पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४१२

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बीज मृत्युञ्जयबोज... 'ओं जु सः ।' दक्षिणामूर्तिवीज--- उच्छिष्टचाण्डालिनी बीज--सुमुखीदेवी, महापिशा- 'ओं नमो भगवते दक्षिणामूर्त ये मह्य मेधां प्रयच्छ . चिनी ह्रीं ठः ठः। धूमावती बीज-धू धू स्वाहा। स्वाहा । चिन्तामणिबीज र क्षम र य औं ऊ।' भद्रकालोबीज-हौं कालि महाकालि किलि किलि नीलकण्ठबीज-'प्रो नी उः नमः शिवाय ।' चण्डः फट् स्वाहा। उच्छिष्टगणेशबीज- ओं हस्तिपिशाचि बोज - 'रुध्य फट ।' क्षेत्रपालबोज -'ओं क्षौं क्षेत्र लिखे स्वाहा। धनदाबीज-धं ह्री श्री देवि रतिप्रिये पालाय नमः।' बटुकभैरव बीज-'ओं ह्रीं बटुकाय आप- स्वाहा । श्मशानकालिका बोज.... हो श्री क्लीं कालिके दुद्धारणाय कुरु कुरु दटुकाय ह्रीं।' त्रिपुराबीज --'हसरै': ५ ह्रीं श्रीं क्लीं। 'हसकलरी' 'हसरौंः' । सम्पत्प्रदाभैरवीबीज --'हसरै सह. बगलाबीज ·ओं ही बगलामुखि सर्वदुष्टानां बाच कलरी सरौं । भयविध्वंसिनी भैरवीबीज -'हसैं, इस- मुखं स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ही ओं कलरी, हसरौं ।' कौलेशभैरवीबोज--.'सह, सहकलरों, स्वाहा। सहरौं।' सकलसिद्धिदाभैरवीबीज 'सहैं, सहकलरों, कर्णपिशाचीबीज---ओं कर्णपिशाचि वदातीताना- सहौं।' चैतन्यभैरवोबीज- 'सहैं. सकलडी: सहरी गतशब्दं ह्रीं स्वाहा। मजुघोषवीज्ञ--को ह्रीं श्रीं। कामेश्वरीभैरवीबोज 'सहैं, सकलहीं, नित्यक्लिन्ने महद्रवे तारिणीबीज-क्रों क्लीं कृष्णदेवि ह्रीं क्रीं ऐं । सार- सहरौः ।' षटकूटाभैरवीवोज -' र ल कसहैं, ड, र स्वत बीज--ऐं। कात्यायनीबीज-एँ ह्रीं श्रीं चौं ल क स हों डर ल क स हौं।' नित्याभैरवीबीज---'ह स चण्डिकाय नमः। दुर्गाबीज-दूं। विशालाक्षीबोज--. कल र हैं, ह स क ल र डी, हस कलरडौं।' रुद्रभैरवी ओं ह्रीं विशालाक्ष्यै नमः । गौरीबीज ही गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा । बीज --'हसखफरें, हसकलरी हसौः ।' भुवनेश्वरी- ब्रह्मश्रीबीज- हो नमो ब्रह्मश्रीराजितेराजपूजिते जये भैरवीबोज 'हसैं, हसकलहों, हसौः ।' सकलेश्वरो- बोज -'सहैं, सहकलही, सहौं ।' त्रिपुराबालाबीज ---ऐं बिजये गौरि गान्धारि त्रिभुवनशङ्कर सर्वलोकशङ्करि क्लीं सौः। नवकूटावालाबीज 'क्ली सौः हसैं, हस- मर्वस्त्रीपुरुषवशङ्करि सुयुद्धदुर्धररावे हो स्वाहा । कलरी', हसौः, हसरें, हसलरी हसरीः। अन्नपूर्णा ___ इन्द्रबीज- इ इन्दाय नमः। गरुड़बीज - क्षिप ओं स्वाहा। बिपहराग्निबीज--- खं खः। वृश्चिकविषहर- भैरवीबोज - ओं ह्रीं श्री क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्ण स्वाहा।' बीज -- ओं सरह स्फुः। ओं हिलि हिमि चिलि हस्फुः । श्रीविद्यावीज---क ए ई ल हो। हस क ह ल ही. ओं हिलि हिलि चिलि चिलि स्फुः । ब्रह्मणे फुः । सर्षेभ्यो • देवेभ्यस्फुः ।। सकलही। छिन्नमस्ताबीज-श्री क्लोह वज्रवैरो ___ मूषिकविषहरबीज --ओं में ठ। ओंगे गां चनीये हूँ हूं फट् स्वाहा । श्यामाबोज -क्री क्रीं क्रो ठः । मूषिकनाशबीज--ओं सरणे फुः असरणे फुः हं हं हों हों दक्षिणेकालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूँ ह्रीं ह्रीं विसरणे फुः। लूता विषहरबीज-ओं ह्रीं ह्रीं हूं जकृत् स्वाहा । गुह्यकालिबीज- क्रीं क्रों क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ओं स्वाहा गरुड़ हूं फट । सर्वकीटविषहर बीज-ओं गुह्य कालिके को को की हूं ई हो ह्रीं स्वाहा। भद्र- : नमो भगवते विष्णवे सर सर हन हन हु फट् स्वाहा । कालीबीज- - क्लीं क्लीं क्लीं इं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्लीं क्लीं . क्ली हं हं ह्रीं स्वाहा। सुखप्रसवबीज ( मन्त्र ;---ओं मन्मथ मन्मथ बाहि श्मशानकालिकाबीज क्रीं कों की हूं हूं ह्रीं ह्रीं श्मशान- । बाहि लम्बोदर मुञ्च मुश्च स्वाहा । ॐ मुक्ताः पाशा । कालि क्री की स्वाहा । महाकालीबीज-क्री . . बिपाशाश्च मुक्ताः सूर्येण रश्मयः। मुक्तः सर्वभयादर्भ को कोई है हो ह्रीं महाकाली की की क्री हूँ । पह्य हि मारीच मारीच स्वाहा ।' ह्रीं ह्रीं वाहा। ताराबीज-- हो स्त्रों हूं फट । चण्डो.. इन दोनों मन्त्रों से कोई भी मन्त्र पानी पर आठ बार प्रशूलपाणिबीज-ओं हो। शिवाय फट । मातङ्गिनो जप कर उस पानीको आसन्नप्रसवाको पिलानेसे अना. बीज---ओं हो क्लीमाराङ्गिन्यै फट् स्वाहा। । यास प्रसव हो जाता है।