पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७४०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


७२८ तेजपत्र-जवान् पत्तियांशष्यवत होती कीम लोग मूवच्छ, प्रचुर रुपये खबर द पोर गिरना पड़ा अपर सोहा, उदरामय, पेटव्यथा, मर्पदंशन पोर अफीमके तोथ हारों के सहपसे कई एक सुन्दर और पुरम जन- विषमें इसकी पत्तियों का प्रयोग करते । एमके फल मन्दिरोंका निर्माण कर गये है। बाबू और वस्तुपा देगे। पोर फल सवा के बदले व्यवहात होते । और तलसे तेजपुर-१ पासामके दरंग जिलेका प्रधान नगर पोर सिर-दर्द. अधकपारी जाती रहती है। पीपल, मधु और सदर। यह पक्षा. २६३७१५० और देखा. तेजपत्तोंका पवने मेवन करनेसे खाँसी, मरदी और ८२५३ ५ पू.में अपुबके उत्तरो बिमार भरखो और खॉम दूर हो जाती है। यदि प्रमवका साथ दूषित हो ब्रह्मपत्रक साम स्थान पर अवस्थित है। . . कर पधिक गिरने लगे. तो इसके पत्तोंका चर्थ खिला इस नगरको बनावट पच्छो है दो शेटे छोटे पहाड़ों देनेसे अच्छा हो जाता है । वैद्यगण भी बहुत से ज्वरोंकी के मध्य समतल क्षेत्रके अपर नगर बसा हुआ है। यह भोषध रसकी पत्तियों का व्यवहार करते हैं। जापान बहुत प्राचीन नगर है। इसके पास ही शिल्पन पुण्ययुम में एक श्रेषीका सेजपात है जिसके मूलतन्तुसे यथेष्ट प्राचीन देवालयका भग्नावशेष देखा जाता है। किमी कार निकलता है। किसी प्राचीन भन्न मन्दिर में शिलालेख है। देवषो बहुतोका मत है, कि यह पेड़ भारतवर्ष का पादिम मुसलमानों के उत्पातसे इन मन्दिरीका सत्यानाश हो पड़ नहीं है। पहली पहल चीन देशसे यह कम देशमें गया है। पाया था। पौर अभी इसका प्रचार बहुत दूर तक हो प्रवाद है-यहां वाण राजाके माथ श्रीक्षणका युद्ध मया है। किन्तु यह ठीक प्रतीत नहीं होता। क्योंकि हुपा था। यहां राजकीय कार्यालय, कारागार, अंगरेजी सेजपत्तों का व्यवहार भारतवर्ष में बहुत प्रलेसे था। विद्यालय और दातव्य चिकित्सालय है। दिनों दिन रस देसाके जन्म पहले से भो रसके पत्ते भारतवर्ष से यूरोपमें गहरको सबति देखो जाती है। बाणिज्य-व्यवसाय भो भेजे जाते थे। शिनीमे मालवथम ( Matabathrum ) दिन दूना और रात चौगुना बढ़ रहा है। नामक जिस पाका उल्लेख किया है, वही भारतीय बंबई के अन्तर्गत महोकांटेका एक छोटा राज्य तमान पत्रम् शब्दका अपनश है। चीनमे प्रति वर्ष तेजयल (हि.पु.) हरिद्वार तथा उसके पास पास के लगभग ढाई लाख रुपयेको छास और परितयां इस देश में ___प्रान्तों में अधिकतामे होनेवाला एक वांटेदार जालो पाती पोर परब, पारस तथा तुमक देशों में प्रायः च। रसका छिलका लाल मिर्च की तरह बहुत घर- साखरुपयेका द्रवा भेजा जाता है। परा होता है। पहाड़ी लोग दाल मसाले पादिमें रसको संजपव (सकी तेजयति तिज णिच-पच तेजपाल जड़ मिर्च की तरह काम लाते हैं। इसकी जड़को मंशा मामखांत पन. तेजाता । पर्याय-न्ध छाल चबानेसे दाँतका दर्द जाता रहता है। गुण- जात, प. पत्रक, खपत्र, वगा, भा, चोच. सत्कट। यह गरम, चरपरा पाचक, कफ और वातनाशक तथा गुण- वायु, पर्श, मास और पचिनाशक खास, साँसो, हिचको, और बवासोर पादिका नाशक है। । भावप्रचालक मतानुसार-या लघु, उष्ण, कट. तेजल (सं• पु.) तेजसि भतिशयेन पालयति शावका. खाद, तित, काम, पित्तल, कफ, वात, कगड, पाम और निति तेज-बाहुलका बालच । कपिञ्जल पक्षी, चालक, पचिनामक है। तेजपत्ता देखो। पपोस। तेजपाय- गुजरके एक विलास मन्चो । पखराजके पुत्र, तेजवती (सं० सी.) तेजोवती, तेलवल । वसंपासके भाई, चौलुक्यराज वोरधवल के बन्धु और तेजवन्त (हि. वि०) तेजवान देखो। 'प्रधान मन्त्री। पनकी सोका नाम था अनुपमा और तेजवान् ( वि.) १ जत्रो, जिसमें तेज हो। २ पुका लावण्यमि। जैनधर्म के ये प्रधान उत्साह- चोर्यवान्। १ बसी, ताकतवाला। । कान्तिमान, • दाता थे। .१५ वीं शताब्दी में तेजपासपोर बखपाल चमबोला ।