पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३०५

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बाजीरावरघुनाथ (श्य) २९६ विद्रोही सेनादलका उपद्वमात्र होता रहा था। केयर, मोरोदीक्षित और खिमनाजीनारायण बाजीरावके १८१२ ई० में एलफिटनके अधिष्ठान समयसे बाजी- प्रधान परामर्शदाता थे। १८१६ ई०में उन्होंने ऊपरसे रावने अपनी सेनाको अंग्रेजी प्रथानुसार शिक्षा देना। अगरेजोंसे मित्रता दिखायो, पर भीतर ही भीतर आरम्भ कर दिया। १८१३ ई० में राजप्रतिनिधि खुशरूजी- वे शिंदे, होलकर, नागपुर और पिंडारियों के साथ मिल के कर्णाटकका सूबेदार होने पर सदाशिव माणि- अंग्रेजोंको परास्त करने के लिये कोशिश करते थे। विम्बक केश्वर जलने लगे और उन्होंने मि० एलफिटनके निकट जीको अर्थसे सहायता कर उन्होंने भील, कोल रमसा और उनकी चुगली खाई। अतः उनकी सलाहसे खुशरूजी मङ्ग आदि पार्वत्य जातियोंको अगरेजोके विरुद्ध लड़नेके फिर प्रतिनिधि बननेके लिये राजी हुये और लिम्बकजी. लिये उभाड़ा । एलफिटनने यह समाचार पा पेशवासे देडालिया कर्णाटकके शासनकर्ता बन कर आये। कैफियत मांगी पेशवाने इसका उत्तर देने के लिये अपनी सेना लिम्वकजी अंगरेजों की चलती पर जल कर बाजीरावको भेज दी। एलफिष्टनने इससे सन्तुष्ट न हो पेशवासे कहा, उनके विरुद्ध उसकाने लगे, पर उससे कोई फल न 'आप विम्बकको हमारे हाथ मौंप दें, जब तक नहीं सौंपेगे निकला। इघर त्रिम्बकजीके अत्याचारसे राज्य चौपट ' तब तक सिहगढ़, पुरंधर और रायगढ़ दुर्ग अंग्रेजों के लग गया । पूनाके अदालतमें जो ज्यादा घूस देता अधिकारमें रहेंगे। यदि आप उक्त तीनों दुर्ग बंधनस्वरूप उसीको जय होती थी। ' रखनेको राजी न होंगे, तो अंग्रेजराज्य पूनाकी राजधानी १८१५ ई०में पेशवा, शिंदे, होलकर, भोंसले और पिडारी पर हमला करनेको बाध्य होगा।' तीनों दुर्ग अंग्रेजों सरदारों के पास समाचार भेज उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध । के हाथ लगे सही परन्तु उनमें एक भी सेना न बच रही लड़नेकी सलाह देने लगे। विम्बकजीकी प्ररोचनासे थी । १८१३ ईमें पूनाको संधिके अनुसार पेशया उन्होंने अंग्रेज-कर्मचारी एलफिटानको निजाम , नर्मदाके उत्तर और तुगभद्राके दक्षिणवत्ती भूभाग पर और गायकबाड़राजके प्रतिपत्ति-लाभकी कथा जताई।। अधिकार छोड़ देनेको बाध्य हुये। पूनाको संधि उस समय गायकवाड़के दूत गङ्गाधर शास्त्री पूनामें समाप्त होने पर वे पूना नगरीका परित्याग कर पण्ढरपुर थे। उनको अपने पक्षमें लानेको विम्बकजी तथा बाजी-| में तीर्थयात्राके लिये चल दिये। उसी वर्ष किकिरी-युद्ध- राषने विशेष चेष्टा को। किन्तु कुछ भी फल न देख । में पराजित हो पेशवा सिताराकी तरफ भागे। किन्तु उन्होंने शठतासे गड़ाधरको पएढरपुरके विठोवा मंदिरमें अगरेज-सेनाने उनका पीछा किया जिससे उनको अनेक ले जा कर मार डाला । इसी सबबसे अंग्रेजी राज्य और | जगह पर्यटन करने पर ससैन्य पूनाकी नरफ बढना पड़ा। गोपालराव मैराल बिम्बकजो पर संदेह करने लगे।। १८१८ ई०की ४थीं जनवरीमें अंग्रेजोंसे फिर परास्त हो निम्बकको अंगरेजोंके हाथ समर्पण करनेके लिये वे शोलापुरको नौ दो ग्यारह हुए। किन्तु आत्मरक्षा में बाजीरावसे अनुरोध किया गया। बाजीरावने स्वयं असमर्थ हो उन्होंने आसीरगढ़के निकटवत्ती ढोल- लिम्बकको अवरुद्ध कर रखा। विम्बकको अर्पित हुए कोट नगरमें अंग्रेज सेनापति जनरल सर जनमेकके न देख अङ्रेजी-सेना पूनाकी तरफ अग्रसर हुई। बाजी | हाथ आत्मसमर्पण किया। उक्त वर्षको हरी जूनको रावने किंकर्तव्यविमढ होकर लिम्बकजीका अङ्ग- अंग्रेजोंने ८ लाख रुपये मासिक वेतन मुकर्रर कर कान- रेजोंके हाथ सौंप दिया। गङ्गाधरकी हत्यामें बड़ोदा- पुरके पास विठुर नगरमें उनके रहनेके लिये स्थान के राजमन्त्री सीतारामने सहायता दी थी, घे भी निश्चित कर दिया। सिपाही विद्रोहके प्रधान नेता धुधु- बाजीरावके पक्षमें आ कर सेनासंग्रह करते थे। उसी पंत (माना साहब ) इन्हींके दत्तक पुत्र थे। १८५२ ई० में वर्ष विम्बकजी थान दुर्गसे अहमद नगरके पर्वतप्रदेशको बिठुर नगरमें बाजीरावकी मृत्यु हुई। भाग गये। बाजु (फा० अव्य०) १ बिना, वगैर । २ अतिरिक्त, सिवा । लिम्वकजीके समर्पित होने पर सदाशिव भाऊ मान- | बाजू (फा० पु०) १ भुजा, वाहु । २ एक प्रकारका गोदना