पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४६९

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बुलबुल है । इस समय इनको शोतल वायु और सब प्रकार- लता है कि, उसको केवल रक्त ही कहना चाहिये तथा की विरक्तिसे रक्षा करना उचित है । पक्षपरिवर्तनकालमें। इससे पक्षी दुबैल हो कभी कभी जीवन तक विसर्जन किसी किसी पक्षोका नासारन्ध्र बंद हो जाता है। ऐसी कर देता है। इस तरह शोणितस्राव देखने पर पहिले हालतमें एक या दो दिन पर्यन्त मक्खन, गोलमिर्चका । पीनेके जलके बदले में इनको पका हुआ बकरीका दूध चूर्ण और लहसुनका रस मिला कर नासारन्ध्रमें देना म्वाने देना चाहिये। इससे भी यदि रक्त निकलना बंद चाहिये। इससे भी यदि आगेग्य न हो, नो इस पक्षीके न हो, तो बकरी धके साश मेव मजाको पका कर इसे निक्षिप्त एक पंखको मक्खनमें भिगो कर उसे नाकके एक पीने जलके बदले में तीन चार दिन देना उचित है । इससे छेदसे प्रवेश करा दूसरे छेदसे हो कर बाहिर निकाल इनका शोणितस्राय बंद हो जायगा। ले। यदि एक वारमें इसके द्वारा नासारन्ध्रमें मक्खन न पक्षपरिवत्तनके बाद कभी कभी बुलबुलके मृगीरोग लगे, तो फिर इसी पंखको दूसरी बार मक्खनसे लपेट . होता है। मूच्छित होने पर इस पक्षीको बलपूर्वक शीतल कर उल्लिखित नियमसे नासारन्ध्रमें प्रवेश कराना आव- जलमें डबा कर स्नान कराना चाहिये। इससे आरोग्य श्यक है। अर्थात् नासारन्ध्रमें जिससे अच्छी तरह न हो, तो पांवको एक उंगलीका कुछ अंश काट कर रक्त मक्खन लगे वही उपाय करना चाहिये। फिर दो दिन अधिक मात्रा निकाल देना चाहिये। ऐमा करनेमे पर्यन्त नये बादामका सारांश जलके साथ घिसनेमे जो । मृगीरोग नष्ट हो जाता है। दुधकी तरह हो जाता है, उसे पानीके बदलेमें व्यवहार : यदि पक्षी विषादयुक्त हो, जंभाई लेने लगे और पंखों- करावे। इससे रुका हुआ नासारन्ध्र खुल जाता है। को भी उठाये रखे तो समझना चाहिये, कि इसके पेटमें नासारन्ध्रके रुक जानेसे कभी कभी इनका पक्षपरिवर्तन .. - दर्द होता है। इस अवस्थामें जलके साथ कुकुम विशेष बंद हो जाता है। इसलिये नासारन्ध्रको खोल कर पक्ष- : उपकारी है। परिवर्तनार्थ इस पक्षीको आमिष जलमें ( मछलीके धुप बुलबुलको कभी खांस रोग भी होता है । इस रोगमें जलमें ) स्नान करावे और पीनेके जलको कुकुमसे , - सिरकाको शहदके साथ मिला कर खिलानेसे फायदा आरक्त करके देवे । इस पक्षपरिवर्तनकालमें कभी कभी . होता है। बुलबुल वातरोगसे पीड़ित हो जाती है । किन्तु यथार्थमें . कोई कोई कहते हैं, कि चींटियां बुलबुलकी भयानक वह वातरोग नहीं है । वह बहुधा पैरकी हडोको आच्छादित करनेवाले मांसकी वद्धिके कारण होता है। पालत पक्षी- शत्रु हैं। बहुत लोग सुन कर आश्चर्य करेंगे कि चींटि- के ढाई वर्ष होने पर जवा और अंगुलिका अस्थि-

योको खानेसे बुलबुल मर जाता है। इस वास्ते इसके

आच्छादक चर्म बढ़ कर मोटा हो जाता है। बातरोग- : रक्षकको चाहिये कि चींटी न खाने दें अन्यथा यह सुमधुर की तरह पीड़ा मालूम होवे, तो पहिले आध घंटो बुल- . मनोहर गीत गानेवाली चिड़ियाको सदाके लिये अपने बुलके दोनों पैरको जलमें डुबो कर रखना उचित है। हाथसे खो बैठेगें। चाहे यह प्रवाद हो हो तो भी प्रति- इससे आरोग्य हो जानेकी बहुत कुछ संभावना है। पालकको इनसे सावधान जरूर रहना चाहिये। यदि आरोग्य न हो तो उष्ण जल अथवा तैल द्वारा पैर- बुलबुलका अच्छी तरह पालन करनेसे २४ २५ वर्ष के आच्छादक चर्मको नोंच कर फेंक देना चाहिये। तक वह जिन्दा रह सकती है। एक वर्षमें आठ नौ मास अस्थि-आच्छादक चर्मको उठा देनेमें तैल अथवा थोड़ तक सुललित मनोहर कण्ठसे गाती है। मुसलमान गर्म जलमें पहिले १०११५ मिनट पक्षीके दोनों पैर भिंगो वादशाहोंके जमानेमें इस पक्षीका बहुत आदर था इसी. देवे पीछे सावधानीसे अस्थि-आच्छादक चमको हटा लिये पारसी भाषामें इसकी प्रशंसा ज्यादा की गयी है। कर इसके स्थानमें तैल मल देना उचित है। इस फारसो और उर्दू के कवि इसे फूलोंकी प्रेमी नायकके समय कभी कभी इनके मलके साथ ऐसा रक्तस्राव निक- स्थानमें मानते हैं।