया। इसके बाद हरिने उन लोगोको अपना पाखंद बनाया। कोशिक दिग्वन्धु नामक गणा- धिप हुए । उस समय कौशिक प्रोति-उत्पादनके लिये सानपूगमें जो चार तार रहते हैं, वे सी प्रकार मधुराक्षरदक्ष, वीणगुणताव गीत-विशारदोंके गान द्वारा लगाये जाते हैं। विष्णु-मभामें अब त महोत्सव भारम्भ हुा । इस सभामें तुम (सं० वि०) तुम प्रेरणे भापरणेच रक । महात्मा तुम्बरू और कोशिकने प्राण भर कर हरिजीका १प्रेरक, भेजनेवाला । २ हिंसक, मारमेवाला। गुणगान किया। गान सुन कर नारदके मनमें प्रत्यन्त तुम्हारा (हिं. सवं . ) 'तुम' का सम्बन्ध कारकका रूप । क्रोध हो पाया। नारद ऋछ हो कर तुम्बरको जोतके तुम्हें (हि.स.) तुमको। लिये विष्णु के उपदेशानुशार गान शिक्षार्थ गानबन्धु तुरंज (फा० पु.) १ चकोतरा नोबू । २ तिजोरा नामक सल के खरके निकट गये। उनके समीप एक नोबू ।पान या कलगीके आकारका बूटा जो बगरखों- हजार वर्ष गान सोख कर नारदके मन में कुछ अहङ्कार के मोटों और पीठ पर तथा दुशालेके कोनों पर बनाया उत्पन्न हुआ, बाद तुम्वरूको जीत करने के लिये उनके जाता है। घरके निकट पाकर उन्होंने देखा कि यहाँ बहुतसे विक तुजबीन ( का. स्त्रो०) खुरासान दश लेनेवालो ताकार स्त्रीपुरुष रहते है। उनमेंसे एकके भो प्रकृत एक प्रकारको चोमी। यह ज टकटारके पौधों पर प्रोस- अङ्ग नहीं है। नारदने उन लोगों को इस विक्षतावस्या के साथ जमतो है। देख उनसे परिचय पूछा। वे बोले कि हम लोग राग तुरंत ( हिं० वि० ) पत्यन्त योन, झटपट, फोरम । और रागिणी है। आपके गानसे हम लोगोको यह तुरंता (हि.पु.) गांजा। दुरवस्था हुई है । तुम्ब रु गानसे हम सबको सस्य कर तुर (म. वि. ) तुरक। वेगविशिष्ट, वेगवान्, जल्दी हेंगे. सोसे हम लोग यहां पाये। नारद इस बातमे चलनेवाला। पत्यास लज्जित होकर नारायण के निकट गये। नाग तुर (हि. पु० ) १ जुलाहे को वह लकड़ी जिस पर वे Vol. I. 166 .