पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४०५

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विस्व-बिल्वसैल मन्त्र-“ओं नमो विल्वतरवे सदा शङ्कररूपिणे । तन्त्रके अनुसार इसकी उत्पत्ति इस प्रकार है:-- सफलानि समांगानि कुरुष्व शिवहर्षद ॥" विष्णु-पत्नी लक्ष्मी पृथ्वी पर विल्ववृक्ष रूपमें उत्पन्न सुबह उठने के बाद वृक्षके नीचे चारों तरफ दश हुई। कारण विष्णु सरस्वतीको बहुत हो प्यार करते थे। हाथ परिमित स्थान गोबर पानीसे लोपना चाहिये । इस लिये लक्ष्मीने महादेवके लिए बहुत वर्ष तक घोर पक्षान्त अर्थात् अमावस्या, पूर्णिमा, द्वादशी, सायंकाल तर तपस्या की थी। इतने पर भी महादेवको प्रीति न और मध्याह्नकाल, इन समयोंमें विल्वपत्र नहीं चुनना हुई। तब वे विल्ववृक्ष रूपमें परिणत हुई; बादमें वहो चाहिये। शाखा तोड़ना और वृक्ष पर चढ़ना उचित विल्व वृक्षके नामसे प्रसिद्ध हुआ। महादेव सर्वदा इस नहीं। वृक्ष पर चढ़ कर पत्न चुन ले, पर शाखा कदापि न : वृक्षमें बास करते हैं। ( योगिनीतन्त्र पूर्वखण्ड ५५० ) तोड़े। रमणीय, अखण्डित वा खंडित सभी प्रकारके , बिल्व वृक्षके नीचे प्राणत्याग करनेसे मोक्ष लाभ पत्रसे शिवकी अर्चना हो सकती है। ६ मासके बाद होता है। बिल्वपत्र पर्युषित होता है। सूर्य और गणेशके अति "विल्ववृक्षस्तथा देवी भगवान् शङ्करः स्वयं । रिक्त सभी देवताओंकी पूजा बिल्वपत्र द्वारा की जाती विल्ववृक्षतले स्थित्वा यदि प्राणस्त्यजेत् सुधीः ।। सकतो है। जिस स्थानमें बिल्ववृक्षोंका कानन है। वह तत्क्षणात् मोक्षमाप्नोति किं तस्य तीर्थकोटिभिः।" स्थान काशोके समान पवित्र है। मकानके ईशान कोन- (पुरश्चरणालाम १० पटल) में बिल्ववृक्ष लगानेसे विपदकी सम्भावना नहीं रहती। देवपूजामें विल्वपत्र चढ़ाते समय अधोमुख रहना पूर्वदिशामें रहनेसे सुख, दक्षिणमें रहनेसे मरणभयका चाहिए । बिल्वपत्रके बिना शक्तिपूजादि नहीं होती। नाश और पश्चिममें रहनेसे प्रजालाभ हुआ करता है। श्रीफल और बिल्ववृक्ष देखो। श्मशान, नदीतीर,प्रान्तर और वनमें विल्ववृक्ष होनेसे वह : · बिल्वक ( स० क्लो० ) है तो भेद । २ नागभेद । ३ पीठ स्थानभेद। स्थान पीठस्थल कहलाता है। बिल्वकादि ( स० पु० ) पाणिन्युक्त शब्दाणभेद । यथा ---- घरके आंगनके बोचमें विल्ववक्ष नहीं लगाना चाहिये। बिल्व, वेणु, बेत्र, बेतस, इक्ष , काष्ट, कपोत, तृण, क्रुञ्चा, यदि दैवात् ऐसे स्थानमें उत्पन्न हो जाय, तो शिव तक्षन् । समझ कर उसकी अर्चना करनी चाहिए। बिल्ववृक्ष बिल्वकीय ( म. वि. ) विल्वाः सन्ति यस्यां नड़ादित्वात् छेदन वा उसका काष्ठ दहन करना निषिद्ध है। ब्राह्मणों- । छ कुक च। बिन्ययुक्त भूमि । के यज्ञके सिवा अन्य किसी भी कारणसे बिल्ववृक्ष बेचनेसे मिलवज ( विकबिल्यात जायते जन-जु । बिल्वजात- उसे पतित होना पड़ता है । बिल्वकाष्ठ-धर्षित चन्दन मात्र । मस्तक पर लगानेसे नरक भय दूर होता है । चैत्र, वैशाख विल्बजा ( स० त्रि०) शालिधान्य विशेष । ज्येष्ठ और आषाढ़. इन चार महीनोंमें बिल्ववृक्षमें जल- बिल्वतेजस् ( स० पु० ) नागभेद । सिंचन करना विधेय है। (बृहद्धर्मपु० ६।११ अ०) बिल्वनैल ( स० क्लो० कर्णरोगोक्त तैलौषधभेद । प्रस्तुत वहिपुराणमें लिखा है, कि-गोरूप-धारिणी लक्ष्मी प्रणाली--तिलतल ४ सेर, छागदुग्ध १६ सेर और बेल. के पृथ्वी पर अवतीर्ण होने पर उनके गोमयसे विल्व सोंठ १ सेर इसे गोमूत्रमें पीस कर कल्क दे । बाधिर्यरोग ब,क्षको उत्पत्ति हुई। में यह तेल कानमें देनेसे बधिरता जाती रहती है। " गोलदमीच या धेनु गोरूपा सा गता महीम् । ____ अन्यबिध-तिलतैल १ सेर, बकरीका दूध ४ सेर, तगोमयभवो विल्वः श्रीश्च तस्मादजायत ॥". कल्क बलशोंठ २ पल । पीछे यथानियम इस तेलका (वह्निपु०)| पाक करे। बाश्लैष्मिक बधिरतामें यह तेल कानमें इस वृक्षमें सर्वदा लक्ष्मीका बास रहता है इसी लिए देनेसे बधिरता प्रशमित होती है। (भैषज्यरत्रा. कर्णरोगाधि.) इसका नाम श्रीवृक्ष है।