पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४५६

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बुधिकोट-चुना हो. तो इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। इस व्रतके अक्षा० १२५४ तथा देशा० ७८८ पू०के मध्य विस्तृत करनेसे दुग्न नहीं होता। है। जनसंख्या प्रायः १४६० है। यहां १७२२ ई०में हेमाद्रिके व्रतम्बंट भविष्यत्तरमें लिखा है - सत्ययगमें दाक्षिणात्य विजयी हैदर अली खांका जन्म हुआ था। इल नामक एक गजा थे। वे मंत्री आदिके माथ महादेव. उस समय उनके पिता फते महम्मद ग्वाँ शिराके नवाब- के शापसे हिमालय पर गये। जिस समय उन्होंने वहांकी के अधीन फौजदारका काम करते थे। भूमि पर पैर रखा उसी समय उनका स्त्रीरूप हो गया। बुधित (म०नि०) बुध्यने स्म सेट वुध-क्त । १ बुद्ध । २ बादमें घूमते घूमते घे उमाके वनमें पहुंचे, वहां बुध इनको ज्ञान । देव अपने घर ले आये। यह दिन अष्टमीयुक्त बुधवार युधियाल १ महिसुरराज्यके चित्तल दुर्ग जिलान्तर्गत एक था। इस कारण बुधवारयुक्त अष्टमी श्रेष्ठ मानी गई है। भृमम्पत्ति। भूपरिमाण ३६६ वर्गमील है। अतएव इस दिनका नाम बुधाष्टमी पड़ा । बुधके इस २ उक्त तालुकका विचार-सदर । यह अक्षा० १३३६ स्त्रीने एक पुत्र हुआ जिसका नाम पुरूग्वा रखा गया। उ० नथा देशा० ७६२५ पू० होसदुर्ग शहरसे १६ मील वे ही चंद्रवंशके आदि पुरुष हैं । बधाप्रमीके दिन व्रत दक्षिण-पूर्व में अवस्थित है। जनसंख्या प्रायः १११८ है। करनेसे सब प्रकारके अभीष्ट सिद्ध होते हैं। बुधवारमें १५वीं शताब्दीमें विजयनगरके राजकर्मचारियों द्वाग अष्टमी सम्पूर्ण होनेसे यह व्रत होता है, वण्डा तिथिमें निर्मित यहांके दुर्गमें १६वीं सदीको बहुत-सी शिला नहीं होता। लिपियां देखी जाती हैं। मुसलमान और मराठोंके इस व्रतको आरम्भ कर के आठवें वर्ष में प्रतिष्ठा करनी विप्लवसे यह दुर्ग तहस नहस हो गया है। १८३० ई०के होती है। गरुडपुराणमें लिग्वा है, कि जलाशयमें बुधकी गदरमें राजविद्रोहियोंने इस दुर्गमें आश्रय लिया था। यथाशक्ति पूजा कर ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये। बुधिल ( सं० वि०) बुध्यते यः बुध-किलच । विद्वान् । बादमें बुधाष्टमी व्रतकी कथा सुन पारण करना होता है। बुध्न ( स० पु०) बुनातीति बन्ध बन्धने (बन्धेर्प्रधिवी च । कथाका तात्पर्य यह है, पुराकालमें पाटलीपुत्र में वीर उगा ३१५) इति नक बुधादेशश्च । १ वृक्षमूल। २ मूल- नामके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नीका नाम । देश ३ अग्रभाग । रम्भा, पुनका कौशिक और कन्याका नाम विजया था बुध्नवत् ( स० वि० ) बुध्न-मतुप मस्य यः। मूल- मथा उनके धनपाल नामक एक थैल था। एक दिन बाह्मण युक्त। इनके माथ गङ्गा किनारे गये। वहां एक गोपालकने बुध्निय (म.लि. ) गाई पत्य अग्नि, बुध्न्य। वैलको चुरा लिया। गङ्गासे निकल जव ब्राह्मणने वृष- : बुध्न्य ( सं० पु०) बुध्ने मले भवः यत् । १ गार्हपत्य को नहीं देखा, तब वे बड़े दुःखित हुए और बैल हृढनेके अग्नि। २ अन्तरिक्षभव । ३ रुद्रभेद । लिये बनमें घूमने लगे। विजया पिपासातुर हो माता बुनना ( हिं० क्रि० ) १ जुलाहोंकी वह किया जिससे वे के साथ सरोवर किनारे गयी। वहां दिव्य स्त्रियां इस सूनों या तारोंकी सहायतासे कपड़ा तैयार करते हैं। बुधाष्टमोव्रतका आचरण कर रही थीं । उनको इस विशेष विवरण 'वयन-विद्या' शब्दमें देखो। २ बहुतसे तारों व्रतका आचरण करते देख इन्होंने भी व्रतका अनुष्ठान कर आदिकी सहायतासे उक्त क्रियाले अथवा उससे मिलती दिया। व्रतक फलसे बिजयाका यमके माथ विवाह जुलती किसी और क्रियासे कोई चीज तैयार करना। हुमा और कौशिक अयोध्या नगरके राजा हुये। ३ बहुतसे सीधे और बड़े सूतोंको मिला कर उनको ___ हेमाद्रिके बतखण्ड और व्रतपद्धतिमें इस व्रतका कुछके ऊपर और कुछके नीचेसे निकाल कर अथवा विशेष विवरण लिखा है । विस्तार हो जानेके भयसे यहां उसमें गोंट आदि दे कर कोई चीज तैयार करना। पर सविस्तार नहीं लिखा गया। बुना-पूर्व और मध्य वङ्गवासी एक जातिका नाम । इस बुधिकोट-महिसुरके कोलग जिलान्तगत एक प्राम। यह जातिकी गिनती धांगड़में की गई है।