पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६८९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


भगवत-भगवन्तदेव है। उत्पत्ति, प्रलय, आगति, गति, विद्या . और अविद्या भगवत्मुदित-एक भाषा-कवि। इन्होंने हितचरित्र, को वे जानते हैं, इसीसे उनका भगवान् नाम पडा सेवकचरित्र और रसिक-अन्यन्य-माला बनायी थी। है । ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज इनकी कविता साधारण होती थी। ये राधावल्लभी सम्प्र- ' आदि भगवत् शब्दके वाच्य हैं। ब्रह्म---शब्दादिके | दायके थे। . अगोचर हैं, उनकी पूजाके लिये ही केवल भगवत् भगवत् रसिक-वृन्दावन निवासी एक कधि। इनका शब्द द्वारा उनका कीर्तन किया जाता है। अतएव एक जन्म सं० १६०१में हुआ था। ये माधवदासजोके पुत्र मात्र परमब्रह्म हो भगवत् शब्दके वाच्य हैं। सर्वदा और हरिदासजीके शिष्य थे। इनकी बनाई कुण्डलियों- भगवन्नाम कीर्तन, भगवत्सेवा आदि करना सवोंका का कधि-समाजमें बड़ा आदर है। अवश्य कर्त्तव्य हैं । ३ शिव । ( भारत १३।१।१२७) भगवतीदास-एक भाषाके कवि । ये जातिके ब्राह्मण थे। ४ विष्णु । ५ कार्तिकेय । ६ जिनेन्द्र । ७ सय । ८ व्यास इनका जन्म सम्बत् १६८८में हुआ था। इनका बनाया देव । ६ पूजनीय गुरु पुरोहित । ( त्रि०) १० ऐश्वर्ययक्त, भाषामें 'नचिकेतोपाख्यान' है जिसकी कविता मनोरम पूजनीय । भगवत्--वाराणसीके दक्षिण भागमें अवस्थित एक भगवदानन्द-१ गोड़पादीव्याख्याके प्रणेता। इनका परगना । गौतमोंके आक्रमण-कालमें यह स्थान दूसरा नाम आनन्दतीर्थ है। २ स्वप्रकाशरहस्यके जामियात् खाँ गहरवाड़के अधिकारमें था। जामियात् प्रणेता । ने प्रजावर्ग की सहायतासे यहांके पटोट दुर्गको रक्षा भगवदीय (स.पु. ) विष्णुके उपासक । की थी। इस परगनेका प्राचीन नाम हनोरा है। (भाग० ५।६।१७) भगवत्-विष्णु-उपासक बनिया सम्प्रदायविशेष । भगवद्गीता ( स० स्त्री० ) ) भीमपर्वके अन्तर्गत अष्टा- भगवत्त्व (सं० क्ली० ) भगवतो भावः, त्व। भगवानका दशाध्यायात्मक कर्मयोग, शानयोग और भक्तियोग भाव या धर्म। सूचक प्रथ। इसमें उन उपदेशों और प्रश्नोत्तरोंका भगवत्दास-साधारण श्रेणीके एक प्रन्थकर्ता। इन्होंने वर्णन है जो भगवान कृष्णचन्द्रने अर्जुनका मोह छुडाने- रामरसायन पिंगल और भगवत्वरित्र ग्रन्थोंकी रचना के लिये उससे युद्धस्थलमें किये थे। यह प्रथ प्रस्था की है। भगवत्पदी (सं० स्त्री०) गङ्गाका नामान्तर । विष्णु | चतुष्टयमें चौथा है और बहुत दिनोंसे महाभारतसे पदसे निकलनेके कारण गङ्गाका यह नाम पड़ा है। पृथक माना जाता है। विशेष विवरण गीता शब्दमें देखो। भागवत्में लिखा है, कि लियशमें दानग्रहणके समय भगवद्रुम ( स० पु. ) महाबोधिवृक्ष । भगवान् वामपदाङ्गुष्ठ नखसे अण्डकटाह भिन्न हो कर भगवद्भक्त (संपु.) १ भगवानका भक्त, ईश्वर भक्त । जो जलधारा निकली वही जाह्नवो, भागीरथी आदि २ विष्णुभक्त । ३ दक्षिण भारतके वैष्णवोंका एक नामोंसे प्रसिद्ध है। ( माग० ५। ११) सम्प्रदाय । भगवत्पादाचार्य---तन्त्रसार और प्रातःस्मरणस्तोत्र नामक भगवद्रह-नूतनतरिरसतरङ्गिणीटीकाके प्रणेता। दोनों प्रन्थोंके प्रणेता। भगवद्भावक-छान्दोग्योपनिषद्वृत्तिके रचयिता । भगवत्पुर-एक प्राचीन जनपद । यह परमारवंशीय भगवद्विग्रह ( स० पु०) भगवान्का विग्रह, भगवानको महाराज वाक्पतिराजदेवके राज्यभुक्त था। मूर्ति। भगवतपुराण--एक महापुराण जिसमें १८ हजार श्लोक भगवन्त-मुकुन्द-विलासकाव्यके प्रणेता। है। वैष्णवोंके मतसे विष्णुभागवत और शाक्तोंके मतसे भगवन्तदेव-भरेह-नगरके अधिपति । ये सेङ्गर (गिवर) देवीभागवत ही इस नामसे प्रसिद्ध है। विस्तृत विवरण | जातीय स्मृतिभास्कर ग्रन्थके रचयिता नोलकण्ठके प्रति- पुराण शब्दमें देखो। पालक थे । उक्त प्रन्थकारने अपने प्रथमें इस सेगर राज.