पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२४२

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२६ बलूचिस्तान मंतरीप पर्यन्त समुद्रोपकूलवती स्थान कहीं बालुका- सिंहासनच्युत किया तथा उसे राज्यसे निकाल भगाया मय और कहीं कहीं छोटे छोटे पर्वतोसे परिपूर्ण है। उसके अधिष्ठानसे कुभराणी-वंशकी प्रतिष्ठा हुई। समुद्रके किनारे पूर्वसे पश्चिम गुरावसिंह, रास अरुवा, ये कुभराणीगण वहुई थे कि नहीं, ठोक ठीक नहीं कह रासन्, जेनिन प्रभृति और भी कितने अंतरीप तथा सकते । पर हां, ब्रहुईगणके बाद बलूच जातिका माग सोन्मियाना और गोयादर उपसागर विद्यमान हैं। शेषोक्त मन हुआ था, इसमें संदेह नहीं। उपसागरके तट पर होमरा नामका एक छोटा-सा गांव बलूचियोंका कहना है, कि वे अरबदेशीय चाकुर है जहां एक किला देखा जाता है। यही स्थान यहांका नामक किसी सरके अधीन हो आलोपानगरसे आये श्रेष्ठ बन्दर है। हैं। अब भी मड़ि ओर भुगति जातिकी बासभूमिके इस राज्यका कोई भी प्राचीन इतिहास नहीं मिलता। निकट गिरिपथमें उस चाकुरका नाम पाया जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य के ऊपर लक्ष्य करनेसे जाना जाता है, कैहरि नामक और एक शेख जातिका मुसलमान 'चाकर- कि यहाँके पूर्वतन अधिवासी विभवहीन थे। किन्तु वे कीमड़ी' पर्वतके तट पर रहता है । वह कहता है, कि स्वभावसे गुढ़काय और बलिष्ट हैं इसीलिये वैदेशिक बलूचगण सिरिया राज्यसे जब यहां आये, ठीक उसी लोग बलूचिस्तानसे हो कर भारत आने में भय खाते हैं। समय उसके पूर्व पुरुष भी यहां आये थे ।(१) बहुई और आरियानोंके उल्लेखसे हम जान सकते है, कि अलेक- बलूची दोनों ही सुन्नी संप्रदायके मुसलमान हैं। जे उरके भारताभियान-कालमें प्रोक सेना इसी मार्गसे कुभरके पूर्ववत्ती हिन्दू राज्यघंशका कोई इतिहास गुजरी थी। उस समय मत्स्य और खजूर यहांके अधि- नहीं मिलता। कुभरकी चौथी पीढ़ीमें अबदुल्ला खाँ राजा वासियो का एकमात्र आहार था। ईसाको स्वों हुए। इस उद्धत युवकमे राज्यप्रयासी हो कच्छन्दाव शताब्दीके प्रारभमें खलीफाको सेनाने यह प्रदेश विध्व-! पर आक्रमण किया। युद्ध में जयो हो कुभरानीगणने स्त कर डाला था। गंदाव राजधानी पर अधिकार जमाया। इसी समय इस राज्यका भूपरिमाण १३१८५५ वर्गमील और पारस्यपति नादिरशाह भारत-आक्रमणके लिये अग्रसर जनसंख्या ८१०७४६ है। वहई और बलूचियोंकी संख्या हुए। उन्होंने कंधारमें बलूचिस्तान जीतनेकी इच्छासे सबसे अधिक है। दोनों जातियोंको नाना शाखा स्वीय सैन्यदल भेजा। और प्रशाखा अब भी इस देशके नाना स्थानों में देखी। ___अबदुला उनसे अवनति स्वीकार कर अपने पद पर जाती है; किन्तु ये लोग कब और कहांसे आये इसकी। अधिष्ठित रह राज्यशासन करने लगे। किन्तु यह सुख- स्थिरता नहीं है । यद्यपि बलूच जातिके नामसे इस प्रदेश- भोग उन्हें अधिक दिन तक बदा नहीं था। सिन्धु- का नाम पड़ा है तो भी यथार्थमें ब्रहईगण यहांके प्रधान | नवाबोंके साथ युद्ध करनेसे उनका प्राणान्त हो गया । थे और वे ही सबके ऊपर अधिकार विस्तार करते थे। उनकी मृत्युके बाद ज्येष्ठ पुत्र हाजी महम्मद खाँ राजा ब्रहूईगणकी सामाजिक उन्नति आज भी नाना आचार- व्यवहारमें झलकती है। यहां पर बहुतसे प्रवाद (१) इसके द्वारा अनुमान किया जाता है, कि अलेकसन्दरसे प्रचालित हैं, उनमेंसे एकसे जाना जाता है, कि एक नादिशाहके आक्रमण पर्यन्त यहां नाना जातियोंने आकर इस समय यहां हिंदू राजाओंका प्रभाव विस्तृत था । इस किया था। प्रेसियरकी (Gedrosia of Gressia) शक जाति- वशके शेष राजाने अफगान-सरिके अधीनस्थ सिधु- की कथा अरियानने 'Oritae वा Gedrosi नामसे बहकी दस्युगणके आक्रमणसे अपने राज्यको रक्षा बरने के लिये है। इसके पश्विम बहुई जाति और रावन नाम थान पर्वतवासियों को बुलाया था। पार्वतीय कुम्भ नामक में सरपारा नामक जातिका बासस्थान हैं। प्लिनि भस. राखाल-सरिने दलबलके साथ आ विदेशियोंको तीरवती Sarparac जातिका उलेख कर गये है। बलेकरके हराया और अपनेको अधिक बलशाली अभियान कालमें ये उन दसमें हो इस प्रदेशमें आये थे।