पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७९

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गिरने न देना हाता. सिर रखना, सविचल पनि साधहीनोम परत तितर बितर हो मवे। नजरोने देना। ५ जिसी कामको रोकना बंद करना। मिती बादुरको यात मासूम होने पर इनोंने निचित करता, ते करना। इनकी कविताकी सब मसाबी पोर में वथेष्ट पुर• सराव ( पु.)। खिरता, मरनेका भाव । २ स्वार देविदा दिया। निर्धारण निश्चय, सुकररो। उहरोनी (हि.सी.) वर प्रसिधा जो विवाहम सेन २स नामक पोर एक कवि हो गये जो १७५० देनके विषय में की जाती है। में विद्यमान पौर जिलोंने "गंडरगतक" तथा ठहाका (हि.पु.) पहास, जोरकी सौ। बिहारी सतसईवी टीका रो। ठौं ( पु.) १ बन्दूकको पावाज । २ ठाव देखो। गरगाँव-- बालके अन्तर्गत दीनाजपुर जिलेका ठाई (हि. स्त्री) १ स्थान, जगह । २ तई । ३ समीप, उत्तरोय उपविमाग। यह पक्षा० २५४• से निकट, पास। २६२३७० पौर देशा. १ ८८३८ पू.में ठाउँ (हि.स्त्रो) ठाई देखो। २ निकट, समीप, पास। अवस्थित भूपरिमाण ११७१ वर्गमोल। उपवि. ठाँठ (हिं. वि०) १ नीरस, जिसका रस सूख गया हो। भागकै दक्षिण बहुतसो नदियां बहती है। लोकसंख्या २ जो दूध न देती हो। लगभग ५४३०१४ । इसमें १८८० ग्राम लगी। ठाँयें (हि. स्त्री०) १ स्थान, ठोर, जगह। २ निकट, शहर एक भी नहीं है। वान्तनगरमें एक बढ़ियां पास । ३ वह शब्द जो बन्दूक छूटने होता है। मन्दिर है। ठौव (हिं. पु०-स्त्री.) खान, जगह, ठिकाना । यह शब्द प्रायः पुलिझमें ही व्यवहार होता है, परन्तु दिल्ली मेरठ २ उपविभागका सदर यापचा २५७. श्रादि स्थानों में इसे खोलिङ्ग मानते हैं। और देगा० ८८२६ पू. पर संगम नदीके किनारे डॉसना (हि. क्रि०) १ वलपूर्वक प्रविष्ट करना, दबा पवखित है। सोकसंख्या प्रायः १५५८ है। यह एक कर धुसाना । २ जोरसे भरना । ३ उन उन शब्दके साथ मा छोटा कारागार जहां केवल १८ कैदी रखे जाते है। खांसना। कुरदास-हिन्दीक ये पर्थ कवि हो गये। गकुर (हि.पु.) १ देवमति, देवता । रेखर, परमेश्वर, पिताका नाम समान सिंथा । ये जातिके कायम भगवान् । ३ पूज्यव्यक्ति । अधिष्ठाता, नायक, सरदार ।। ये पौर चरहारीमें रहते थे। सम्बत् १८८० में इनका ५ अमौंदार, गांवका मालिक । क्षत्रियोको उपाधि। जन्म पोर १८५५में देहान्त पा था। इनकी भतिपक्ष- ७ खामो, मालिक । ८नाइयोको उपाधि, नापित। की कविता इसनो मुहावनी पौर सरस होती चो, कि ठाकुर-१ एक हिन्दू कवि। कोई तो उन्हें फतहपुर जिले के चरखारो-नरेगने एक बार में यथेष्ट पारितोषिक असनी ग्रामका भाट बसलात है और कोई बुन्देलखण्ड दिया था। यों तो इनकी सभी कविताएँ एकसे एक कायख । १६४३. में इनका जन्म हुचा था और ये मुह बढ़ कर है, पर यहां केवल एकी देत- मद साहके समय तक (१७१८१०) जीवित रहे। इनके "प्रभु जी अबकी बार उमारो। विषयमें बुन्देलखण्ड में दन्तकहानी है कि बुन्दे खा लोग पीननाथ नदुखभजन है यह विरद विहारो। जब गोसाई हिमती बहादूरकी हत्या करनेके लिये मनामक पैपा कीनी नाम त ही तारो। भवपुरमें एकत्र हुए थे, तब ठाकुर कविने सन लोगोंक माह मार गज फाद गयो पाको कियो विखारो। पास एक कविता विण भेजी थी। जिसका पहला चरण सम्म फोर हिरणाय मारो दूंछ दूंककर गरो। वों धा-"कहित सुनिब की कछुन पिया" * ,इसके गरम परीक्षित रक्षा कमी पापुदर्शन चारो। ..पूरी कविता शिवसिंहसरोज मामक प्रब १२४ पृष्ठ दुसदाणि तुम हो पाना मनमें कहा विचारो। गरबा परमन को माग गरे विचारो।"