पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४४६

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बुद्धदेव-बुद्धधर्म योगमें विहार किया। आकाश असीम है, ज्ञान अनन्त, गण, रामनामके कोलियगण और पावाके मल्लगम सबों- मसार अकिञ्चन, संज्ञा और असंज्ञा दोनों ही अलीक | ने बुद्धके शरीरांशकी प्रार्थना की। वेठद्वीपके ब्राह्मणों- हैं इस प्रकार सोचते हुए. नाता तथा ज्ञ य दोनोंका ने भी उनके शरीरका एक अंश पानेकी आशा की। इस ध्वंस होनेमे बुद्धने परिनिर्वाणलाभ किया। उमी ममय पर कुशीनगरके मललोंने कहा, 'भगवान् बुद्धने हम लोगों- संसारके मध्य एक सर्वप्रधान ज्ञानी तिरोहित हुए। के प्रामक्षेत्रमें परिनिर्वाणलाभ किया है, हम लोग किसी- बुद्धके परिनिर्वाण लाभ करते ही मिक्ष गण पृथ्वी को भी उनके शरीरका अश प्रदान न करेंगे।' तब द्रोण पर गिर कर रोने लगे। अनम्तर अनिरुद्धने आनन्दसे नामक ब्राह्मणने सबोंसे कहा, 'हे महाशय ! मेरी एक कहा, 'हे बन्धो ! कुशी नगर जा कर मल्लोंने कह दो, बात मुन लें। बुद्ध शान्तिवादी थे। उन माधु पुरुषके कि भगवानने परिनिर्वाण लाभ किया है।' तदनुमार देहभागके लिये हमें न लड़ना चाहिये। आप मभी लोग आनन्द वहां गए। उनके मुखले बद्धके परिनिर्वाण-. इकट्टे हों, हम इनका शरीर आठ भागोंमें बांट देते हैं। लाभका संवाद सुन कर मल्लपुत्र, मलस्नुषा और सब ओर स्तूप बनवाये जाय तथा मभी मनुष्य उन्हें देख मालगृहस्थ छाती पीट पीट कर विलाप करने लगे। कर प्रसन्नतालाभ करें।" बाद उन्होंने शालवनमें जा कर नृत्य, गीत, इस पर सभी राजी हुए और द्रोण ब्राह्मणने बुद्धको वाद्य, पुष्पमाला, गन्ध प्रतिसे सात दिन तक हड़ो आठ भागोंमें बांट दो। अनन्तर वे बोले, 'हे महा. बुद्धदेहकी पूजा को। सातवें दिन वे उनका मृत' गयगण ! जिस कुम्भमें रख कर बुद्रका शरीर बांटा शरीर मुकुटवन्धन नामक चैत्यमें ले गए और एक शद्व- गया है, वह मुझे दिया जाय। मैं उसके ऊपर एक स्तूप वस्त्र द्वाग उसे ढंक दिया। इस प्रकार उनका शरीर बनवाऊंगा। पांच मी वस्त्र और कार्याम द्वारा आच्छादित हुआ तथा अनन्तर पिप्पलिवनीयोंने मौर्य दुत द्वारा कहला भेजा, नैलपूर्ण लौहपालमें रखा गया। बाद वे सर्वगन्धमय "भगवान् क्षत्रिय थे और मैं भी क्षत्रिय है; अतएव मुझे चिता प्रस्तुत कर उसे जलाने लगे। उन्होंने चौरास्ते पर उनके शरीरका कुछ अंश मिलना चाहिये।" किन्तु एक वृहत् स्तूप निर्माण कर कहा, जो गृहस्थ यहां आ दुतने आ कर देखा, कि बुधके शरीरका पहले ही आठ कर माल्य और गन्ध अर्पण करेंगे अथवा इस स्थान पर हिस्सा हो गया है। बाद वह उनको चिताकी भस्म ले आ आनन्दिन होंगे, वे बहुत दिन तक सुखसे रहेंगे। ' कर लौट गया। पिप्पलिबनोय मौर्याने उस भस्मके ___ उसी ममय महाकाश्यप ५०० भिक्ष ओंके साय पावा. ऊपर महास्तूप निर्माण किया। इस प्रकार आठ महा. मे कुशोनगर आये। उन्होंने मुकुटबन्धनचैत्यमें जा कर । स्तृप, एक कुम्भस्तूप और एक अङ्गारस्तूप कुल दश स्तृप तीन बार बुद्धचिताकी प्रदक्षिणा और सिर नवा कर बनाये गये। बुद्धपादको बन्दना की। अनन्तर चिता जल उठी और पन समय बुद्धदेवका प्रवर्तित धर्म सारे संसारमें धोरे धीरे बुद्धका चर्म, मांस, म्नायु प्रभृति सभी जल प्रचारित हुआ था। सम्प्रति भी मानव जातिके लग गए. मिर्फ हड़ी बच रही। भग तृतीयांश मनुष्य बुद्धके अनुगामी तथा भक्त हैं। 'जब मगधराज अजातशत्र ने मुना, कि बुद्धदेवने कुशो- बौद्ध-धर्ममें अन्यान्य विवरण देखो। नगरमें नियोणलाभ किया है, तब उन्होंने दूत द्वारा कहला बुद्धद्वादशीव्रत ( स० क्ली० ) बुद्धके उद्देशसे अनुष्ठेय भेजा, भगवान क्षत्रिय थे और मैं भी क्षत्रिय है। अतः व्रतभेद, वह व्रत जो बुद्ध के उद्देश्यसे किया जाता है। मुझ उनके शरीरका एक अंश अवश्य मिलना चाहिये, बुद्धद्रव्य (म क्लो०) बुद्ध स्तूपाकारतो ज्ञात' द्रव्य । क्योंकि मैं उस अंशके ऊपर महास्तूप निर्माण करूंगा।। स्तौपिक, वह वस्तु जो स्तूपमें पाई जाय। वैशालीनगरके लिच्छवियोंने भी यही संवाद सूत द्वारा बुद्धधर्म (सं० पु०) बुद्धानां धर्मः. धुदेव द्वारा प्रचा- कहला भेजा। इसी प्रकार शक्यगण, अल्पकल्पके बुलयः रित अहिसादि धम। बुद्ध और बौद्ध देखा। ...