पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४६०

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बुन्देला हुये तब देवी पंचमके सामने स्वशरीरमें आविर्भूत हुई दलबल संग्रह कर महोघे में राज्य स्थापित किया। उनके तथा बड़े प्रसन्न हो उनसे बोलीं, 'वत्स ! हमारे वरदानसे पुत्र प्रेमचन्दने बहुतसे युद्धोंमें सैयद और अफगान-सेना- तुम राज्यमें लौट जाओ और बहुत राज्योंको जीत कर को हराया। उनके तीन पुत्र थे जिनमेंसे विख्यात वीर एक मुदूरव्यापी जनपद बसाओ तथा सुखसे जीवनयात्रा भगवत राव महोवेके सिंहासन पर, मानसिंह शाहपुरमें निर्वाह करो। वत्म! तुमने हमारे सामने अपने जीवन और किन्नरसिंह सिमरोहमें रह राज्यशासन करते उत्सर्गमें जो रक्तविन्दु गिराया था उससे तुम्हारे जैसा थे। भगवन्तके पुत्र कुलनन्द बड़े धार्मिक थे। उनके यह पुत्र उत्पन्न हुआ। यह पुत्र विपत्तिमें और युद्धविग्रहमें खड्गराय, चन्द्रराय, शोभनराय, और चम्पत्राय नामके तुम्हें सहायता पहुंचायेगा तथा तुम्हारे ये वंशज बुन्देला चार पुत्र थे। राजा चम्पतराय मुगलसम्राट शाहजहां-. नामसे प्रसिद्ध होंगे। के प्रभावकी उपेक्षा कर उन्हें राजकर देनेसे इनकार पंचम राज्यमें लौट आये और काशीश्वरकी उपाधि ग्रहण चले गये। इस लिये सेनापति बकि खां उन्हें उचित कर राज्यशासन करने लगे। पोछे ये अपने पुत्र वीरसिंह- दण्ड देनेके लिये आया। इस युद्ध मुगल-सेना परा- को अयोध्याका शासनभार सौंप आप निश्चिन्त रहे । भूत हो लौट जानेको बाध्य हुई। राजा वीरसिंहने अपने भुजवलसे पूर्व दिशाके प्रदेशोंको गजा चम्पत्रायके पांच पुत्र थे -सर्वहन, अङ्गदराय, जीत अफगानके राजा सत्तर खाँ को हगया। बादमें जय रतनशाह, छवशाल और गोपाल । इनमेसे छलशाल प्रणोदित हो उन्होंने कालिञ्जर दुर्ग जीतनेकी इच्छासे ही बुदेला जातिकी गौरव वृद्धि करने में समर्थ हुए थे। दक्षिणको ओर प्रस्थान किया। कालिञ्जर और काल्पि क्षत्रशाल देखा। बिना प्रयासके उनके हाथ लगा। इसके अनन्तर उन्होंने राजा छत्रशालके यत्नसे सैकड़ों बुदेला सर्दारोंने महोनोतमें आ गज्य बमाया। अपनी वीरताके कारण एकत्र हो मुसलमानोंसे युद्ध किया था । छत्रपुरमें ये लौहधार नामसे विख्यात हुये थे। छत्रशालकी मृत्यु हुई। इस नगरमें उनका विख्यात ____ वीरसिंहके पुत्र गजा बलवन्तने भी पिताकी तरह : समाधिमंदिर आज भी विद्यमान है । हृदयशाह, राज्यशासन किया। उनके पुत्र अर्जुनपालने कुटहरा। जगन्गाय, पद्मसिंह, भत्त'चद प्रभृति चार पुत्र उनकी गढ़ पर अधिकार और जेनपुग्में राज्यस्थापन किया। प्रथम पत्नोसे और दूसरी स्त्रीसे उनके १२ पुत्र हुए थे। अर्जुनके पुत्र सुहिनपाल, सुहिनके महजेन्द्र, सहजेन्द्रके राजा छत्रशाल मृत्युके समय अपनी सारी सम्पनि लुनिर्गदेव, लुनिर्गदेवके पृथ्वीराज, पृथ्वीराजके ! दो भागोंमें बांट गये थे। हृदयसिंहने पनाराज्य पाया रामचन्द्र, गमचन्द्र के मेदनीमल्ल, मेदनीमलके अर्जुन' और जगन्गय जैतपुरके सिंहासन पर अधिष्ठित हुये। देव, अजुनदेवके पुत्र मालिक हुए और मालिकके पुत्र पन्ना शब्दमें पन्नाराजवंशका विवरगा देग्यो । उर्छाधिपति ग्यातनामा रुद्र प्रतापने सिंहासन पर बैठ जैत्पुर-राज्यमें जगत्राय अधिष्ठित रह राज्यशासन पुलकी तरह प्रजापालन किया था। उनके भर्नचन्द करते थे। उनके राज्यकालमें महम्मद खां वङ्गसेरके मधुकर ( मधुकर शाह ), उदयादित्य, कीर्सिशाह, भगन अदेशानुसार उनके सेनापति दलिल खाँ दलबल के साथ दास, उमादाम, चन्द्रदास, घनश्याम दाम, प्रयाग दाम, अग्रसर हुए। नवपुरिया नामक स्थानमें दोनों दलों में भैरवदास, और खण्डेराव आदि १२ पुन दया, माया घोर सङ्घर्ष हुआ। इस युद्ध में बुदेलाराव रामसिंहको और युद्ध आदि विषयों में पारदशीं थे। निहत देख प्रत्यापत्तन करते थे. ऐसे ही समयमें शता जा रुद्रप्रतापको मृत्युके बाद भत्तचन्द राजा हाथसे आहत हो जगत्राय अश्वपृष्ठसे गिर पड़े। छावनी- हुए। उनके बाद मधुकर शाह गजसिंहासन पर बैठे। में लौट कर उनकी पत्नी रानी अमरकुमारी पतिको न देख अन्य सब भाइयोंने इनकी अधीनता स्वीकार की : किन्तु भीत और चकित हो गई। फिर दृढ़चित्त हो स्वामी- उदयादित्यने अपने भुजबल और बुद्धिमताके साथ दर्शनकी प्रत्याशासे रणभूमिमें कूद पड़ी । ससैन्य