पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४२९

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४२३ बुद्धदेव अभी आप ऐसे भूखे हैं, कि आपके समीप जानेका मुझे देनेकी इच्छा प्रकट की। वाद नगरवासी बोले, 'महाराज! साहस नहीं होता। शायद आपकी रक्षा करनेमें मुझे पुत्रको और कोई दण्ड देनेका प्रयोजन नहीं उन्हें राज्यसे अपने जीवनसे हाथ धोना पड़े। इस पर सिंह उले बाहर निकाल देना ही समुचित दण्ड होगा। तदनुसार माना प्रकारसे अभयदान दे बारम्बार प्रार्थना करने लगे। वेश्मान्तर व नामक पहाड़ पर भेज दिये गए । हजारों तदनुसार गोदड़ने निकटवत्ती हदसे सिंहके पैर तक मनाही करने पर भी उनकी स्त्री मादीने उनका साथ एक नाला बनाया। हृदका जल उस नालेके द्वारा सिंहके नहीं छोड़ा। इधर महारानी स्पृशती पुत्रको निर्वासन- पैर तक पहुंचते ही वह कोचड़ जलके समान तरल हो वार्ता सुन हतचेतन हो पड़ी । बाद महाराजने उन्हें गया। बाद सिंह अनायास कीचड़से निकल कर उस सान्त्वना दे कर कहा, 'मैं कुछ दिनके बाद ही पुत्रको गीदड़को धन्यवाद देने लगा। उसी दिनसे सिंह और पुनः घर ले आऊंगा।" गोदड़ चिरकाल तक एक ही गुफामें सपरिवार रहने जिस समय वेश्मान्तर और माद्रीदेवोने घर छोड़ा, लगे। सिंहने कभी भी उसे मारनेकी चेष्टा न की। इस उसी समय उन्होंने अपनी सम्पत्ति अथवा वस्त्रालङ्कारादि जन्ममें गौतमने सत्यपारमिताको रक्षा की थी। दरिद्रोंको दे दिये। धेश्मान्तर सर्वस्व त्याग कर केवल वेश्मान्तरजातक-दानपारमिता ।। अपनी स्त्री, पुत्र तथा कन्याके साथ एक रथ पर चढ़ जम्बूद्वीपको जयातुरा नगरो मञ्ज नामक एक राजा वङ्कगिरिकी ओर चले। उनकी माताने उन्हें जो कुछ रहने थे। उनकी प्रधान महिषीका नाम था स्पृशती। उनके दिया था, उन्होंने उसे भी दरिद्रोंको वांट दिया । धेश्मान्तर नामका एक पुत्र उत्पन्न हुआ। चैत्यराजकन्या अन्त में रास्तेमें दो ब्राह्मण सामने आ वेश्मान्तरसे बोले, मादीदेवीके साथ वेश्मान्तरकी शादी हुई। उसी समय 'महाशय ! यदि रथ खीचनेवाले ये दोनों घोड़े मिल कलिङ्गदेशमें भारी अकाल पड़ा। कलिङ्गराजको मालूम जाते, तो हम लोग बड़े ही उपकृत होते। थोड़ी दूर आगे हुआ, कि वेश्मान्तरके जो श्वेत हस्ती है वह पानी बढ़ने पर फिर एक ब्राह्मणने आकर कहा, 'प्रभो ! आपका बरसा सकता है। प्रवाद है, कि उक्त हस्तीके एक आस्त- रथ पानेसे ही मेरी दरिद्रताकी कुछ कमी हो जाती।' रणका मूल्य २४ लाख रुपये था। कुछ दिन बाद कलिङ्ग- उक्त ब्राह्मणोंके प्रार्थनानुसार वेश्मान्तरने अपना रथ तथा राजने आठ ब्राह्मणको जयातुरा नगरो भेजा। उपोषध दोनों घोड़े दे दिये। बाद माद्रीदेवी कन्याको और दिनमें वेश्मान्तर दरिद और भिक्षकको अन्नवस्त्र इत्यादि वेश्मान्तर पुत्रको अपनी गोदमें ले कर पैदल ही चलने दान दे रहे थे, उसी समय उक्त आठो ब्राह्मण वहां जा लगे।चैत्यदेशके राजाने उन लोगोंको बुलाया ; किन्तु कर बोले, "महाराज कुमार! आपके जो श्वेत हस्ती है, वेश्मान्तर उनके यहां नहीं गए। उसे ही पानेको आशासे हम लोग आपके पास आये अनन्तर वे लोग वगिरि पहुचे। वहां विश्वकर्माने हैं।" वेश्मान्तरने कहा, 'हे ब्राह्मणगण! इस हाथोकी उन लोगोंके लिए दो छोटे छोटे घर बनाये। वेश्मान्तर बात तो दूर रहे, आप लोग मेरे नेत्र हृतपिण्ड इत्यादि और माद्रीदेवी उन्हीं दोनों घरमें संयत भावसे रहने जो कुछ चाहें, उसे भी मैं सहर्ष प्रदान करूंगा।' 'हम लगी। संतान माताको अनुपस्थिनिमें पिताके साथ लोगोंका और कुछ भी प्रार्थनीय नहीं है ऐसा कह कर रहती थी। इसी तरह सात महीने बीत गए । एक बे लोग उक्त हस्तीको ले कलिङ्ग देश लौट गए। नगर- दिन यूजक नामक एक बूढे ब्राह्मणने वेश्मान्तरके निकट वासिगण यह खबर सुन कर बड़े ही दुःखित हुए और आ कर कहा, 'महाशय ! मैंने बड़े कष्टसे एक सौ रुपये सबोंने राजप्रासादमें जा कर राजासे निवेदन किया, उपार्जन कर एक ब्राह्मणके पास रखे थे, किंतु उसने 'महाराज! हम लोग श्वेतहस्तीसे अनेक उपकार पाते कुल रुपये खर्च कर दिये बह बड़ा गरीब था, सुतरां थे। आपके पुत्रने उक्त हस्ती ब्राह्मणोंको दे कर बड़ा रुपये न लौटा सकनेके कारण उसने मुझे अमितता भनिष्ट किया है। इस पर महाराजने अपने पुत्रको दण्ड नामको कन्या प्रदान की है। मेरी उक्त पलो (ममित्रतपा)