पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७६१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


पर उनको मौमामा कर देते थे। कोशिश करके १८०५ यताब्दीम, कापीधाममे पचगक गर्भम जो कुछ रहें खानेकी दिया जाता था, उमे हो वे खसो. तेलङ्ग स्वामीने “लाट" नामक एक पत्थरका शिवलिङ्ग से खा लेते थे। काशीधाममें पनेक धार्मिक मनुष्य स्थापित किया। इसके कुछ दिन बाद होने पनगडाके पाण करते। एक दिन किसी धनो व्यशिले २० भरो अपर, जिस पाश्रममें ये रहते थे उस पात्रममें, बहुत मोनेका एक कण खामोजोके हाथमे पना दिया। समारोहसे लिखरं नामक एक दूसरे शिवलिङ्गको कागोके गुगडोनि.उसे देख कर मोचा कि यदि स्वामोको प्रतिष्ठा को.। मलप्रसाद ठाकुर उसके सेवक नियुक्त शराब पिला कर बेहोश कर दें. तब यम कंकण म हुए। इस पाश्रममें खामोजोको एक मूत्ति भी विद्यमान लोगों के हाथ लग जाय । यह सोच कर उन्होंने स्वामोजो है। काशोवासो,तथा यात्रोलोग उस मूर्तिकाभावपूर्वक को ७८ बोतल शराब पिला दो, किन्तु इमसे स्वामोजो दर्शन करते हैं। का कुछ भी अनिष्ट महा। पीछे इन्होंने स्वयं अपने महामा वैलिखामोने देहत्याग करने में १५ दिन साथ सोनेका कक्षगा खोलकर उन दृष्टीको है पहले मृत्यु का हाल पपने मेवकी से कह दिया था। दिया। जिस घर में ये रहते थे, उम घरके सभी बार बन्द करा खामोजो सर्वदागे धमते फिरते थे। एक दिन कर पाप समाधिस्थ हुए थे। कालपूर्ण होने पर सन्ध्या के पुलिस उन्हें पकड़ कर मजिष्ट्रेटके सामने ले गई। पहले दरवाजा खोला गया और पाप बाहर निकल कर सावने मगा घूमनेसे मना किया पौर कहा, 'यदि तुम । योगासन पर बैठे। पोछे इन्होंने प्रामाको पात्रो कपड़ा नहीं पानोगे, तो हम अपना खाना तन्हें खिला लोन कर घरोरत्याग किया। देंगे।' इस पर स्वामीजी बोले, 'पहले तुम हमारा खाना १८०८ शकाब्दो में पौषशका एकादशी के दिन मन्ध्या खामो, तब हम तुम्हारा खायगे।" माहमने जब पूछा समय स्वामोजोने अपना कलेवर बदला था। कि तुम्हारा खाना क्या है? तम स्वामोजो उसी समय इनका बनाया हुषा "महावाक्यरत्नावलो' नामक मल त्याग कर उसे खाने लगे । यह देख कर मारवको एक अन्य मिलता है जिसमें निम्नलिखित उपदेशपूर्ण जान हुआ पौर उन्होंने खामोजोको छोड़ कर यथेच्छा विषय लिखे हुए है-- भमण करनको अनुमति दी। बन्धनमोक्षवाक्य, विविन्दावाक्य, उपदेशवाक्य, जोष. दयानन्द सरस्वतीने किसो समय काशोधाममें पाकर ब्रहो क्यवाक्य, मननवाक्य, जीवन्मुक्तवाक्य, स्वानुभूति- हिन्दू देवदेवियों के प्रसारत्वका प्रमाण देते हुए तथा पुरा- वाक्य, समाधिवाक्य, अष्ट स्वरूपवाक्य, लिस्वरूपवाक्य, पादिको निन्दा करते हुए जनताको अपमे मसमें पलटा खोलिङ्गखरूपवाक्य, नपुंसकलिङ्गरूपवाक्य, मामखरूप लिया और "एकमेवाहितोयम्" यह मत सर्वसाधारणमें वाक्य, फलावाक्य और विदेहवाक्य । ...। प्रचार किया। फल यह हुआ कि बहुतसे लोग मन्त्र __ स्वामोजोने दीर्घ जीवन भोग कर जोवन्मुक्ति प्रा. मुन्धकी नाई अपने धर्म को निन्दा करने लगे। दिनों किया । व मुन्न पुरुष थे । शिष्यगण उन्हें हितोय वि. दिनन्द्रयानन्दका दल पुष्ट होने लगा। बाद खामोजोके खरके जमा मामी थे। इन महापुरुषके स्वरुपका थियो न यह सबाद उन्हें कह सुनाया। म पर स्वामी वर्णन करमा असाध्य है। रनको पासे कितने हो . जोने एक कागजके टकर पर कुछ लिख कर उसे अपने लोगो ने दुःसाध्य रोगों के पंजेमे छुटकारा पाया है। शिव मङ्गलप्रसाद नकुरके हाथ दयानन्द के पाम भिजवा कितने ही लोगोंने इनका शिष्यत्व लाभ कर अपनेको दिया । कागज पढ़ कर दयानन्दने उसो समय कामो धन्य समझा है। धाम छोड़ दिया। कागज पर जो कुछ लिखा था, वह इनके शिष्यगण इष्टदेवको माईनका भी नाम । दयानन्द और खामोजोके अतिरिक कोई नहों जान सबेरै स्मरण किया करते हैं। सकला.था। लचोरिका (स.यो.) तवं चोरयति पुर-खस vol. Ix. 188