पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२४४

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२३८ बलूचिस्वान-ल्कि ( मक्राण), वाघ, दादर और गन्दावा (कच्छगदावा)। अनेक भेद हैं जिनमेंसे कुछ हिमालय पर भी विशेषतः आदि प्रधान नगर हैं। इनके अलावा नुस्फि, सरावन, पूरबी भाग (सिक्कम आदि )में होते हैं। जो बलत पस्नी, देवा, सोणमियानि, कोयटो, सोहवर, शाहगोदर, भारतवर्ष में होता है उसे बंज, मारु या सीता-सुपारी चाहगे, दिज, तुम्प, सासि, रान और जेहीघाट कहते हैं। इस प्रकारके पेड़ हिमालयमें सिन्धुनदके आदि और भी कितने ही नगर हैं। किनारेसे ले कर नेपाल तक होते हैं। शिमले, नैनीताल, बलूची--बलूचिस्तानमें रहनेवाली सुन्नी संप्रदायभुक्त मसूरी आदिमें भी इनके पेड़ अधिक मिलते हैं। मुसलमान जाति। इस जातिके लोग सुन्दर, कर्मठ | इसकी लकड़ी मजबूत नहीं होती, जल्दी टूट जाती है। और योद्धा होते हैं। चोरी करना, गौ आदि चराना खास कर यह ईधन और कोयलेके काममें आती है। घरों- इनका प्रधान कार्य है। चोरो डकेतीके समय ये लोग में भी कुछ लगाई जाती है। दार्जिलिङ्ग और मनीपुरकी निष्ठुर अत्याचार दिखलाते हैं सही, पर अन्य समय ओर जो बूक होते हैं उनकी लकड़ी मजबूत होती है। अतिथि सत्कार भी करते हैं इसमें सन्देह नहीं। यूरोपमें बलूतका आदर बहुत प्राचीनकालसे है । इङ्ग- कभी कभी ये लोग विदेशीय मनुष्यका अतिथि सत्कार लैण्डके साहित्यमें इस तरुराजका वही स्थान है जो कर उसका धन लूट लेते हैं। ये स्वभावतः ही अलस भारतीय साहित्यमें बट या आमका है। हैं। परन्तु युद्धविग्रह वा गोतवाद्यादि प्रमोदमें आ कर बलूल (सं०नि०) बल-सिध्मादित्वात् बाहु० लच-ऊङ् । भी कर्तव्यपरायणताका परिचय नहीं भूलते। बिला- बलयुक्त। सिताकी सामिग्री जितनी है उतनी इनके पास सदा बलेश्वर---बङ्गालमें प्रवाहित गङ्गाकी एक शाखा नदी। रहतो है, इसमें किसी प्रकारकी त्रुटि देखनेमें नहीं आती। कुष्ठियरके निकट यह गङ्गाके कलेवरका त्याग कर गड़ई जआ खेलना, तमाकू पीना, गांजा और अफीम प्रभृति नामसे दक्षिणको और बह गई है और फिर वहांसे मधु- मादक चीजोंके भक्षणमें इनकी उदासीनता नहीं है। पर मती नाम धारण कर यशोर और फरिदपुर जिलेके मध्य कोई कोई ऐसे भी हैं जो मद्य नहीं पोते। दूध तथा रोकर बहती है। आखिर यह बाकरगञ्ज जिलेके उत्तर- गर्दभादि प्रामीण पशुओंका मांस इन्हें बहुत प्रिय है। पश्चिम गोपालगञ्जके निकट बलेश्वर नामसे सुन्दरबनके ये सबके सब मांस खाना बहुत पसन्द करते हैं। कचा । मध्य होती हुई बङ्गोपसागरमें मिली है। यहां यह नदी मांस ही लसुन प्याजके साथ खानेमें इनकी ज्यादा रुचि हरिणघाटा नामसे मशहूर है। इसका मुहाना प्रायः । होती है। अपनी अवस्थाके अनुकूल क्रोतदास रखते हैं। मील प्रशस्त है। इस नदीमें बाढ़ कभी नहीं आती। सबोंमें बहु विवाह होता है । एक व्यक्ति ८ या १०स बलैया ( अ० स्त्रो०) बला, बलाय। अधिक पल्लो रखता है। गवादि द्वारा पे कन्या खरीदते । बलोत्कट (सं० वि०) बलेन उत्कटः । १ अतिशय बलयुक्त । हैं। विवाहमें मौलवी इनकी पुरोहिताई करते हैं । बिधवा विवाह भो इनमें प्रचलित है। भाईके मरने पर उसकी त्रियां टाप् । २ स्कन्दनुचर मातृकाभेद । स्त्रीको दूसरा ग्रहण कर सकता है। किसी व्यक्तिक बलोद-मध्यप्रदेशके विलासपुर जिलान्तर्गत एक प्रधान मर जाने पर पन्धु वान्धव आ कर तीन रात्रि मृतदेहकी। नगर । चौकी देते हैं और उसी समय महाभोज भी करते हैं। बल्क-प्राचीन जमपदभेद।। ये लोग सफेद और नील वस्त्रका जामा पहनते हैं। बकल (सं० पु०) वल्कल देखो। इनका पायजामा 'सूसि' वस्त्रका बनता है। कमरमें बल्कस (सं० पु०) वह तलछट या मैल जो आसव उतारने- कमरवंद और माथेमें पगड़ी लपेटते हैं। में नीचे बैठ जाती है। बलूत ( अ० पु०) ठंढे देशोंमें होनेवाला माजूफलकी बल्कि (फा० अव्य०) १ अन्यथा, इसके विरुद्ध । २ ऐसा जातिका एक पेड़। यह यूरोपमें बहुत होता है। इसके न हो कर ऐसा हो तो और अच्छा, बेहतर। .