पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५५५

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बौद्धधर्म ५४६ १म संगोति । | पिटक पुनः संशोधित हुए थे। किसी किसोका कहना प्रथम सङ्गीतिके सम्बन्धमें पालि ग्रन्थ में जो विवरण है, कि 'अभिधर्म को भी पुनरावृत्ति हुई थी। उपालि और दिया गया है, वह इस प्रकार है : --बुद्धदेवको मृत्युके आनन्दका कार्य भी मभी स्वीकारते हैं । काश्यप बाद सुमह (सुभद्र) नामक एक भिक्षु ने अपने सह-: कत्तक धूतवाद व्याख्याकी बात भी कोई कहते हैं। योगियोंको यह मन्त्रणा दी, "तुम लोग बुद्धको मृत्यु पर यथार्थमें बुद्धदेवकी मृत्युके बाद उनके शिष्यगण दुःख विलाप न करो। वृद्ध श्रण मरे नहीं हैं, वरन् : कर्तव्याकर्तव्य के निरण के लिए राजगृहमें ममवेत हुए हम लोगोंने छुटकारा पाया है। वे हमेशा 'यह करना थे, यह ऐतिहासिक सत्य है। किन्तु बहां विपिटक, उचित है और यह नहीं, ऐसा कह कर हम लोगोंको तंग विनय या सूत्रको आलोचना या संशोधनके सम्बन्ध में करते थे। अब हम लोग स्वाधीन हो गए -जो इच्छा : किस प्रकार निर्झरित हुआ था, यह ठीक करना कठिन होगी वही करेंगे।" है। त्रिपिटक, विनय और सत्र देखो। यह बात सुन कर भिक्षुगण बड़े ही दुःखित हुए श्य सङ्गीति। और इस उत्पातसे बचनेके लिए बुद्ध के प्रिय शिष्य समस्त बौद्ध विवरणसे मालूम होता है, कि वैशाली महात्मा काश्यपने प्रस्ताव किया, कि बुद्धदेव के उपदेशकी नामक स्थानमें द्वितीय सङ्गीतिका अधिवेशन हुआ था। आवृत्तिके लिये सभी भिक्षु ओंको एकत्र होना आवश्यक ये सब विवरण ऐतिहासिक से प्रतीत होते हैं; किन्तु हैं। काश्यपके इस प्रस्तावका सबोंने अनुमोदन कर इनकी तारीख और अन्यान्य छोटे छोटे विवरणके उन्हीं से पांच सौ अर्हत् चुननेका अनुरोध किया। बाद सम्बन्धमें मतपार्थक्य है। यह स्थिर हुआ, कि राजगृहमें इस सम्मिलनका अधि- इस सङ्गोतिके सम्बन्धमें पालिग्रन्थमे ऐसा विवरण वेशन हो। राजगृहके समीप 'वेभार' (वैभार ) पर्वत- मिलता है, -बुद्धदेवकी निर्माणप्राप्तिके एक सौ वर्ष की 'सत्तपन्नी' (सप्तपणी) गुहामें सात महीनेके परिश्रम बाद वैशालोके वृजि भिक्षओंने निर्धारण किया, कि स्वर्ण से उपालिको सहायतासे "विनय' और आनन्दकी रौप्यादिका उपहारग्रहण, मध्याह्न भोजन, दुग्धपान प्रभृति सहायतासे "धर्म" नामक बौद्धधर्मशास्त्र निश्चित हुआ। दश कर्म वैध है। बाद काकण्डकके पुत्र स्थविरयशा वहां कोई कोई पाश्चात्य पण्डित कहते हैं, कि इसमें आये और वृजि भिनओंके ऐसे व्यवहारको देख उनका कोई ऐतिहासिक सत्यता नहीं है-यह कल्पनाप्रस्तुत तीन प्रतिबाद किया। भिक्ष ओंने उनकी एक भी न सुनी उपकथा मात्र है* । महापरिनिर्वाणसूत्र में सुभद्रके उपरि और उलटे उन्हें नाना प्रकारसे अपदस्थ करने को चेष्टा करने उक्त व्यवहारका उल्लेख तो है पर उससे सङ्गोनिका; लगे। इस पर उन्होंने जि भिक्ष आमसे एकको प्रति. आह्वान हो सकता है, ऐसा कोई भी कारण होनेकी । निधि मान कर बशाली नगरके बौद्धगुणियोंके सामने सम्भावना नहीं देखी जाती। सारा हाल कह सुनाया। उन्होंने सारी रामकहानी महावस्तु ग्रन्थमें लिखा है, कि काश्यपके सङ्गीति सुन और यशाको युक्तिका सारतत्त्व समझ कर उन्हींको आह्वानका कारण कुछ और था । बुद्धदेवको मृत्युके बाद प्रकृत श्रमण चून लिया तथा भिक्षु ओंके कार्यको निन्द- मौद्धगण उनके उपदेशका प्रतिपालन नहीं करते थे और नीय बतलाया । भिक्षु ओंके प्रतिनिधि यह खबर पा इसो निन्दाके भयसे उन्होंने सभी अहंतोंको एकत्र किया कर भी शान्त न हुए, वरन् वृजि भिक्षु ओंने यशाको था। इस प्रन्थसे पता चलता है, कि वैभार पर्वतके उत्तर ससे निकाल बाहर किया । उसो समय यशाने सप्तपर्ण गुहामें यह अधिवेशन हुआ था। कौशाम्बी जा कर पश्चिमाञ्चलमें अवन्ती नगर और जो कुछ हो, जो सब विवरण मिलते हैं, प्रत्येकमें दक्षिणाञ्चलमें समस्त भिक्षु ओंके पास दृत भेज कर देखा जाता है, राजगृहमें ही विनय और धर्म ये दो सबो को सम्मिलित होने के लिए कहा । इन्होंने स्वयं

  • Ollenberg, Intro Maharagga, p. XXV

वासी सम्भूत-साणवासी नामक महा-