पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५३६

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बौद्धधर्म निर्वाण दो प्रकारका है. अहम् इस स'सारमै रह अस्थि, कृमि प्रभृति द्वारा देहका जो अवस्थान्तर होता कर जो निर्वाणलाभ करते हैं, वह वैदान्तिकोका जीव- है, यह इस अशुभ द्वारा हो सूचित हुआ करता है। न्मुक्ति कहा जा सकता है। यही प्रथम निर्वाण है। उक्त दश प्रकारके अशुभ तथा चार प्रकारके ब्रह्म- इसका दूसरा बौद्धनाम उपाधिशेष है। अन्य निर्वाण- उपाधिशष है। अन्य निवाण- विहार ४० 'कम्मत्थान' या धर्म कार्यके अङ्गविशेष विसु. का नाम है परिनिर्वाण । मृत्युके बाद बुद्धगण इसी द्धिमा गमें वर्णित है। ललितविस्तरमें ये सब १०८ निर्वाणके अधिकारी होते हैं। इस निर्वाणलाभसे कर्मालोकमुखके अन्तर्निविष्ट हैं। अशुभभावनामें एक चिरकालके लिये सभी प्रकारको पार्थिव यन्त्रणाका प्रकारको गूढ साधना भी है जिसका नाम कसिण अथवा अवसान होता है। यह विशुद्ध आनन्दको अवस्था तथा कृत्स्नायतन है । इस साधनाके समय जिन दश वस्तुओं- अनन्तकालस्थायी है। के प्रति मनःसंयोग कर भावना करनी होती है, उसके ___ इस परिनिर्वाण-प्राप्तिके बाद अनुभवक्षमता वत्त । नाम ये हैं ; यथा मृत्, वारि, अग्नि, वायु, नील, पीत, मान रहती है या नहीं, यही एक आलोच्य विषय है । लोहित, श्वेत, आलोक और शून्य या व्योम भावना। बौद्धधर्म का मूलसूत्र ले कर विचार करनेमें निर्वाणप्राप्ति- ___ उक्त चालीस प्रकारके मध्य दश प्रकारको अनुस्मृति- के वाद अनुगवक्षमताका रहना सम्भवपर प्रतीत नहीं। होता, किन्तु इस विषय में बौद्धोंके मनमें भी विषम का उ लेख देवनेमें आता है। यथा-बुद्ध, धर्म, सङ्घ, सन्देह जान पड़ता है। कारण, उन्होंने जब बुद्धसे सुना, देवता, नीति त्याग, मृत्यु, देह, आनापानस्मृति (निश्वास प्रश्वासकी नियमाकता) तथा शान्ति या कि वे पूर्व जन्मकी सभी घटनाए कह सकते हैं. तव निर्वाण । उनके मनमें यह संस्कार हो सकता था, कि निर्वाणप्राप्तिके बाद भी स्मृति और अनुभव रहनेकी सम्भावना है। जो आनापानस्मृति द्वारा निश्वास प्रश्वासके प्रति मन कुछ हो, इस सम्बन्धमें आलोचना करना महात्मा बुद्ध- निविष्ट कर कितने हो निर्दिष्ट विषयकी चिन्ता करनी का ही निषेध है। होती है; यह अति उच्च अङ्गको समाधि है। धर्म-साधना। कमत्थानके मध्य 'आरुण्य' नामक चार विशेष हैं, निर्वाण प्राप्तिको चेष्टा करनेमें बहुत ध्यानधारणाका ये भो ब्रह्मलोकानुगत हैं। इन चारों के नाम हैं 'आकाशा- प्रयोजन है । इस उच्च अवस्थाका आयोजन करनेमें जिस नाञ्चायतन ( आकाशानन्त्यायतन ) 'विज्ञानाश्चायतनं' सोपानकी आवश्यकता है, उसका नाम भावना, ( अर्थात् (विज्ञानान्त्यायतन), 'आकिश्चमायतन' ( आकिञ्चन्या- चर्चा या अनुशीलन ) है। इसके चार स्तर हैं -मैत्री, तन ) और 'नेवसभामानासञ्चायतन' ( नैवसंज्ञा-नासे- करुणा, मुदिता ( सन्तोष ) और उपेक्षा । योगियोंकी। ज्ञायतन ) । जो ध्यान और समाधि द्वारा ये सब साधनानस्थाके साथ इसका साद्श्य है। इसका दूसरा लोकविषयलाभ करनेमें समर्थ हैं उन्होंने ही धर्मकी साधारण नाम ब्रह्मविहार है। अत्यन्त उच्च अवस्था प्राप्त की है। इससे भी एक उच्चतर समयानुसार और भी एक भावनाका उल्लेख देखनेमें अवस्था है जिसका नाम है संझावेदितनिरोध । इस अव- आता है। उसका नाम 'अशुभ' भावना अर्थात् शरीरमें स्थामे माधकको विमोश्न लाभ होता है । जो सब घृणि। भाव है, उनकी उपलब्धि है। यहां यद्यपि कम्मत्थानके मध्य चार प्रकारके ध्यानका भावनाका अर्थ चर्चा नहीं ; किन्तु उपलब्धि है। यह विशेष उल्लेख नहीं है, किन्तु स्वरूप मिला कर देखनेसे अशुभ दश प्रकारका है। पालिप्रन्धमें इस दश अशुभ मालूम होगा, कि चार प्रकार ध्यानकी अवस्था साधना- भावनाके नाम ये हैं-१ उधुमातक, २ विनीलक, ३ के चार अङ्गविशेषरूपमै वर्णित है। यहां पर यह कह देना विपुवक, ४ विच्छिङ्गक, ५ विक्वायितक, ६ हतविक- आवश्यक है, कि बौद्धधर्म प्रचलनसे बहुत पहले हो खित्तक, ७ लोहितक, ८ पुढ़वक, 6 अद्विक । रक्त, मांस,। ध्यानकी प्रथा प्रचलित थी। किसी किसीके मतसे