पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६४

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भक्तद्वेष-भक्तमाल भक्तोष (स० पु०) भक्ते द्वषः। १ अन्नमें अरुचि । २ देनेके लिये गया। रानीने उस भक्तसे अपने पुत्रका भगवद्भकके प्रति द्वष। निधनकारण कह दिया तथा चार दिन और ठहरनेक भक्तषिन् ( स० वि० ) भक्त-द्विष-णिनि। भक्तद्वष उनसे अनुरोध किया। साधुमें राजा और रानीकी युक्त। प्रीति देख कर भक्त चमत्कृत हो रहा । पोछे.रानीने उस भक्तनिष्ठ (स नि०) १ निष्ठावान् भक्त । २ भक्त साधुके चरणामृत ले कर मृत पुत्रके ऊपर छिड़क दिया सेवन विषयमें विशेष निष्ठायुक्त । ३ एक राजा । आदि जिससे वह उठ कर खड़ा हो गया, मानो अभी सो कर पुराणमें उनकी साधुता और भक्त वैष्णवके प्रति भक्ति उठा हो। वैष्णवके चरणामृत पर रामीका अटूट निष्ठाका जो विवरण लिखा है वह इस प्रकार है विश्वास देख साधु आश्चर्यान्वित हो गये तभीसे उन्होंने ____एक दिन दो चोर वैष्णवका वेश धारण कर चोरीके फिर कभी भी राजा रानीका साथ नहीं छोड़ा। उद्देशसे राजाके समीप पहुंचे। राजाने परम भक्ति- (भक्तमाल) भाषसे उनका पादप्रक्षालन कराया। यहां तक, कि चरण- भक्तपन (हिं० पु०) भक्ति । सेवाके लिये उन्होंने रानियोंको नियुक्त रफ्खा। दो भक्तपुलाक ( स० पु०) भक्तस्य पुलाक इव । १ मांड़, पहर रातको जब सभी निद्रा देवीकी गोदमें सो रहे थे, पोच। २ प्रासाच्छादनयोग्य अन्नपिण्ड । उसी समय वैष्णववेशी प्रतारक उन चोरोंने रानीको मार भक्तप्रिय-एक महाराज । वैष्णवमें उनका अक्षुण्ण प्रेम कर उनके अलङ्कारादि ले लिये और वहांसे चम्पत था। डोम भांड. आदि वैष्णवोंका वेश धारण कर हुए । किन्तु धर्मको जय होती ही है, वे सब चोर उनके सामने नृत्यगीत करते थे। ये भी प्रेममें मत्स हो रास्ता भूल गये और इधर उधर भटकने लगे। सबेरे राज- उन्हें कभी तो दण्डवत् और कभी आलिङ्गन्न करते थे। भृत्यगण उन दोनोंको राजाके समीप पकड़ लाये। परम (भक्तमाल) भक्तिमन्त राजा वैष्णवको ऐसी बन्धनदशा देख चित्कार भक्तमण्ड (सं० पु० क्लो) भक्तस्य अन्नस्य मण्डः । अन्नान- कर उठे। क्रमशः उन्होंने रानीको हत्यावार्ता भी सुनी। रस, मांड़। पर्याय-मासर, आचाम, निःस्राव । रानीका हत्याकारक जान कर भी राजाने उन वैष्णव भक्तमल्ल--- नूरपुरके एक राजा । इन्होंने ६६५ हिजरीमें मान- चोरोंको मुक्त कर देनेका हुकुम दिया और उनका पादोदक कोट अवरोधके समय अकबरशाहके शत्रु सिकन्दरसूरकी ले कर रानोके मुखमें देने कहा । भक्तके सहाय भगवान सहायता की थी। सिकन्दरकी दुर्गति देख कर ये पीछे हैं, राजाके भक्तिबलसे गनी जी उठी। अनन्तर राजा मुगल-सम्राटकी शरणमें पहुंचे। मुगलवाहिनीके साथ ने उन दोनों वैष्णवोंको स्तवसे संतुष्ट कर बिदा किया। जब ये लाहोर नगर लड़ने गये, तब वहां बैराम खाँके (भक्तमाल ) हाथ इनकी मृत्यु हुई। ४एक महाराज। ये भी विख्यात हरिभक्त थे। एक भक्तमाल---एक प्राचीन धर्मग्रन्थ । वैष्णव कवि लाल- दिन कोई भक्तप्रधान उनके समीप उपस्थित हुआ। दासने इसकी बगला-छन्दमें रचना की। भक्तोंकी राजाने यथाविधान उस वैष्णवश्रेष्ठ अतिथिकी अर्गना | जीवनी इस प्रन्थमे मालाकारमें प्रथित होने के कारण की। एक वर्ष तक राजाके साथ रह कर जब उस साधु इसका नाम भक्तमाल रखा गया है । प्रन्थकारने भक्तने जानेशी इच्छा प्रकट की, तब राजाने प्राणत्याग अपनी रचनाके मध्य भक्तचरित्र और देवतत्त्वादि बहुत- करनेका संकल्प किया। यह देख रानीने अपने दो पुत्रोंको से तात्त्विक विषयोंका समावेश किया है। भग- विष खिला कर मार डाला। राजपुत्रकी मुत्यु पर हाहा। वत्तत्व, जीवतत्व, मायातत्व, सू कार मच गई, सभी छाती पोट पीट कर रोने लगे। भव साधनस्व आदि विषय भक्तचरित्रके आनुषङ्गिक साधुने राजारानीको इस दशामें छोड़ जाना अच्छा नहीं हैं। इस विवध तस्वकी आलोचना रहने- समझा । इसलिये वह अन्तःपुरमें उन लोगोंको सान्त्वना के कारण भक्तमालप्रन्धको साधारणतः चरित्र और