पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४९

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फटकी-फड़कना यह गोवरियासे कम विला होता है और उससे छोटा (Alumen, Alum), भिन्न भिन्न देशमें यह भिन्न भिन्न नाम- भी होता है। से प्रसिद्ध है, तैलङ्ग--पटिकुरम, तामिल---पडिका- फटको ( स० स्त्री० ) स्फटिकारी, फिटकरी। रम, दाक्षिणात्य --फटक्री, गुजर-फरी, बम्बई ---- फटको (हिं० स्त्री० ) १ एक प्रकारका पिंजड़ा जो टोकरी- फटिकी, बङ्गालः - फटकिरी । इराका गुण --संग्राही, के आकारका होता है। इसमें चिड़ीमार चिंडियोंको सङ्कोचक, अपूर्तिकर, बालविसूची, उदरामय और नासा- पकड़ कर रखते हैं। २ फटका देखो। रक्तस्रावमें हितकर, तथा कटु, स्निग्ध और कषाय एवं फटना (हिं० क्रि० ) १ आघात लगनेके कारण अथवा । प्रदररोग, मेहकच्छ, वमन और शोषनाशक है। यों ही किसी पोली चीजका इस प्रकार टूटना या खंडित विशेष विवरण फिटकरी शब्दमें देग्यो । होना अथवा उसमें दरार पड़ जाना जिसमें भीतरकी फट्ठा ( हिं० पु० ) १ चीरी हुई बाँसको छड़, फलटा। २ चीजें बाहर निकल पड़े अथवा दिखाई देने लगे। २ : टाट । किसी घने तरल पदार्थमें कोई ऐसा बिकार उत्पन्न होना : फट्टी (हिं० स्त्री०) बांसकी चिरी हुई पतली छड़। जिससे उसका पानी और सार भाग दोनों अलग फड़ (हिं० स्त्री०) १ जूआ खेलनेको एक रीति । एक चौग्वटी अलग हो जाय। ३ किसी बातका बहुत अधिक होना। गोलोकी एक एक पीठ पर कुछ शून्य चिह्न देने होते हैं। ४ झटका लगनेके कारण वा और किसी प्रकार किसी एक ओर ५ और दूसरी ओर ७ आदि चिह्न रहते हैं। अब वस्तुका कोई भाग अलग हो जाना। ५ किसी पदार्थका उस गोलीको किसी एक बरतनमें रख कर जमीन पर बीचसे कट कर छिन्न भिन्न हो जाना। ६ पृथक हो औंधे रख देते हैं। जुआरी उस गोटीके शून्यचिह्नके अनु- जाना, अलग हो जाना। ७ असह्य वेदना होना, बहुन सार ५, ७, ३, २ आदि जिसे जैसा सूझता है, उसीके अधिक पीड़ा होना। अनुसार बाजी रखता है। बाजी रखने के बाद उस बर- फटफट ( हि स्त्री० ) १ फटफट शब्द होना। २ व्यर्थकी तनको हाथसे अलग कर लेते हैं। अब उस जमीन पर बात, बकवाद । ३ जूते आदिके पटकनेका शब्द। पड़ी हुई गोटीके ऊपर जो चिह्न रहता है उमीके अनु- फटफटाना ( हिं० क्रि० ) १ व्यर्थ बकवाद करना ।२ हिला सार हार जीत होती है, अर्थात् उस गोटीके ऊपरवाले कर फट फट शब्द करना। ३ टक्कर मारना, इधर उधर चिह्न पर बाजी रखी है उसकी जीत और शेष सबोंकी हार मानी जातो है। पहले इस खेलका बहत प्रचार था। पर फट शब्द होना। अब आईनके अनुसार दण्डनीय हो गया है। फटा ( स० स्त्री०) फट-स्त्रियां टाप् । १ फणा, सांपका २ जूएका व जिस पर जुआरी बाजी लगा कर जूआ खेलते हैं। ३ पक्ष, दल। ४ वह स्थान जहां "निर्विषेणापि सर्पण कर्तव्या महती फटा। जुआरी एकल हो कर जुआ खेलते हों, जएका अड्डा । ५ विषं भवति मा वास्तु फटाटोपो भयङ्करः ॥” वह स्थान जहां दूकानदार बैठ कर माल खरीदता या (पञ्चतन्त्र ३८३) बेचता हो । ६ वह गाड़ी जिस पर तोप चढ़ाई जाती है, २ दम्म, घमंड, गरूर। ३ छल, धोखा । चरन । ७ गाड़ीका हरसा। ८ फर देखो। फटा (हिं० पु०) छिद्र, छेद। फड़क ( हि स्त्री० ; फड़कनेकी क्रिया या भाव । फरिक (पा० पु०) १ कांचकी तरह सफेद रंगका पार- फड़कन (हिं० स्त्री० ) १ फड़कनेकी क्रिया या भाव, फड़- दर्शक पत्थर, बिल्लौर । २ सङ्ग-मरमर, मरमर पत्थर। फड़ाहट । २ धड़कन । ३ उत्सुकता, लालसा । (वि०) ४ फटिका (हिं० स्त्री०) एक प्रकारकी शराब । यह जो भड़कनेवाला। ५ तेज, चंचल। आदिसे खमीरको उठा कर बिना खींचे बनाई जाती है। फड़कना ( हिं० स्त्री० ) १ फड़ फड़ करना, फड़फड़ाना । फटिकारी (सं० स्त्री०) स्वनामख्यात क्षारविशेष, फिटकरी २ गति होना, हिलना डोलना । ३ स्थिर रहमा, तह