पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७५१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


देसी भौ पन्चान्य तैलियों से श्रेष्ठ माने जाते हैं। ये लोग | गया है। पब ये गाडी चलाते तथा सेतोबारी पोर पपनको विश वैश्य समझते हैं। मजदूरो करते है। बहुतने मांस-मच्छो पोर शराव भो बंजालमें स्यानभेदके कारण भोग भो अनेक श्रेणिया | पोते . पाई जातोपोर सनमें बहुतसो ऐमो भी हैं, जिनमें पहमदाबाद जिलेको तेलोजाति. कुनयो जातिका परस्पर व्याह यादो नहीं होती। पंच समझो. जाती है। तलकारका व्यवसाय करने के दाक्षिणात्यमें सतारा जिले में नैलियों के दो विभाग कारण हो शायद ये पसित हुए होंगे। इनमें दिवाकर, है-एक लिङ्गायत और दूमरा मराठा। इन दोनों में दोलसे, गायकवाड़, खोखर, मंगर, मेजदार, बाठेवाड़ परस्पर व्याशादा वा खाना-पोना आदि नहीं होता। पर बलमुजकर-ये पाठ विभाग। 'नमें परसर ये लोग तिल, नारियल पोर सनके बोजमे लेल निकालते एक दूसरेसे यादो-व्याज नहीं होता। ये लोग चोटो है तथा तेल और खलो बेचा करते हैं। लिङ्गायत लोग सिवा तमाम मस्तक मुंडाते है, पर दादो पोर महेनी देवताको नहीं पूजते। जाम ब्रामण लोग इनके मुड़ाते। इनका व्यवसाय पूनाके तेलियों के समान है। पुगैहित है। मराठा तेली महाराष्ट्रीय हिन्दू है। लिङ्गा ये वयव है पोर मोयो ब्रामण लोग इनका पौरोहित यतों के विवाह को रोति प्राय: कुन बयों के ममान है। करते है। ये खोग रजखया स्त्रोको चार दिन तक न छते। प्राचीन हिन्दू-गास्त्रो में तेलोके विषय में इस प्रकार इस जिले के तेलोलोग मुरदेको गाड़ते हैं और दश पाया जाता है। मनुसहितामें लिखा है .' दिनका शौच मानते हैं। ये जातीय व्यवसायके सिवा "सूनाचक्रध्वजवता वेशेन व व सोषिताम् ।" (७८४) अन्य किसी प्रकारका रोजगार नहीं करते। अर्थात् जो पशमारणमांसविनायजीवो', जो पूना जिलेके तेन्नी शनिवारो, मोमवागे, परदेशी सिलादि बौज़ो से तेल निकाल कर बचते. पर्वात और मिलायसमचार श्रेणियों में विभतशनिवारो सालक है, मयविकता, योण्डिका पोर वेश्याको पायले पौर मोमवारी तेली उक्त दो वारोको काई भी काम जो जीविका विद करते है, उनसे दान लेनेवा नहीं करते। इन लोगों का आचार कुनबियों जैसा निषेध है। कारण-'दशसूनासम व पशवकसमोध्वजः" है । परस्पर-खाना पोना वा भादो-व्याह , नहीं होता। (मम ५।८५) अर्थात् दशसूनाबान वा मांसवितामे. प्रत्ये कके घर 'धाना' ( कोरल) चलता है; सभो भट्ट- जो दोष है, वहो दोष चकवान वा तेलिकमें। परिच्छदधारी हैं। स्त्रियां पति सुन्दरो होतो. याज्ञवल कासहितामें लिखा- माथे पर फल नहीं लगातौं। ये लोग नारियल, सिल, "पिशुनातिनोश्चय तथा चाक्रिकवन्दिताम् । चोना-बादाम ( मंगफलो ), सरसों आदिका तेल निका एषामन न भोकव्य सोमविक्रयिणस्तथा।" (६५) लते हैं। इनमें स्मात्त तथा गणपति मारुति प्रादि अर्थात् पिशन, मिथ्यावादी, चामिक वा नलिक, गृहदेवताभो । देशोय ब्रायणगण इनका पौरो. बन्दी पौर सोमविक्रायो, इन लोगों का पवनसामा. हित्य करते हैं। बच्चा होन पर पांचवें दिन ये 'सद- . चाहिए। वाई' (षष्ठो ) देवीको पूजा करते है। १२वें या ..३व विशुसंहितामें इस प्रकार लिखा- ' दिन बच्चका नामकरण होता है। रजोदर्शनसे पहले वजीविशोण्डिकत लिकचलनिर्गेजकाच ।" ( ५२१५) सड़कियों का विवाह नहीं होता पोर पुरुषांका विवाह पर्थात् चमार, शोणिक, तैलिक और बसपोतकारी २०२५ वर्षको अवस्थामें होता है। विधवानोंका (धोबो ) इन लोगों का पद पाया। .. धरजा भी इनमें प्रचलित नहीं है। ये मरदको जलाते तेलु (म.पु.) उपमेद, एक राजाका नाम। . पोर दश दिनका प्रशौच मानते हैं। किराभिन तेल- तेलोचो ( हि• स्त्रो०) तेल रखनेको छोटो प्याली, प्रचारसे इनका जातीय व्यवसाय बिलकुल नष्ट हो मलिया।