पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५०७

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बेरार (वरार) ५०१ १५२६ ६०में उक्त ब्राह्मनीषंशका अधःपतन होने पर, को पृथक् पृथक् शासनकर्ताओंके अधीन छोड़ दिया दाक्षिणात्य वास्तवमें पांच मुसलमान राजवंशों के अधीन उस समय बरार, पयानघाट, जालना और खानदेश शासित दुआ था। उस समय इमादशाही राजा बरार एक ही विभागमें था। परन्तु यह व्यवस्था विशेष लाभ- राज्यके अधिपति थे। इलिचपरमें उनकी राजधानी थो।। प्रद न होनेसे फिर उक्त दोनों विभाग एक ही में मिला प्रवाद है, कि इस राजवंशके अधिष्ठाता एक कनाडी दिये गये और एक हो शासक द्वारा उसका शासन किया हिन्दू थे जो युद्धमें बन्दी हो कर बरारके शासनकर्ता खाँ गया। १६१२ ई० में यहां पहले पहल कर लगाये जानेकी जहानके समक्ष लाये गये थे। खां जहानने उनकी बुद्धि व्यवस्था हुई थी। बादमें शाहजहांके समय उसका और शक्तिका परिचय पा कर उन्हें राजकीय उच्च पद बहुत कुछ संस्कार हुआ था। १६३७-३६ ई०में फसली पर नियुक्त किया। धीरे धीरे वह इमाद-उल-मुल्ककी सन् चलाया गया था। उपाधिके साथ सेनानायक के पद पर नियुक्त रहा। इसके बाद १६५० ई. तक बरारका प्रादेशिक स्वतन्त्र इमादशाह पीछे बरारके स्वाधीन राजा हुए थे इमादके कोई इतिहास नहीं मिलता। उस समय दक्षिण भारत- बंशधर उनके समान शक्तिशाली भऔर सौभाग्यवान् | में मुगल, मराठा और मुसलमान राजाओंमें परस्पर नाना न थे। इन लोगोंको राज्य-रक्षामें असमर्थ जान १५७२ स्थानोंमें युद्ध चल रहा था। १६५०से १७१७ ई० तक ईमें बीजापुर और अहमदनगरके राजाओंने मिल कर मुगल बादशाह औरङ्गजेब दाक्षिणात्यके युद्धमें लिप्त थे बरार पर आक्रमण किया और बरारराज्य अहमदनगरके उस समयका बरारका इतिहास औरङ्गजेबके दाक्षिणात्य- करतलगत हुआ। परन्तु अहमदनगरके राजा उसका विजयसे संश्लिष्ट है । १७०७ ई में औरङ्गजेबकी मृत्यु हुई। अधिक दिन तक उपभोग न कर सके । १५७६ ईमें उसके बाद बरार प्रदेश मराठा और मुगल-सेनाओं के उन्होंने अपनी रक्षाके लिए बरारप्रदेश मुगल सम्राट अक लूट-मार और भग्निदहनादि अत्याचारका केन्द्रस्थल बरशाहको सौप लिया । १५६६ ईमें दाक्षिणात्यके : रहा। इसी समयसे वास्तवमें इस देशको प्रजासे उपलब्ध राज्योंका बन्दोवस्त करनेके लिये सम्राट स्वयं महाराष्ट्रगण सरदेशमुखी और चौथ वसूल करने लगे बुरहनपुर पहुंचे। उन्होंने अपने पुत्र कुमार दानिपलको : थे। १७१७ ई०में सम्राट् फर्रुखशियरके सैयदवंशीय बरार और अन्यान्य प्रदेशके प्रतिनिधि नियुक्त कर उस मन्त्रिगण भी कर देनेके लिए वाध्य हुए थे। । ७२०ई०में प्रदेशके शासनको व्यवस्था को। "आईन इ-अकबरी में दाक्षिणात्यके मुगल-प्रतिनिधि चीन फिलिच खाने बरार सूर्य का राजस्व और परिमाणादि लिखा हुआ है। निजाम-उल-मुल्क नाम धारण कर स्वाधीनताके लिये १६०५ ईमें सम्राट अकबरशाहकी मृत्यु होने पर प्रयास किया। इस पर दो सैयद मस्त्रियोंने उनके विरुद्ध मुगल-राजसरकारमें राज्यव्यवस्थाको बड़ो गड़बड़ी हुई। सेना भेजी। परन्तु उस सेनाको उन्होंने युद्धमें परास्त मुगलदरबारके उत्तर-भारतमें शृङ्खला स्थापनके लिए कर दिया और इस प्रकार वे अपना प्रभुत्व विस्तार व्यस्त रहनेसे दक्षिण भारतके नवाधिकृत प्रदेशोंके शासन करनेमें समर्थवान् हुए। इस समय बरारके सूबदार में वह विशेष ध्यान न दे सका। इसी समय बरारको उनके साथ मिल गये थे। १७२१६ ०में बुरहनपुरमें प्रथम अरक्षित देख कर दौलताबादके स्वाधीनता-प्रयासी निजाम यद्ध भऔर उसके बाद ही बालापरमें दसरा यद्ध हुथा। शाही राजा मालिक अम्बरने बरारके कुछ अंश पर उसके उपरान्त १७२४ ई० में खुलदाना जिलेके सखर- अधिकार कर लिया। १६२८ ई०में उनके मृत्यु-समय खेलदा नामक स्थानमें तीसरा वा अन्तिम युद्ध हुमा। तक बरार निजामशाही वंशके अधीन रहा। उसके बाद तबसे सखरखेलदा “फते-खेलदा" के नामसे प्रसिद्ध हुआ १६३०ई० में मुगलोंने उसे जीत कर वहां दिल्लीश्वरको है। इस युद्धके वादसे वरार प्रदेश १८वीं शताब्दी तक शासन-शक्ति स्थापित की। मुगल सम्राट शाहजहांने नाममात्रके लिये हैदराबाद-राजवंशके अधीन रहा। अपने दाक्षिणात्य-राज्यको दो भागोंमें विभक्त कर दोनों ईसाकी १७वीं शताब्दीके शेषभागसे ही बराराज्यको Vol. xv. 126