पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६६९

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भक्ति "अहङ्कारं बलं दर्प काम क्रोधं परिग्रहम् । ___ओं तस्मात् सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः" (नारदसू० ३१ ) विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ मोक्षार्थी केवल भक्ति ही ग्रहण करते हैं। सूत्रकार ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काति । नारदने अनेक प्रकारकी युक्ति द्वार दिखलाया है, कि कर्म, समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥" योग और ज्ञान मुक्तिका साधन होने पर भी उसमें विपुल इस वाक्यमें भगवान् श्रीकृष्णने यह दिखाया है, कि विघ्नको सम्भावना है । भक्तिलाभ तथा भगवान के दर्शन शान, कर्म और योगसाधन द्वारा मनुष्य अहंकार, बल, करनेका भति हो निमल पथ है। इसीलिए वे जीवोंके दर्प, काम और क्रोधका परित्याग कर निर्मल, शान्त और प्रति दया दिखला कर भक्तिसाधनमें प्रवृत्त हुए हैं। ब्रह्मात्मज्ञान प्राप्त करते हैं। बाद परमानन्दपूर्ण हो मुक्ति भक्तिका लक्ष्यार्थफल नहीं है। किन्तु भक्ति- शोक और कामनादिविहीन तथा सब प्राणियों में साधन मार्ग पर अग्रसर होनेसे यथासमय मक्ति आप समदर्शी होनेसे उन्हें परा-भक्ति लाभ होतो ही उपस्थित होती है और मुक्तिलाभके बाद भी भक्तिका है । सभी साधनाओंका लक्ष्य है भगवत्कृपा- पथ बना रहता है । मुक्तिके लिए, मुमुक्ष पुरुषको लाभ । किन्तु भगवानकी कृपादृष्टि न होनेसे भक्तिका स्वतन्त्र साधन करना पड़ता है। भक्ति हो समस्त सञ्चार नहीं होता, इसीलिए भक्ति सभी साधनको परमार्थको देनेवाली है। फलस्वरूप है। 'ओं ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वात् दैन्य. "ओं तत्तद्विषय त्यागात् सङ्गत्यागाच" (नारदसू० ३५) प्रियत्वाञ्च ।' (नारदासू. २७) भगवान्को भी अभि भक्ति विषय और सङ्गत्याग द्वारा साधित हुआ करती है। मानके प्रति विशेष और दोनताके प्रति प्रियभाव रहता इन्द्रियों के विषयान्वित होनेसे मन उसीमें मग्न हो जाता है। कर्म, शान और योग साधनके समय यदि साधकको है। विषयरुचि मनको हमेशा एक विषयसे दूसरे विषय- उसका अभिमान हो जाय तो भगवान् प्रसन्न नहीं होते में आसक्त करती है । इस प्रकार विषयका अथवा मनुष्य- हैं। अभिमानी ईश्वरको प्यार नहीं कर सकते और का सङ्ग मनका विहल कर देता है, अतः मन भी विक्षिप्त, जब तक उन्हें प्राणसे बढ़ कर प्यार न किया जाय चञ्चल तथा दुर्वल हो जाता है। सम्पूर्ण एकाग्र न होनेसे अर्थात् अपनेको उनके चरणमें भलीभांति समर्पण न कर भक्ति-आवेशकी सम्भावना नहीं। भक्ति साधन करने में दे तथा 'मैं तुम्हारा और तुम मेरा' ऐसे भावमें विगलित पहले वैराग्यवान् और निःसङ्ग होना आवश्यक है । जीवन- न हो जाय, तब तक भगवत्प्रीति लाभ हो नहीं सकती। धारणके आवश्यकीय कार्यका समय छोड़ कर जब अव- किसी किसी पण्डितके मतसे ज्ञान ही भक्तिका साधन काश मिले. उसी समय भगवानका नाम जप तथा गुणगान भक्तितत्त्वकी आलोचना करनेसे यह मत समीचीन करना चाहिए । कारण, हरिचिन्तनसे विश्राम पाने पर नहीं जान पड़ती; क्योंकि गृध्रगजेन्द्रादिने ज्ञानलाभ नहीं ही मन, रज और तमोगुणके आवेशमें आमोदित होता है करके भी भक्तिपूर्वक भगवानको पुकारा था और उन्हें अन्यथा विषयचिन्ता मनको भुलायेमें डाल देती है। सभी भगवान्के दर्शन भी मिले थे। 'ओं अस्यान्याश्रयत्वमित्यन्ये' कार्य और सभी अवस्थामें यदि इन्द्रियों के साथ मन भग- (नारद भक्तिसू० २६) कोई कोई कहते हैं, कि भक्ति वत् पदमें लगा रहे, तो क्रमशः भतिका आवेश बढ़ता है। भौर ज्ञान परस्पर एक दूसरेका आश्रय किये हुए है और जब तक विच्छेदरूपसे भगवत्-भजन-साधनको समाध्य यही बात युक्तिसंगत जान पड़ती है। क्योंकि भक्ति नहीं हो जाय, तब तक अवकाशप्राप्त मनुष्यको भगवत् उत्पन्न होनेसे ज्ञानतत्त्वकी ओर प्रवृति ही नहीं होती। कथा सुनना और स्वयं उसे मनुष्योंके निकट कीतन करना अच्छा है, क्योंकि ऐसा करनेसे चित्त क्रमशः भग- 'ओं स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः।' ( नारदसू. ३० ) सनत्कुमारादि और नारदके मतसे भक्ति स्वयं फलस्वरूप वत्की ओर आकृष्ट होता है। "च्यावृतोऽपि हरौ चित्त श्रवणादी यजेत् सदा। है; कारण, किसी चेष्टा या कौशल द्वारा भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। ततःप्रेम यथाशक्ति व्यसनश्च यदा भवेत् ॥"