पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५६६

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वौद्धधर्म भारतमें बौद्धधर्म के प्रभावकालोप । - उड़ीसाके पार्वात्य प्रदेशोंमें बौद्धधर्मके निदर्शन देख गए तान्त्रिकताका प्राधान्य जब आरम्भ हुआ उसी समय हैं। आज भी उनको स्मृति मयूरभञ्जके पार्वात्य प्रदेशमें से बौद्धधर्मकी अवनति होने लगी। इसके लिए केवल मौजूद है। हिंदू हो दायी नहीं थे। वौद्धगण भी अन्त में इस तान्त्रि काश्मोरमें लगभग १४वीं शताब्दोके मध्यभाग तक . कतामें आस्था स्थापन कर नाना प्रकार के अलौकिक बौद्धप्रभाव विद्यमान था । १३४० ई०में मुसलमानोंके क्रियाकलाप और सिद्धिलाभको आशामे इसको चर्चा आधिपतालाभ करने पर लादकको छोड़ कर और दूसरे करते थे। असङ्गका निरोभाव और धर्म कोर्तिके अवि स्थानसे बौद्धधर्म निरोहित हो गया। र्भावके समय बौद्धतान्त्रिकताको परिपुष्टि माधत हुई। वङ्गदेशमें १६वीं शताब्दी तक भी बौद्धधर्मका भोटदेशी लामा तारानाथने लिखा है, कि धर्मकीत्तिके आलोक प्रज्वलित था। १५वीं शताब्दीको बङ्गालके बाद ही अनुत्तर-योग प्रबल हो उठा था। एक राजाने गयाके बोधिवृक्षके पादपीठका जीर्ण संस्कार गौड़के पालराजगण वौधधर्मावलम्यो थे, इसके किया था । उड़ीसाके राजा मुकुन्ददेव हरिचन्दन प्रमाणका अभाव नहीं है । इन पालराजाओंकी सभा- यद्यपि हिन्दू थे, तो भी उनके राजस्वकालमें बाद्ध भाव में बहुतसे सिद्धवनाचार्यने नाना अलौकिक कार्य दिखा पुनः सजीव हो उठा। बादमें मुसलमानोंने आ कर उस दिखा कर जनसाधारणको विमुग्ध किया था । वहो चिरागको बुझा दिया। समय वज्रयानका परिणति-काल है। उसी समय गुरु जो सब आचार्य नेपाल गए थे उनके पार्षद वहां फत्तक कानमें तान्त्रिक बीजमन्त्र देनेकी व्यवस्था हुई। बज्रयानके प्रवर्तक हुप । इस संप्रदायके मध्य वज्राचार्य- पालवंशने ७७५-११६१ ई० तक राज्य किया । उस ने सर्वप्रधानगुरुका आसन ग्रहण किया था। आज भी समय विक्रमशिलाका मठ तान्त्रिकशास्त्र-चर्चाका एक ! नेपालमें 'वज्रयान'को प्रवलता है। यह संप्रदाय घोरतर प्रधान स्थान था। तान्त्रिक तथा पञ्चमकारका उपासक है। नेपालकी पालराजवंशके बाद सेनराजगण प्रवल हुए। ये तरह तिब्बतमें भी वज्रयान या कालचक्रयानकी प्रधानता लोग यद्यपि हिन्दुधर्मावलम्बी थे तथापि बल्लालसेनने देखी जाती है। नेपाल, तिब्वत, चीन, जापान, ब्रह्ल, श्याम, स्वयं तान्त्रिकधर्म ग्रहण कर बौद्धोंके प्रति अत्याचार लामा आदि शब्द देखा। नहीं किया। १२०० ई०में अर्थात् मुसलमान बिजयके वङ्गाल और विहार आदि देशोंसे भाग कर बौधोंने बाद मगधसे बौद्धधर्म विलकुल तिरोभाव हो गया। : नेपालमें आश्रय लिया। वहां उसके प्रति किसी प्रकारका उद्दण्डपुर और विक्रमशिलाका भठ भूमिमात् हुआ। अत्याचार न हुआ। अब भी नेपालमें बहुतसे बौद्ध भिक्षु ओंमेंसे कुछ तो मारे गए और कुछ भागे। उन्होंने बास करते हैं । किंतु धर्मके प्रति अनुराग, संसार- उड़ोमा, नेपाल, ब्रह्म, कम्बोज आदि देशों में जा कर आश्रय वितृष्णा, मुक्तिकी ऐकान्तिक वासना आदि जो बौद्धन लिया। उनमेंसे बौद्धाचार्य शाक्यश्री पहले उड़ीसा, : धर्मके आकर्षणके विषय थे उनमेंसे कुछ भी इस समय बाद तिब्बतमें, रत्नरक्षित नेपालमें, बुद्धमित्र तथा उनके वर्तमान नहीं है। अनुसचिगण दक्षिणभारतमें, मङ्गम श्रीज्ञान पार्षदके साथ आज भो नेपा में नाममात्र बौद्धभिक्षु देखे जाते ब्रह्म और कम्बो प्रभृति स्थानों में चले गए । कितु जिस हैं। यथार्शमें वज्राचार्य या गृहीतान्त्रिक गुरुका आणि जिम स्थानमें उक्त महात्माओंने पदार्पण किया था, वहां पत्य ही प्रबल है। एक समय जहां मुक्तिकामी हो कर बौद्धधर्मका क्षीण दीपालोक बहुत दिनों तक जलता रहा सभी तन्त्र तथा धारणी समूहको श्रवण करते थे, अमी था। अब भी दक्षिण बङ्ग, उड़ीसा तथा दक्षिण भारतके . वही अर्थकरी व्यवसायमें परिणत हुआ है। स्थान स्थानमें बौद्धप्रभावको क्षीण स्मृति विद्यमान है। वत्तमानकालमें नेपालके बौद्धदार्शनिक समाजमें १८वीं शताब्दी तक भोटदेशीय तीर्थयात्री त्रिपुरा और स्वाभाविक, ऐश्वरिक, कार्मिक तथा यात्निक ये चार