पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५८७

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५९ भारादिदेहान्तात् प्रत्यगात्मेति गीयते ॥ सच्चिदानन्द स्वरूप सर्वव्यापी परब्रह्म विद्यमान थे दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्त्वमीयते । और अब भी वे उसो रूपमें विराजमान हैं। इसीलिए ब्रहमशब्देन तद्ब्रम स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥" उपनिषदमें 'तत्त्वमसि' रूपमें उनका उपदेश किया गया है। ' (पञ्चदशीका महावाक्यवि० १-८)। जो इस परिदृश्यमान जगत्के मूलाधार और एकमाल जिस नित्य चैतन्यकी सहायतासे चक्षु द्वारा रूपादि कारण-स्वरूप हैं, वे सच्चिदानन्द परात्पर ब्रह्मचैतन्य हो दृश्य पदार्थ दृष्टिगत होते हैं, जिसके द्वारा वाक्यादि का ब्रह्मपदके प्रतिपाद्य हैं। वे स्वप्रकाश स्वरूप हैं, अर्थात् श्रवण होता है, जिसको सहायतासे गन्धका आघ्राण व स्वयं प्रकाशित न होने पर कोई भी उनका प्रकाश किया जाता है, जिसके साहाय्यसे कण्ठनाली आदि नहीं कर सकता । वे स्वयं ही प्रकाश स्वरूप हैं। ब्रह्मोप- वागिन्द्रिय द्वारा वाक्य उच्चारित होते हैं, और जिससे . निपमें लिखा है, ब्रह्मके अवस्थानके चार स्थान हैं : खादु और अस्वादु आदि रसका परिज्ञान होता है, वह नाभि, हृदय, कण्ठ और मूर्खा * । ज्योतिर्मय जीवचैतन्य ही प्रज्ञान है, और प्रज्ञान ही ब्रह्म इन चारों स्थानोंमें ब्रह्म प्रकट होते हैं । जागरित, हैं। इसलिए श्रुतिमें 'प्रज्ञान ब्रह्म' ऐसा कहा गया है। स्वप्न, सुषुप्त और तुरीय ये ही ब्रह्मके चार पद हैं । जाग. सचिदानन्दमय सर्वव्यापी एक ब्रह्म ही ब्रह्मा और इन्द्र रितमें ब्रह्मा, स्वप्नमें विष्णु, सुषुप्तमें रुद्र और तुरीयमें आदि देववृन्दमें मनुष्य और गो, अश्व आदि जन्तुवर्ग में, परमाक्षर हैं। उक्त चार प्रकारको अवस्था तथा भन्यान्य सृष्ट-पदार्थोंमें अन्तर्यामी-रूपमें अवस्थान ब्रह्म ही आदित्य हैं, विष्णु, ईश्वर और वे ही प्राण, जोव कर रहे हैं । इसलिए मुझमें भी वे अवस्थित है । अत- और ब्रह्मा हैं। इन जाप्रत आदि अवस्थाओंमें ब्रह्म एव दोनों चैतन्य एक ही हैं, अर्थात् जीवचैतन्य और ' प्रकाशरूपमें अवस्थान करते हैं। ब्रह्मचैतन्य अभिन्न हैं। इसीलिए श्रुतिमें 'अहं ब्रह्मस्मि': ब्रह्मके मन नहीं है, न कण हैं, न हाथ हैं और न इस प्रकार कहा गया है। पूर्ण ज्ञानस्वरूप ब्रह्म पैर हो है। वे इन्द्रियादिमे रहित होते हुए भी स्व. अपनी मायाशक्तिके वशीभूत हो कर मायामय प्रकाश-स्वरूप हैं। उनके सामने लोक भो लोक नहीं संसारमें शमदमादि साधन-द्वारा ग्रह मतस्व-साधनके है, देवता भी देवता नहीं हैं, वेद भी वेद नहीं हैं। उपाय-स्वरूप पञ्चभौतिक देहमें भवस्थानपूर्वक अन्तः- यज्ञ, पिता, माता, पुलवधु, चण्डाल, अन्त्यजाति आदि करणके साक्षिरूपमें प्रकट होते हैं। उन्हें देशकालादि कोई कुछ भी नहीं है। ब्रह्मके समीप सभी समान है। द्वारा परिच्छिन्न नहीं किया जा सकता। वही पूर्ण ब्रह्मके समक्ष कोई भी अपना प्रभाव नहीं दिखला सकता शान-स्वरूप परमात्मा ही अह शब्द-वाच्य हैं। यह : केवल ब्रह्म हो सर्वदा प्रकाशित रहते हैं। 'भह ही ब्रह्म है। जो स्वतःसिद्ध सर्वश्यापी हैं पूर्व "स्वयममनस्कमश्रोत्रमपाणिपाद ज्याति/जित न तत्र माका न ब्रह्मरूपी परमात्मा हैं, घे ही ब्रह्म शब्द के प्रतिपाद्य हैं; मोकाः, देवा न देवाः, वेदा न वेदाः, यज्ञा न यगाः, माता न मर्थात् 'ब्रह्म' शब्दके उच्चारण करनेसे हो उस सर्व व्यापी माता. पिता न पिता, स्नुषा न स्नुषा, चाण्डात्मा न चाण्डालः, परब्रह्मका बोध होता है, और 'अस्मि' शब्दसे अह' शब्द पौक्कसो न पौक्कसः, श्रमणों न श्रमगाः, पशवा न पशवः, तापसो प्रतिपायचैतन्य और ब्रह्मचैतन्य इन दोनोंका ऐक्य प्रति- न तापसः इत्येकमेव परं वाम विभाति ।" (ब्रहमोपनि० १८) पादित होता है। यदि 'अहं' शब्दवाच्य जोवचैतन्य * “अथास्य पुरुषस्य चत्वारि स्थानानि भवति, नाभि और ब्रह्मचैतन्य इन दोनोंका ऐक्य प्रतिपादित हो गया हृदयं कपट मूद्धति ।" "तत्र चतुष्पादं ब्रहम विभाति ।" जागरित तो जीवन्मुक्त पुरुष जो कहते हैं, कि 'मैं ही ब्रह्म हूं उसमे स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयमिति । जागरिने ब्रहमा, स्वप्ने विष्णुः सुषुप्ते कोई दोष नहीं होता और वैसा व्यवहार भी होता है। रुद्रः तुरीये परमक्षर, स आदित्यश्च विष्णुश्चेश्वरश्च स पुरुषः स इस प्रत्यक्षोभूत नामरूप-स्वरूप देदीप्यमान जगत्की प्राणः सजीवः सोऽग्निः संश्वरश्च जाग्रत् तेषा मध्ये यत्पर उत्पत्तिके पहले केवलमास नामरूप विवर्जित अद्वितीय, ब्रह्म विभाति ।" (ब्रह्मापनि• १५-१७) Vol. xv. 146