पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६४

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फरासी ल्यु-की अधिनायकतामें भारतकी मोर भेजे गये थे, किन्तु खबर आने लगी । १७५० ईमें फरासियोने यानम् दुर्भाग्यक्रमसे वे दोनों ही जहाज मालद्वीपके समीप बुबो और मसलीपत्तन पर अधिकार किया था। १७५२ ई०में गये। तोरराजको कुछ रुपये दे कर उक्त स्थानका पक्का कर ४र्थ हेनरीके शान्तिमय राज्यकालमें १६०४ ई०को लिया। अब वे अगरेजोंके विरुद्ध अवधारण करनेके श्ली जनको एक बार फिर चेष्टा की गई थी। किन्त लिये देशीय राजाओंको उभाडने लगे। इस बार भी वह चेष्टा व्यर्थ निकली। आखिर १६१६ १७३५से १७५४ ई०के मध्य बुप्ले और डूमसकी ईमें एक दूसरा दल राजाका अनुज्ञापत्र ले कर कार्यक्षेत्र चेष्टासे भारतवर्ष में फरासियों को धाक बहुत कुछ जम में उतरा। इस दलका नाम रखा गया 'फरासी इष्ट गई थी। नागपत्तनमें अगरेजोंके जंगी जहाजको नष्ट इण्डिया कम्पनी'। फरासी मन्त्री कोलवारीने १६६४ भ्रष्ट करके उन्होंने मन्दाज पर दखल किया। इसके बाद में उन्हें अव्याहतभावमें खास तौर पर वाणिज्य करने- सदसे मफजखों भी उनसे परास्त हए । किन्त कहालरमें के लिये ५० वर्षका समय दिया था। जो युद्ध हुआ था, उसमें फरासियों को दो बार हार १६६८ ई० में फरासी-वणिकोंने पहले पहल सूरत आ हुई थी । अङ्ग्रेंजोने फरासियों को पुदीचेरीमें अब- कर एक कोठी खोली। इसके बाद मसलीपत्तनमें दूसरी रोध किया, पर पीछे उन्हें ही पीठ दिखानी पड़ी थी। कोठी खोलो गई। अनन्तर उन्होंने ओलन्दाजोले लिन अम्बुरके युद्ध में भी उन्हींकी विजय हुई। इस युद्धमें कमली नगर छीन लिया, किन्तु कुछ दिन बाद ही ओल अनवर-उहीन मारे गये। अनन्तर फरासियों ने मुरारि- न्दाजोंने फिरसे इस पर अपना कब्जा किया। १६७२ रावके शिविर पर आक्रमण कर उन्हें चकित किया था। ईमें फरासियोंने मन्द्राजके निकट सेएटटोमे नामक अनबर-उहीनके लजके महम्मद अलोने भी फरासियों का स्थान ओलन्दाजोंसे जीता। १६७४ ईमें ओलन्दाजों- शासन करनेके लिये उनसे घोर युद्ध किया था, पर ने फरासियों को वहांसे मार भगाया। अब वैदिचेरो आखिर वे भी परास्त हुए। अनन्तर फरासियोंने गिजी में आ कर रहने लगे। पर धावा बोल दिया। नासिर पराजित हुए, बोल- ___ ओलन्दाजोंने वहांसे भी फरासियोंको खदेरा था। कण्डाक्षेत्र में अगरेज लोग भी पोठ दिखानेको बाध्य हुए इसके बाद वे कुछ दिन तक सूरतमें रह कर वाणिज्य थे । क्लाइबके कौशलसे विचिनपल्लीमें फरासीषण चलाने लगे। किन्तु यूरोपीय प्रतिद्वन्द्रियोंकी प्रतिबन्ध अवरुद्ध हुए थे और दो बार उन्होंने क्लाइबसे पराजय भी तासे उनका मनोरथ सिद्ध न होने पाया। घे सूरतका स्वीकार की थी । अब फरासी वहांसे श्रीरङ्ग-क्षेलको परित्याग करनेको वाध्य किये गये। इसके बाद उन्होंने चले आये। यहां भी वे अङ्गरेजोंके निकट मारम- चन्दननगरमें कोठी खोलो। समर्पण करनेको वाध्य हुए । विक्करावाड़ी नामक १६८८ ई०में वादशाह औरङ्गजेबने उन्हें चन्दननगर- स्थानमें फरासियोंने अङ्गरेजोंको परास्त किया, किन्तु का अधिकार प्रदान किया। बादमें फरासी कम्पनीने- || वहार नामक स्थानमें जो युद्ध हुआ उसमें फरासियोंकी माहो पर आक्रमण करके उसे अपने दखल कर लिया। ही हार हुई। १७३० ई०में सुप्ले चन्दननमरके गवर्नर हुए । इसके बूसीकी अधिनायकतामें फरासीगण यथेष्ट प्रभाष- बाद १७४२ और १७४६ ई० में उन्होंने पुदीचेरोका शासन | शाली हो उठे थे। उन्होंने महाराष्ट्रोंको को बार परास्त भार पाया। १७३६ ई०में फरासियोंमे तोर-राजसे किया और भारतके पूर्व उपकूलस्थ चार विस्तृत प्रदेश कारिकल खरीदा। दखल किये। तिरुबाड़ी नामक स्थानमें अगरेजोंने पहले तो केवल भोलन्दाजोंकी ही फरासियोंसे फरासोके हाथसे हदसे ज्यादा कष्ट भोगा था। किन्तु शत्रु ता थी, अब वाणिज्यक्षेत्र में अगरेज लोप भी फरा- स्वर्णाचल और सकराचलमें फरासी लोग हार खा कर लियोंके शानु हो गये। नाम स्थानोंसे युद्ध विग्रहकी श्रीरङ्गको भाव से थे। फिर विपिनाल्ली पोकी