पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६७९

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भक्तितराग-भक्ष्य ६७३ अर्थात् १४६३ शकमें गोकुलमें रह कर इस भक्तिरसामत- भक्षणीय (सं० वि० ) भक्ष अनीयर् । १ भक्ष्य द्रव्य ।२ सिन्धुको उत्तम रूपसे उङ्कित किया। भक्षण योग्य, खाने लायक । भक्षणीय द्रष्य किस जगह भक्तिराग (सं० पु०) भक्तिका पूर्वानुराग । रखना चाहिये, पाकराजेश्वरमें उसका विषय इस प्रकार भक्तिल (सं० पु. ) भक्त भङ्गों लातीति ला-क । १ साधु-' लिखा है। सामने भोजन पाल, उसके मध्य मागमें अन्न, घोटक, उत्तम घोड़ा ( त्रि०) २ भक्तिदाता। दाल तरकारी मछली मांस दाहिनी ओर, प्रलेहादि द्रष्य, भक्तिवाद ( सं० पु०) भक्तिविषयिणी कथा। पाणीय, पानक और चोष्य आदि वाई' ओर तथा इक्षु- भक्तिसूत्र ( स० क्ली० ) वैष्णव सम्प्रदायका एक सूत्र- : विकार, पक्कान्न, पायस और दधि सामने रखना प्रन्थ। यह प्रथ शाण्डिल्य मुनिके नामसे प्रख्यात है। चाहिये । इस प्रकार भक्षणीय द्रष्य रख कर भोजन करना इसमें भक्तिका वर्णन है। उचित है। ( पाकराजेश्वर) भक्तोत्तरीय (स० क्लो०) औषधविशेष । इसकी प्रस्तुत भक्षपना (सं० स्त्री० ) भक्ष भक्षणीयं पत्रमस्याः। नाग- प्रणाली-अभ्र, गंधक, पीपल, पञ्चलवण, यवक्षार, साचि- बल्ली । क्षार, सोहागा, त्रिफला, हरिताल, मैनसिला, पारद, भक्षयित (सं० वि०) भक्षि-तृण । भक्षणकारी, खानेवाला। बनयमानी, यमानी, सोया, जीरा, हिंगु, मेथी, चितामूल, भक्षयितथ्य (सं० त्रि०) भक्ष-णिच् तथ्य । भक्षणीय, चइ, वच, दन्तीमूल, निसोथ, मोथा, सिलाजित, लौह, खाद्योपयोगी। रसाञ्जन, निम्ववीज, पटोलपत्र और विद्धड़क प्रत्येक दो भक्षालि ( सं० पु. ) भक्षाणामालियन । १ देशभेद । ततो दो तोला और शोधित धतूरा १००, इन्हें चूर्ण करके भवार्थे बुङ् । भक्षालिक तद्देशभव । भोजन करनेके बाद सेवन करे । इससे अग्निवृद्धि होती : भक्षित (सं० त्रि०) खाया हुआ। तथा श्लीपद और अन्नधुद्धि आदि नाना रोग प्रशमित भक्षित (सं० वि० ) भक्ष-तृच् । भक्षक, खानेवाला। होते हैं ( भैपज्यरत्ना०) भक्षितष्य (सं० क्ली०) भक्ष-तव्य । भक्ष्य, खानेका पदार्थ । भक्तोद्देशक (सं० पु०) बौद्ध-सघारामादिमें नियुक्त भक्षिन् (सं० दि०) भक्ष-अस्त्यर्थे इनि । भक्षणकारी, फर्मचारिविशेष । ये लोग इस बातकी जांच करते हैं, कि : खानेवाला । आज कौन क्या भोजन करेगा। | भक्षिवस ( स० वि० ) भक्ष-वसु वेदे न द्वित्वं । भक्षण, भक्तोपसाधक (सं० पु० ) १ पाचक, रसोइया ।२ परि- खाना। वैदिक प्रयोगमें ही यह पद सिद्ध होता है, वेशक । - लौकिक प्रयोगमें 'विभक्षिवस्' पद होता है। भक्ष (सं० पु० ) भक्ष भावे कर्मणि वा घश् । १ अशन, (अथर्ग० ६१७३३) खानेका काम। २ भक्षणीय वस्तु, खानेका पदार्थ । भक्ष्य ( संवि०) भक्षते इति भक्ष ण्यत्। भक्षितव्य, भक्षक (सं० वि०) भक्षयतीति भक्ष ( गवुल्तृचौ । पा खानेके योग्य । 'प्रतिपदि कुम्मायड न भदय दशम्या कलम्वी ३।१।१३३) १ खादक, खानेवाला । पर्यायः-घस्मर, अमर । न भक्ष्या' (स्मृतिसर्वस्व ) भक्षकार (सं० पु० ) भक्षं करोति कृ-अन् । भक्ष्यपिष्टकोप- सुश्रुतमें भक्ष्यद्रष्य और उसके गुणादिका उल्लेख जीवो, हलवाई। भक्षटक (सं० पु० ) भक्ष-अटन, ततः संज्ञायां कन् । क्षुद्र- है। रस, वीर्य और विपाकके अनुसार भक्ष्य द्रव्यों के गोक्षरक, छोटा गोखरू। गुणादि नीचे लिखे जाते हैं। भक्षण (सं० क्ली०) मक्ष भावे ल्युट् । किसी वस्तुको दांतो- क्षीरजात समस्त भक्ष्यद्रव्य-बलकर, शुक्रवृद्धि- से काट कर खाना, भोजन करना । पर्चाय-म्याद, स्वदन, कर, मुखप्रिय, सुगन्धो, अग्निकर और पित्तनाशक । खादन, अशन, निघस, बलभन, अभ्यवहार, जन्धि, इनमेंसे घृतपक्क पिष्टकादि बलकर, मुखप्रिय, कफकर, जक्षण, लेह, प्रत्यवसान, घसि, आहार, श्मान, अव - वातपित्तनाशक, शुक्रवर्द्धक, गुरुपाक और रक्त मांस- ज्वान, विष्वाण, भोजन, जेमन, अदन । बर्द्धक है। Vol, xY 169