पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४१

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प्लीहन् (प्लोहा)- प्लीहारि ३५ १ औंस यकृत्के वामभाग वा धाममूत्रयम्बका विवद्ध न, अन्ना- एक माला दिनमें ३ बार। प्लावकमें कोई अर्बुद और रक्तमें श्वेतकणाधिक्य R लाइकर एमन फ्लुराइड ( Leucoc theinin )। ध्याधिके तरुण होनेसे आरोग्य एकोयामेन्थलिप् होनेको सम्भावना है, पर प्लोहाके अधिक बढ़ने और खानेके बाद १ मात्रा दिनमें दो वार । रोगके पुराने होनेसे आरोग्यता लाभ करनेकी कोई आशा. पोहामें एमिलये अपकृष्टता, उपदंश, कर्कट, व्यु वा- नहीं। कल और हाइभेटिम आदि रोग उत्पन्न होते हैं। उन वायुपरिवर्तन, किनाइन, आर्सेनिक और लौहघटित सब रोगोंसे भी लोहाका विवद्धन और दुर्वलताका औषधोंका सेवन विधेय है। अन्यान्य 'औषधोंके मध्य लक्षण दिखाई देता है। ऐसी अवस्थामें होमिओपाथी आइओडिल्लुस, ब्रोहाइस और फ्लुराइस विशेष कार्य- चिकित्सा विशेष उपकारी है । कारी है । आहारार्थ लघुपाक और बलकारक द्रव्यादिसे प्लोहशत् ( म० पु० ) प्लीहन, रोहड़ा वृक्ष । प्लीहाके ऊपर ब्लिटर तथा टिंचर वा अङ्गयेण्टम् आइ- प्लीहा ( हिं० स्त्री० ) प्लीहन् देखो। ओडिन्का लेपन आवश्यक है । पुरातन प्लीहाके ऊपर प्लीहाकर्ण ( स० क्ली० ) कर्णदेशजात रोगविशेष, एक रोग जो कानके पास होता है। अङ्गयेण्टम् हाइडाजिराई बिनाईओडिम मालिश करनेसे प्लोहा छोटी हो सकती है, पर दो बारसे अधिक मालिश प्लोहान्तकग्स ( स० पु० । अन्तयनोति अन्तकः प्लीहायाः अन्तकः । पोहारोगोक्त एक औषध । प्रस्तुत म करे। एलोपैथिक-मतसे स्पूिनमिकश्चर ---- प्रणाली ताम्र, रौप्य, त्रिकटु, रास्ना, जयपालवीज, R विनिसलकस २ ग्रेन त्रिफला, कटकी, दन्तीमूल, घोषामूल, सैन्धव, निसोथ एसिड सालफ्युरिक डिल ६ बुद और यवक्षार इन सब दव्योंको रेडीके तेलमें फेरि मलफ १ ग्रेन घोंट कर रत्ती भरकी गोली बनावे । इसका अनुपात मेगनिसिया सलफस् ॥० ग्राम रोगीका बलाबल देख कर स्थिर करना होता है। यह हिं जिक्षर १० बुद औषध पाण्ट और शोथ आदि रोगोंमें भी हितकर है। जल १ औंस ___(मेषज्यरस्ना० प्लीहयदधि.) ज्वरके समय दिन में एक मात्रा २३ बार। प्लीहाणवरस ( स० पु०) प्लीहरोगोक्त औपविशेष । यकृत्का कजेश्चन रहनेसे लीभरके ऊपर नाइट्रो- इंगुर, गन्धक, सोहागा, अभ्रक और विल्व आठ आठ तोले हाइड्रोक्लोरिक एसिट डिलका लेप देनेके बाद फोमेण्ट | ले कर उसमें चार चार तोला मिर्च और पीपल मिला दे। करे और निम्नलिखित औषधका सेवन करावे। पीछे छः छः रत्तोको गोली बनावे । इसका अनुपान र क्विनि म्युरिएट . ३ प्रेन | निगुडीका रस और मधु है। इस औषधका सेवन एसिड हाइक्लोरिक डिल करनेसे ज्वर, मन्दाग्नि, कास, श्वास, वमि, भ्रम और सब टि न्युसिस् भ मिशि प्रकारको प्लीहा दूर होती है। (रसेन्द्रसारसं० प्लीहारोगाधि०) ईकलम्बा १ औंस | प्लीहारि ( स० पु० ) प्लीहायाः अरिः शनुस्तन्नाशकत्वात् । दिनमें २।३ बार। १ अश्वत्थवृक्ष, पीपलका पेड़। २ प्लीहनाशकवरिको- पुरातन पीहामें सामान्य ज्वर रहनेसे-.. षधविशेष । प्रस्तुत प्रणाली-हरिताल २ तोला, पोटाशि व्रोमाइड ५ ग्रेन स्वर्ण अर्द्ध तोला, ताम्र ४ तोला, मृगचर्मभस्म और नीबू- टिं सिनकोना कम्पा २० बुद । का मूलचूर्ण प्रत्येक दो २ तोला, इन सब दृष्योंको एकल रिं जेनसिएन कम्पा २० बुद । कर ६ रत्ती भरकी गोली बनावे। इसका अनुपान मधु रिं डिजिटेलिस २ बुद और चिताचूर्ण है। इस औषधका सेवन करनेसे इन्फ्युजन सोएटरि १ औंस असाध्य प्लीहा, यकृत् , पाण्ड, गुल्म और भगन्दररोग