पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७७०

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सोमर समय सिकन्दर, पुमायू और नसरत दियोको प्राधिपस्थ गया। दुमिहके दोई राजस्वकास में ही स्वालियर पानिके लिए पापसमें झगड़ रहे थे। ! पार्वतीय भास्वारकर्माका सनपात एषा। उस समय वीरसिंह बालियर के उत्तर दादरोली नामक स्थानक इनकी क्षमता उत्तर भारतमें बहुत प्रसिद्ध थी। ममय जमोदार थे। ये हो बादशाहके प्रधान वजोगके किसी | समय पर दिशी, जौनपुर और मालवक मुसलमान राजगड कार्य में नियुक्त हो कर उनके पास रहा करते थे । इसी म्बालियरसे महायता लेते थे। पवसरमें एनोंने वादगाहमें ग्वालियरक दुर्ग को अध्यः | | दुडसिके बाद उनके लड़के कोतिसिंह राजा बता पोर पासनका ख माल किया था । फजल पलो हुए। मौके समयमै गर्ष तोय गुहामन्दिरका काम कहते हैं, एक सैयद उस ममय ग्वालियर-दुर्ग के ममात्र हुमा । ये पहले जोनपुरले साथ मिल कर दिल्ली- पधिपति थे, वे दुर्ग का अधिकार छोड़ देनेको राजो न के प्रति विरुवाचरण करते थे। पर इनके लड़के कोति- हुए। पन्त में वीरसिंहने से यद और उनके सेनापतियोंकी गय पौर पृथ्वीरायने दिलीका पक्ष पवलम्बन किया था। निमन्वय कर भोजनमें पफोम मिला दो। नशा जब बहलोल लोदो और जौनपुरके राजा महम्मद शर्की के साथ व.होचो गये, सब वारसिंहने उस जो बुद्ध एपा, उसमें पृथ्वोराय फरी खाँ हाजोक हायसे पर अपना अधिकार जमा लिया। मारे गये। पोहे कोतिरायने फते खाँ को परास्त कर बीरसिंह प्रादि कई एक पुरुष दिल्ली के अधीन रह उसे कैद कर लिया और सिर काट कर बहलोलको उप. कार बिजिर खाँको कर देते थे। वीरसिंहके बाद विरम- हारमें भेज दिया। १४६५१०में जौनपुर-पति हुसेन दव राजा हुए । शिस्लाखिपिमें इसका प्रमाण; किन्तु शीन एक हात् सेनाको साथ ले ग्वालियर दखल किया। सरायके अन्य राजा सहारगका नाम मिलता है। ये कोतिराय सन्धि करके कर देनेको राजी हुए पौर बोरसिंहके भाई थे, यथार्थ में ये राजा हुए वा नहीं जौनपुरका पक्ष ग्रहच किया । जौनपुरपतिको माताके रमका कोई प्रमाण नहीं है। विक्रमदेवके बाद शिला- मरने पर कोतिरायक पुत्र कल्याणमन जोनपुरमें पामोय. सिपिमें गणपतिदेवका नाम पाया जाता है। समोसेनके ताको रक्षा करने पाये थे.१४७८ में बहलोल राषिरी रामाणिका कोई प्रमाल नहीं है, केवल खडरायके | नामक स्थानमें हुसेन शर्कोको सम्पर्ण रूपसे परास्त पन्धमें उनके नामका उखहै। कर ये ग्वालियर पहुंचे। कीर्तिसिंहने तुरंत ही लाखों १४२४ में दुसिंह राजा होने पर मालबके | रुपये, तम्बू, घोड़े, जंट आदि भेट दे कर उनको अधो. होसङ्गमान ग्वामियरका पवरोध किया। अन्तमें दिल्लीम नता खौकार कर लो और बाद उनको साथ कल्यो पर मुबारकशाने पा कर उन्हें परास्त किया। मुबारक शार चढ़ाई करनेके लिए चल दिये। १४७८ ई.में. दुगडमिले कर वसल कर दियोको वापिस पाये थे। कोतिमिहको मृत्यु हुई। पीछे कल्याणमन्न राजा पोहे १४३२१० तक उन्होंने कर न दिया। और तब सुल हुए। बनके थोडे राजत्व कालमें कोई उल्लेखयोग्य तान मामद बहुत विग और स्वयं बहुत सी सेनापों घटना न हुई।।१४८ में कल्याणमनके पुत्र मार को साथ ले ग्वालियर पर धावा मारा। जब दुहिने मिहराजा हुए। ये सिंहासन पर बैठते न बैठते: उपायका रास्ता न देखा, तब सनोंने अपनी राज. लोदीसे पाक्रान्त हुए । पोछे उन्होंने ८० लाख रुपये दे : धामीको सबाट को बोधाग्निसे बचने के लिए मालवक कर उनसे छुटकारा पाया। १४८८ में बहलोलको । पपिकत नरवर दुर्गको जा घेरा। सम्बाट को मेना | मृत्यु होने पर सिकन्दर लोदीने सम्बाट को कुर ग्वालि. ग्वालियरको छोड़ नरबरदुर्ग को रक्षाके लिए चल पड़ी। । यरराज मानसिडको पोशाक पादि भेटमें है। मान दुसिंह नरवर दुर्ग में परास्त हुए। वे निराश होसिने भी अपने भतोजेके साथ एक हजार सेना और कर स्वालियर पाये और सम्माट की सेना विजयो होकर उपहार द्रव्यादि भेज कर सम्राट को माना की। रिशोबो वापिस पसी मई। बालिया पससे बच १५.११.में नेहाल नामक एका दूत दिखीको भेजा गया।