पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५७२

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बोदधर्म जाति आ कर पूजा करती है। पहले बाथुरोगण पूजा करते : गढ़जातके सिवा कहीं दूसरी जगह नहीं मिलती। थे और अब भी वे समयानुसार करने हैं । जिस दिन बौद्ध- सिद्धान्त-उडुम्वरमें ६ प्रकारको ब्राह्मणजातिके मध्य जगत्में सभी जगह बुद्धदेवका जन्मोत्सव मनाया जाता है, "बावरी" नामक जिस एक (वर्तमान अस्पृश्य ) ब्राह्मण- आज भी उस स्मरणीय वैशाखो पूर्णिमा के दिन उक्त बड़-! जातिको कथा लिस्रो है, वही छिपे रूपसे मयूरभञ्जके साई प्राममें चंद्रसेना नामक बौद्ध चैत्यका पूजन तथा . पावंत्य प्रदेशमें 'बावरी नामसे प्रसिद्ध है। बावरीजाति महोत्सव होता है । जनसाधारणका विश्वास है कि बहुत अनार्य नहीं थो- इसको गिनती सुसभ्यजातियों में होतो दिनोंसे यहां वैशाखोपूर्णिमाका महोत्सव चला आता है , थी। इनमेंसे बहुतोंने राज्यशासन भी किया है तथा अनेक जो "उड़ापर्णा" कहलाता है। इस उत्सव में २०-२५ हजार देवकीतिकी स्थापना कर सुस-यसमाजका परिचय भी मनुष्य इकट्ठे होते हैं जिसमें बावरोको संरूपा कम नहीं दिया है जिसका मयूरभञ्जमें काफी प्रमाण मिलता है। रहती। ऐसा उत्सव मयूरभअमें और कहीं भी नहीं होता! मयूरभाके दुर्गभ सिमलो पहाड़के ऊपर स्थापत्यशिल्य- कभी कभी उक्त क्षुद्रचैत्यको पूजाके उपलक्षम जनता असाधा- का विशाल निदर्शन 'अठारह देव' नामक जो प्राचीन रण भयक्ति दिखलातो है। यहां तक कि. ब्राह्मण भो प्रस्तर-मन्दिर और प्रस्तर-अट्टालिकादि है, वही विशाल आ कर उसके सामने सिर झुकाते हैं। नेपालमें अब कोर्ति वाथुरीजातिकी पूर्व समृद्धिका परिचय देती है। भी ऐसे मूर्सिविशिष्ट चैत्यका सब जगह महासमादर कुछ दिन पहले जो इस जातिके मध्य राजा, राजमन्त्री, और पूजा प्रचलित है। सामन्त प्रभृति विद्यमान थे, अब भी उनकी क्षीणस्मृति ___ अभी वैशाखी पूर्णिमाके 'उड़ापर्व के सिवा और वर्तमान है। बाथुरिया आज भी अपनेको आर्यजाति दूसरे किसी दिन उक्त क्षुद्र चैत्यको पूजा नहीं होती, और ब्राह्मणके समकक्ष बतलाते हैं। ये ब्राह्मणकी तरह किन्तु हारीतीदेवीकी पूजा सब ममय हुआ करती है। यज्ञसूत्र-धारण तथा उन्हीं के जैसा दशाह अशौचका कारण, बहुत दिनोंसे बौद्ध तथा हिंदूअनसाधारण हारीती पालन करते हैं। बाद अशीचके नापित आ कर क्षौर कर या शीतलाका पूजन करते आये हैं। आश्चयकी बात है, देता है । ग्यारहवं दिनमें ही श्राद्ध समाप्त होता है। ब्राह्मण- कि अभी वह मूर्ति जनसाधारणमें 'कालिका' नामसे पुरो हत ही पौरोहित्य करते हैं । एकादशाको ही ब्राह्मण परिचित है। इसलिए थोड़े दिन हुए ब्राह्मण भी इस भोजन तथा स्वजाति भोज होता है। वर्तमान समयमें देवीकी पूजा करने लग गए हैं। किन्तु साधारणतः | इस जातिके सर्वप्रधान व्यक्ति 'महापात्र' कहलाते हैं। वे नीच देहुरोसे ही पूजी जाती हैं और निम्नश्रेणीके मयूरभञ्जके खूटा करकचिया नामक स्थानमें महापालों- देहुरोगण बहुत दिनांसे यहांको देवमम्पत्तिका भोग करते का वासस्थान है। प्रत्येक बाथुरी गृहस्थको पुत्रकन्याके आये हैं। विवाह के समय महापात्रको मर्यादास्वरूप एक वस्त्र, १० जो कुछ हो, ढाई सौ वष पहले जिस स्थानम बौद्ध सुपारी और १०० पान देने होते हैं। किसी भी उत्सवको उपासक तथा उपासिकाका अभाव नहीं था. तिब्वतादि | समय महापात्रका अनुमति लेनी पड़ती है। मयूरभनके बहुत दूर देशोंसे बौद्ध आचार्यगण जहाँके प्रसिद्ध चैत्य महापात्र वश अपनेको ज्येष्ठ और केवझर, दशपुर और माना गुह यशास्त्रोंके दर्शन करने आते थे, अभी प्रभृति महापात्र-शको कनिष्ठकी सन्तान बतलाते हैं। यहांके उक्त सामान्य निदर्शनके सिवा और कुछ भी नहीं। अभाग्यवश इस जातिकी अवस्था अभी अत्यन्त हीन देखा जाता । स्थानीय प्राचीन मनुष्योंसे सुना जाता होने पर भी जातीय सम्मान तथा घंशमर्यादाकी ओर है, कि बावरी जातिकी चेष्टासे हो इन सब द्रव्योंकी रक्षा उनका विशेष लक्ष्य है । कोई भो बाथुरी ब्राह्मणादि किसी दूसरी जातिका अन्न कदापि नहीं खाते , यदि कोई बाथुरी और बावरी। दूसरी जातिका अन्न ग्रहण या भिन्न जातीय रमणीके उक्त बाधुरी जाति मयूरभा और निकटवती अन्य | साथ यौन सम्बन्ध करे तो वे अति शीघ्र समाज और