पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४२४

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बुद्धगया-बुद्धदेव बुद्धगया (स स्त्री०) कीकटस्थ बुद्धका गयाभेद । अवतीर्ण होंगे। बाद कलियुगके शेषकालमें वे विष्णु- वोधगया देखा। यशा नामक ब्राह्मणका पुत्र बन कर कलिरूपमें जन्मग्रहण बुद्धगुप्त ( स ० ) गुप्तवंशीय एक राजा। करेंगे। गुमराजवंश दं खा। विष्णुपुराणमें तृतीय अंशके १७वे और १८वें बुद्धगुरु ( म० पु. ) एक बौद्धाचार्य। अध्यायमें बुद्ध मायामोह नामसे प्रसिद्ध हैं । उक्त पुराण- बाघाप । म पु०) एक प्रसिद्ध वौद्धाचार्य। ५वीं में लिखा है, कि भगवान्ने अपने शरीरसे मायामोहको शताब्दी में ये विद्यमान थे। उत्पादन कर देवताओंसे कहा-'यह मायामोह सभी बुद्धमाय ( म० की० ) बुद्धका कार्य वा जीवन। दैत्योंको मोहित करेंगे। दैत्योंके वेदमार्गविहीन होनेसे बुद्धज्ञानश्री ( स० पु. ) एक प्रसिद्ध बौद्धाचार्य। तुम लोग अनायास उन सबों का बध कर सकोगे।' बुद्धत्व । म क्लो । बुद्धस्य भावः त्व। बुद्धका भाव अनन्तर मायामोह नर्मदा नदीके किनारे जा कर बोले, वा धर्म। 'हे दैत्यपतिगण! तुम लोग क्यों तपस्या करते हो ? बुद्धदत्त । य पु० ) १ चण्ड महासेनका मन्त्री । ( त्रि०) यदि तुम्हें ऐहिक और पारत्रिकफलको इच्छा हो, बुद्ध न दत्तः। ६ बुद्र कनक दत्त, जो बुद्धदेवसे दिया तो मेरे कथनानुसार कर्म करो। मैं जो धर्मोपदेश गया हो। दूंगा, वही मुक्तिका उपयोगी होगा। उससे श्रेष्ठ धर्म बुदिश ( म० पु० ) राजभेद। और दूसरा नहीं है। उस धर्मके ग्रहण करनेसे स्वर्ग या घुद्धदेव - बौद्धधर्मके प्रवर्तक महाज्ञानी पुरुष, हिन्दू- मुक्ति जो चाहो, मिलेगा।" शास्त्रोक्त भगवान के दश अवतारों से नवां अवतार। मायामोहकी प्ररोचनासे दैत्यगण वेदमार्गसे पहिष्कृत - दशावतार देखो। हुए। यह धर्म है, वह अधर्म, यह सत् है वह असत्, हिन्दूमन । इससे मुक्ति होती है, उससे नहीं, यह परमार्थ है, वह माहित्यदर्पणकारोंन बुद्धावतारके विषय में जो श्लोक अलीक, यह दिगम्बरोंका धर्म है, वह बहुवस्त्र मनुष्योंका, उद्धन किया है, उसका भावार्थ इस प्रकार है-- इस प्रकार नाना सन्देहयुक्त वाक्य कह कर माया- "बुद्धावतारमें जिनके ध्यानके मध्य सारा संसार मोहने दैत्योंको स्वधर्मत्याग कराया और कहा, 'हे दैत्य- विलीन हुआ था, कल्को अवतारमें जो अधार्मिक गण! तुम लोग मेरे कहे हुए धर्मका 'अहं त' अर्थात् मनप्यास खड़ग द्वारा नाश करेंगे. उनकी हम प्रणाम मान्य करो।' यही कारण है, कि मायामोहके चलाये हुए करते हैं।” धर्मको माननेवाले 'आहत' कहलाते हैं। मायामोहका ___ जयदेवने दशावतार-स्तोत्रमें बुद्धावतारके सम्बन्ध धर्म क्रमशः बहुत दूर तक फैल गया। अनन्तर इन्होंने लिखा है हे केशव ! आपने बुद्ध-शरीर धारण कर ___ असुरोंसे कहा, 'यदि तुम लोग निर्वाणलाभ अथवा दयाद चित्तसं पशुहिसाको अपकारिता दिखलाते हुए स्वर्गकी कामना करते हो, तो पशुहिंसा प्रभृति बुरे धर्मोका यविषयक मन्त्रोंको निन्दा की है । हे अगदीश हरे ! परित्याग करो। इस जगत्प्रवाहको विज्ञानमय समझो आपका जय हो ।११) और यह निश्चय जानो, कि इस संसारके कोई आधार श्रीमद्भागवतके प्रथम स्कन्धके तीसरे अध्यायमें नहीं है ; इत्यादि। लिग्वा है, कि भगवान्ने इक्कोस वार अवतार लिये थे। इसी प्रकार अग्निपुराण, वायुपुराण, स्कन्दके हिम- इस कान्लयुगमें ले गयाप्रदेशमें अञ्जनके पुत्र बुद्धनामसे वत्खण्ड आदि पौराणिक ग्रन्थोंमें बुद्धावतारका थोड़ा बहुत विषय लिखा हुआ है। वल्लभाचार्यने वेदान्तसूत्रके द्वितीय पादसे छब्बीस (१) “निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं सदय हृदयदर्शितपशुधातम्। सूत्रकी व्याख्यामें निम्नलिखित आख्यायिका उद्धत का केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥" ( जयदेव)