पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७१७

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७० १मोलले १०००१२०० मरेल यर्यन्त हो जाता है। इन विस्टत रहता है। सखुवास गमनपथके साथ समझोण समस्त प्रकाण्ड चूर्ण वायुके केन्द्र के निकट वायु प्रायः करके प्रवस्थान करता है। उत्ताभास जितना लम्बा खिर रहती है, किन्तु परिधिकी तरफ वायुप्रवाह भोषण मेता है उतना ही सफानवा तेजःपधिक होता है। बहत तूफान रूपमें प्रवाहित हो कर वृक्ष पोर मकान मादिको स्थानों के पक्षालब्ध पूर्ण वायु विषयक कितने हो नियम भन्म और चरचार कर डालता है। प्राक्षततत्वज्ञ नीचे दिवसाये जाते है। पति ने निर्णय किया है, कि हम लोग जिन बड़े. १। झझावायु निरक्षदेशसे दोनों क्रान्तिवन पर्यन्त बड़े तूफानों को देखते हैं वे एक एक प्रकाण्ड पूर्ण वायु मध्यवर्ती प्रदेशमें निरक्षरेखाके निकटवर्ती वाणिभ्य. माव है। ये समस्त चूर्ण वायु १मे १५०० मोल विम्त वायु प्रवाह के प्रारम्भस्थलमें शोतकाल के समय किम्बा स्थान तक फेल कर घूमने घूमते गमन करती है। उसमें मोसमवायुके परिवर्तनके ममय उत्पन होतो । विषुव ४०० से १.. मोल ब्यास युक्त घूर्ण वायु हो अधिक है। प्रदेशमें कभी तूफान नहीं होता है। कभी कोई तूफान इस प्रकार एक एक घूर्ण वाग्नु ८१० पर्यन्त विद्यमान विषुवरेखाके पारमे नहीं देखा जाता, वरसको दोनों रहती है तथा मौ मौ मील स्थान के ऊपर हो कर गमन दिशाओंमे एक हो द्राधिमा परस्पर १०१२ पंधक करती है, बंगरेजीमें इन मनको माईक्रोन (Cyclone) मध्यमें तूफानका एक हो समयमें प्रवाहित होना सुना कहते है। पन समस्त पूर्ण वायुको परिधि हो भाटिका गया है। दोनों गोलाईमें पूर्ण वायु प्रथम भाग चक्र है। केन्द्र स्थल बिलकुल शान्तभावापन होता है। पश्चिमाभिमुख पोर शेष भागमें पूर्वाभिमुख गमन करतो उसके चारों ओर चक्राकारमे हफान प्रवाहित होता है। है। सर्वत्र हो उनकी गति निरक्षदेशसे वक्राकार हो धूर्ण वायु चलनेके ममय एक हो कालमें अनेक स्थान में कर मेरुको तरफ हो जाती है। विभित्र मुखी तूफानको उत्पन्न करते करते प्रयमर होतो २। उनको गति हित्वभावापन है अर्थात् केन्द्र के चारों है। पहले ही कहा जा चुका है, कि केन्द्र स्थालमें वायु पोर झटिकाचक्र प्रवाहित रहता है, फिर रमो पकार पायः निश्चल रहती है, सुतरां जिम स्थानक अपर हो पावर्सन करते करते घ वाय, अयसर हो जाता है। कर केन्द्र जाता है, वहाँ पहले एक भोर मे सफान बनता उत्तर गोलाई में यह पावसन दाहिनो पोरसे वायीं तरफ है। पोछे कुछ साल शान्त रह कर फिर ठोक विपरीत अर्थात् घडोको सर जिस तरह घूमतो है, उसके ठोक दिशासे तुफान आता है। विपरीत दिशाम रहता है । दक्षिण-गोलाईमें यह पाव. जिस स्थानके अपर को कर केन्द्र जायगा, वहां पहले सन घडोको सूई के अनुरूप होता है। पौर अन्तमें दो विपरोत दिशामें तूफान होगा तथा बोचमें सभी पूर्ण वायुका गमनपण एक. विस्तोण क्षेषणोको केन्द्र जाने के ममय वह शान्त रहेगा। यदि एक घूर्ण नाई है। इसका शिर पविदिशा में तथा दोनों बाहु वाय का केन्द्र मन्द्राज के उत्तर हो कर पश्चिमाभिमुख पूर्व दिशामें विस्तृत रहती है। यह शिर उत्सर-गोसाई में जाय, तो वहां परले उत्तर-पश्चिमसे तूफान बहेगा, बाद प्रायः ३. और दक्षिण गोलाई में प्राय २६ रेखाओं को किसो वह वायु पश्चिम और क्रमशः दक्षिण-पश्चिमसे बह कर याम्योत्तरेखाको स्पर्श करता रहता है। शेष हो जायगो। शसचराचर निरक्षरेखाके निकट विस्तीर्ण पणो. तूफान एक ममयमें जितने स्थानमें फैल कर रहता के पूर्व प्रान्त में सूको प्रस्फट क्रान्तिको (Declination है, उसोको हूफान अथवा पूर्ण वायुका पाकार कह of the sun ) समपरिमाण पक्षरखाकी झंझावात सकते है। यह व्याप्तस्थान ठोक गोल नहीं होता। कितने उत्पन होती है, उसी प्रकार पश्चिमको पोर जात जाते ही असम वृत्तके पाभासको नाई है। खुद्र व्यासको अपेक्षा अन्तमें शोष स्थानका प्रदक्षिण करके पूर्वाभिमुख गमन बड़ा व्यास दो तोन-गुना बड़ा होता है। जिस दिशामे करती है। भागमे या कामश: निरक्षरखासे दूर पूर्ण वाय, गमन करता है, उसो दिया में गुरु व्यास चली जाती है। चोन-सागरके पनेक तूफान रसके तोक Vol. IX. 177 .