पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६३७

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ब्राह्मसमाज . ६१ सामान्य ज्ञान-लाभसे परितृप्त नहीं हुए ; इन सभी लोगोंको समझमें नहीं आता। स्वभावतः आप परि- भाषाओंमें आपने उच्चतम वैज्ञानिक और दार्शनिक ग्रन्थों श्रमी थे और अपनी तीक्ष्ण बुद्धिसे जटिल विषयोंको का अध्ययन किया था। जब ये पन्द्रह वर्ष के हए, तब जल्दी ही मीमांसा कर डालते थे। इससे उन्हें सर- तीनों भाषाओं में व्युत्पन्न और शास्त्रार्थ के मर्म के जान- कारी कार्य करनेके बाद भी अन्य कार्य करनेके लिए कार हो गये। आपका वह ज्ञान हृदय कुटोरमें संकी काफी अवकाशं रहता था। उस समयमें आप धर्मकी र्णतासे न रह सका, और न विचार भी पल्लवग्राहितामात्र अलोचना किया करते थे। अब उनकी तत्त्वानुसन्धि- था; यही कारण है, कि अभीसे आपके ब्रह्म-विचार त्साके साथ अर्थशक्तिका योग हुआ समझना चाहिए । में आपको प्रश्न हुआ, कि ब्रह्म एक है तो हम वहुतसे इससे भारतके नाना सम्प्रदाय के लोगोंके साथ समागम देवताओंकी आराधना और. परिच्छिन्न मूर्तियों और शास्त्रचर्चाके अनेक सुयोग आपको मिले। इस की पूजा क्यों करते हैं? आपका यह प्राणस्पशी समयमें अपने निगूढ़ शास्त्रार्थ भी लिपिवद्ध किये थे। विचार उत्तरोत्तर प्रवल होने लगा। इस विषय 'तुहफत् उल मुवाहिद्दीन' नामक आपका रचा हुआ में आपका अपने पिताके साथ भी तर्क वितर्क एक ग्रन्थ है, जिसकी भूमिका अरबी भाषामें और हुआ था। परन्तु पुत्रके इस प्रकारके व्यवहारसे अन्यान्य अंश फारसो भाषामें लिखा गया है। इस पिता ऋद्ध हो गये। पिताका कोप देख पुत्र ग्रन्थसे राममोहन रायका परिचय मिलता है। प्रन्थका भी विमर्षभावापन्न हो गये। परन्तु फिर भी आप मर्म यह है कि कोई पथिक कहता है, कि मैंने समस्त सहजमें निरस्त न हुए। अधिकतर ज्ञान उपार्जनके पृथिवीमें भ्रमण किया, पर कहीं भी धर्म-सम्प्रदायोंका लिए आप देशभ्रमणको निकले । इस यात्रामें राममोहन सम्मिलन नहीं देखा ; किन्तु प्रणिधान पूर्वक देखनेसे तिब्बत तक जा कर बौद्धलामाओंके धर्मतत्त्वको जाननेकी शान होगा, कि सभी धर्मों में एक ईश्वरकी बात है। कोशिश की थी। २४ वर्ष बाद आप घर लौटे। परंतु | केवल धर्म याजकोंने ही भेद-वर्द्धन किया है। इस धर्मका सारतत्त्व-निर्णय आपके जीवनका प्रधान कार्य ग्रन्थके शेषमें कहा गया है कि-लोक-हितके लिए प्रयत्न हो गया था। इसलिए आप घरमें न रह कर फिर काशी करो, यही यथेष्ट है। उत्तर देते हुए आपने समस्त चल दिये। वहां वेदांतादिशास्त्रकी प्रगाढ़ आलोचनासे शास्त्रीय विचारसे परोपकारको हो कोटि ग्रन्थोंका सार जो ब्रह्मतत्स्व आपको ज्ञान हुआ, उसके साथ प्रचलित वाक्य बतलाया है। इसे उनके तिब्बत आदि दूरदेश धर्मों में बहुत अन्तर देख कर आप उस ब्रह्मतत्त्वको उद्दो पर्यटनका और बौद्ध संसर्गका फल हो समझना पनाके लिए प्रस्तुत होने लगे। उस समय आपकी चाहिए। यह ग्रन्थ पहले लिखे जाने पर भी सम्भवतः अवस्था केवल २५ वर्षकी थी। उस समयमें ही मुद्रित हुआ था। परन्तु साधारण - इसके बाद आपने अंग्रेजी पढ़ना प्रारम्भ किया।। श्रेणीके लोगोंमें इस ग्रन्थका अधिक प्रचार वा विचार विशेष उद्यमके साथ नूतन भाषा शिक्षामें प्रवृत्त होने नहीं हुआ। पर भी आपका मन ब्रह्मतत्वके निर्णयमें फंसा रहनेके प्रच्छन्नभावसे ज्ञानान्वेषणमें व्याप्त रह कर राम- कारण, अंग्रेजी सीखनेमें अधिक विलम्ब होने लगा। ! मोहन राय अपने जीवन में बड़ी तृप्ति अनुभव करते थे। १८०३ ईमें राममोहनके पिता रामकान्त रायको इस अपरिसोम ज्ञानानन्दमें उनकी अर्थ तृष्णा क्रमशः मृत्यु हुई। उस समय आप अर्थ-सङ्गतिके लिए अंग- निवृत्तिको ओर दौड़ने लगी। आप दीवान होते हुए रेज-सरकारमें कार्य करनेको तैयार हुए। १८०४से भी स्वयं आधे कलेक्टर थे। कलेक्टर डिगवी साहब १८१४ ई० तक आपने सरकारी कार्य किया। अन्तमें आपको महात्मा समझते थे और बड़ा आदर करते थे। कितने ही वर्ष तक आप कलेक्टरीके दीवान रहे। यह मान-मर्यादा भी अब आपको अच्छो न लगने लगी। उस समयका दीवानी-पदका कार्य कैसा था, हम संन्यासीकी तरह तिब्बत गये थे ; उधरसे लौटते समय