पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७

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३१ फतेसिंह अहलूवालिया आज भी विद्यमान है। इन्हींकी कृपासे अकबरने पुत्र-। बदल कर ली। अब दोनोंने ही मिल कर कसुरके पठानोंके लाभ किया था, इस कारण उनके पुत्रका नाम सलीम विरुद्ध युद्ध यात्रा कर दी। किन्तु अकृतकार्य हो वे रखा गया। दरगाहके उत्तर अबुल फजल और उनके भाई वितस्ता ( Ba५ ) पार कर पुनः अपने दलकी पुष्टि करने फैजीका आवासभवन है। अभी उस अट्टालिकामें स्कूल लगे। लगता है। पूर्वकी ओर अकबरकी प्रधान महिषीका १८०५ ई०में यशोवन्तराव होल्करने अगरेजोंको प्रासाद है। सोपानसंयुक्त उच्च स्थानमें वीरबल और मार भगानेके लिये पञ्जाब सरदारसे मेल करना चाहा; पर हृष्टान कुमारीका आवास-भवन है। प्रवाद है, कि इसी बीच १८०६ ई०में अगरेजोंके साथ फतेसिंह और अकबरने वीवी मरियम नाम्नी जिस पुर्तगीजकन्याका रणजित्को सन्धि हो गई। उस सन्धिके बलसे लाई पाणिग्रहण किया था, उसके रहनेके लिये उन्होंने यह लेकने मराठा सरदारको वितस्ताके पार मार भगाया था। सुन्दर अट्टालिकादि बनवा दी थी। एतद्भिन्न दिवानी फतेसिंहके साथ रणजित्को मित्रता दिनों दिन स्वास और दीवान-इ-आम (विचारगृह और मन्त्रणा गहरी होती गई। १८०६ ई०में दोनों ही शतद्र के दक्षिण गार ) नामक अट्टालिका विशेष चित्तहारी है। हस्तिद्वार और झङ्ग प्रदेश जीतनेके लिये अग्रसर हुए । १८०७ ई०में का हस्तिमुण्ड स्वम्राट अकबरसे नष्ट हुआ था। हिरण- झङ्गके सियाल सरदार अहमद खाँ बिताड़ित हुए. और मिनार नामक स्मृतिस्तम्भ प्रायः ७० फुट ऊंचा है। उनका दुर्ग अधिकृत किया गया। १८०८ ई०में अङ्गारेज- अलावा इसके और भी कितनी प्राचीन अट्टालिकायें प्रतिनिधि सर चाल्र्स मेटकाफ जब पञ्जाव पधारे तब विद्यमान हैं। फतेसिंह दो हजार सेना ले कर माखमचांदके साथ उनके आगरेसे आज भी बहुतेरे यह श्रीहीन सौन्दर्य देखने स्वागतमें आगे बढ़े। फतेसिंहकी धीर और विनय- आया करते हैं। गत सौन्दर्यके साथ साथ यह स्थान नम्र प्रकृति देख कर मेटकाफने लिखा है, कि फतेसिंहमें जनहीन हो गया है। १८५७ ई में नीमच और नमीरा-: यदि ऐसी उदारता न रहती, तो रणजित् कमी भी ऐसे वादके विद्रोही दलने इस स्थानको अधिकार किया था।: उच्चमार्ग पर न पहुंच सकते थे। वे किसी भी अंशमें पीछे नवम्बरमासमें वह फिरसे अगरेजोंके हाथ लगा। : रणजित्ने न्यून थे, मेटकाफ साहबने स्वीकार नहीं वर्तमान फतेपुर नगर उक्त तंसावशेषके दक्षिण किया हैं। पश्चिम और मिकरी ग्रामके उत्तर-पूर्वमें अवस्थित है। अमृतसरमें राज्यसीमा ले कर अगरेजबहादुर और किन्तु ये दोनों हो स्थान अकबरकी प्राचीर सीमाके महाराज रणजितसिंहमें जो सन्धि हुई थी, उस उपलक्षमें अन्तभुक्त है। १५९६ ईमें आईन-इ-अकबरीमें मिकरो ये भी वहां उपस्थित थे। १८०६ ई०में उन दोनोंने प्राम मुगल राज्यका एक प्रधान स्थानके जैसा उलिखित ! काङ्गडाकी ओर युद्ध-यात्रा की। १८१० ईमें रणजित्के हुआ है। अकबर के समय यहां बाल, रेशम और पत्थर- मूलनान जाने पर लाहोर और अमृतसरका रक्षाभार के तरह तरहके कारुकार्य सम्पादित होते थे। अभी इन्हींके ऊपर सुपुर्द था। १८११ ईमें वे दोनों शाह- सूतो कालीन और चक्कीका पार हो प्रधान व्यवसाय सुजाके भाई सुलतान महमूदसे । लनेके लिये रावल समझा जाता है। शहरमें केवल दो स्कूल हैं । जिनमें ! पिण्डी गये। उसी साल फतेसिंहने जलन्धरराज-सर- अगरेजी और हिन्दी दोनों ही पढ़ाई जाती है। दार बुधसिंहका राज्य जीत कर उनकी मारी सम्पत्ति फतेसिंह अहलूवालिया----पञ्जाबको अहलूवालिया मिसलके ! छीन ली। काबुलके वजीर फते खाँके साथ उन्होंने एक सरदार । भागसिंहके बाद १८०१ ई०में ये हो दलपति १८१३ ई०की हरदै-युद्ध में जो वीरता दिखलाई थी, उससे पद पर नियुक्त हुए। इसके बाद इन्होंने सुकर्चिया दल- काबुलो-सेनापतिको जान ले कर भाग जाना पड़ा था। के अधिपति ख्यातनामा रणजित्सिंहके साथ पवित्र बहबलपुर, रजोरी, भीमवर आदि अभियान तथा १८१८ प्रन्थ छूकर मेल कर लिया और आपसमें पगड़ी ई०के मूलतान अवरोधकाल में उन्होंने भीषण युद्ध किया