पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६१२

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६०६ ब्रह्मदेश tary of State ) रहते थे। परस्परका कार्य विभाग| अभयदान दे विदा करते थे। (१०) सेसेसाङ्गसयय- स्वतन होने पर भी यथार्थ में सभी आवश्यकतानुसार तोशाखानाके दीवान, राजप्रदत्त उपढ़ौकन आदिकी एक दूसरेका काम कर देते थे। तालिका बनाना, उनकी देखरेख करना और दरवारमें राजत्व, राजस्व तथा आयव्यय-सम्यधीय जितने : उपढ़ौकन दाताका नाम पढ़ना हो उनका काम था। कार्य थे, सबोंकी देखरेख उन्हीं के हाथ था। दोवानो यौङ्ग जौगुन दरवार या उत्साशादिके कर्मकर्ता। बाद और फौजदारीके गुरुतर विचारका भार उन्हीं के ऊपर नेचा और थिससदव्योका काम । पे उत्सव सभामें था। ये लोग युद्धविग्रहके समय सेनावाहिनीपरि- आये हुए मनुष्यको बैठाते थे। चालनका मादेश देते थे। यहां तक, कि आवश्यकता पहले ही कहा जा चुका है, कि हू तसभाके सदस्यके पड़ने पर उन्हें युद्धक्षेत्र में जा कर सेनापतिका कोप भी सिवा और भी एक मंत्रिसभा राजप्रासादकी देखभालमें करना पड़ता था । (२) मिनजुगियन -अश्वारोही नियुक्त होती थी। इनमेंसे अत्विनबुन सर्वप्रथम था। ये सेनापति भौर (३) अथि-धन- राजपरिवारको छोड़ हूत सभाकी राजवार्ता भेजते तथा वहांको बातें राजाके कर जनसाधारणके परिदर्शक । हलुतसभामें इन लोगोंका सामने कहते थे। तत्परवत्तीं खण्डवजिन उनके कोई काम नहीं रहने पर भी इनकी गिनती दूसरी श्रेणोके सहायक थे। इस अन्तःपुरसभाका नाम वेदके था । सभ्यों में होती थी। (४) बूनदौक-प्रधान मंत्रीका सहायक ब्रह्ममें हत और 'वेदके' नामक सभाके अलावा और (Under Secretars of St:ste)। ये भी चार थे । समया धनागाररक्षाके लिए 'श्वधके' नामकी और एक सभा थो नुसार भिन्न भिन्न प्रदेशके शासनकर्ता भी इस पद जिसमें राजाके बहुमूल्य द्रष्यादि रहते थे। पर नियुक्त होते थे। (५) नाखनदव-ये चार मनुष्य उस समय ब्रह्मदेशके विभाग प्रदेश, जिला, नगर और राजपाक्यावली अपनी अपनी पुस्तकमें लिख कर सभामें प्रामादिमें विभक्त थे। प्रदेशमें एक म्योबून (शासन- पेश करते और पुनः सभाके अनुमोदित प्रस्तावको लिख : कर्त्ता) नियुक्त रहते थे। ये ही प्रजाके हर्ताकर्ता थे, कर राजाको सुनाते थे। (६) सय्यदगि-राजलिपिकार. किन्तु इनके आदेशके विरुद्ध प्रत्येक मनुष्यको ही महा- या सहायक सम्पादक। यथार्थमें ये ही लोग राज्यका सभामें आपत्ति करनेका अधिकारी था। हरएक उप- अधिकांश काम करते थे। बाद चार आमेन्दव्यय -- विभाग तथा प्राममें एक निम्नतम कर्मचारी राजकार्य ये राज सम्बन्धोय नथ्थियोंकी रक्षा और राजा- चलाता था। देशानुसार लिपिकार्यमें नियुक्त रहते थे। (७) अथोंग- ब्रह्मवासियोंमेंसे अधिकांश बौद्ध हैं। इनमें कोई साम्प्र- सययोंके ऊपर राजप्रासाद या राजकर्मचारियोंके कर्म- दायिक विभेद नहीं देखा जाता। प्रत्येक श्रेणीके स्थान निर्माणका भार सौंपा हुआ था। (८) अह्मदव्यय मध्य एक मठ या धर्मालय है। पतिव्रता,मिताचार और अवयोक---प्रथम व्यक्ति हू त्सभाके अनुमोदित और सत्यकी रक्षा करना ही इनका प्रधान धर्म है। आदेशादि लिखते और तदनुमति अनुसार यथास्थान धर्मगत या जातिगत कोई विभाग नहीं रहने पर भी भेज देते थे। द्वितीय व्यक्ति विभिन्न स्थानसे आये यहां धर्ममन्दिरादिके अधिष्ठाता या धनवान् राजपुरुषों के हुए पत्रको पढ़ कर उन्हें मन्त्रि सभामें पेश करते थे। साथ साधारण मनुष्यका थोड़ा पार्थक्य देखा जाता है। (E) थौदवगण-राजपत्रग्राहक। ये लोग सिर्फ राजाके बौद्व पुगेहित पुगिगण सब जगह पूजा पाठ करते हैं। मामसे आये हुए पनकी देखभाल करते थे, अन्य राज- बुद्ध के सिवा यहां 'नाट' ( उपदेवताविशेष )-की उपा. कीय पलसे इन्हें कोई सम्पर्क न था। ये राजादेशानुसार सनाका प्रभाव देखा जाता है। यहांके अधिवालियोंका वर्ष में 'कदवधे' उत्सव मनाते थे। उस समय सामन्त विश्वास है, कि यही उपदेवता स्वर्ग और मयंके सभी तथा अमात्यगण दरवारमें आ कर राजोचित समान पदार्थोके ऊपर प्रच्छन्न भावसे आधिपत्य करते हैं। दिखाते थे। राजा भी उन्हें स्नेह, दया, क्षमा आर बौद्धधर्मका प्रचार करनेकेलिए ब्रह्मवासियोंके उस धर्ममें