पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७०

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फरुखसियर इस समय अमीर उल उमरा हुसेन अलीने वादशाह- भाइयों का आश्रय लिया। किन्तु लोगों ने समझा, कि से दाक्षिणात्यकी सूबेदारी मांग ली। उनकी इच्छा थो, यह सैयदको बन्दी करनेका बहाना मात्र है। इस समय कि वे दाउद ग्बा नामक एक व्यक्तिको प्रतिनिधि बना कर ७८ हजार अश्वारोहीने बाकी तनख्वाह वसूल करनेके सूबेदारी चलावेंगे और आप दिल्लीके दरबार में रहेंगे। लिये महम्मह अमीन खा वक्मी, अमोर उल उमराके इस सूबेदारीसे उन्हें अच्छा रकम मिलनेकी आशा थी। प्रतिनिधि खा दौरान और मीरजुमलाके मकानमें उत्पात किन्तु मीरजुमलाके परामर्शमे बादशाहने हुसेनको कहला मचाना आरम्भ कर दिया। यहां तक, कि दिल्लीका पथ- भेजा, कि दाक्षिणात्यको सूबेदारी मिलेगी सही, पर दाक्षि विपजनक हो उठा । सैयद अली अबदुल्लाने बहुसंख्यक णात्यमें रह कर कार्य-निर्वाह करना पड़ेगा । अमीर सशस्त्र अश्वारोही और निषादी रख कर उन लोगों का उल उमरा भाईको दरबार में अकेला रख कर दाक्षिणात्य गतिरोध किया है। जानेको राजी न हुए। फलतः सैयदों के साथ बाद बादशाहने मीर जुमलाके प्रति नितान्त असन्तुष्ट हो शाहका मनोमालिन्य हानेका सूत्रपात हुआ। सैयद | उन्हें पाव भेज दिया और उनकी जगह सर बुलन्द भाइयों ने दरवारमें आना बंद कर दिया और अपने अपने | खों पटनाके सूबेदार बनाये गये। पीर जुमलाके मकानको मात्र सेन्य द्वारा सुरक्षित कर रग्वा । फरुख- पञ्जाव जाने पर सभी कानाफूसी करने लगे, कि यह सियरकी माता पहलेसे ही मैयदों के पक्षमें थी। उन्होंने राजाकी चालवाजी है, सैयद भाइयोंको बन्दी करनेका ही पुत्रको कह सुन कर सैयदों को दरबारमें बुलाया और आयोजन हो रहा है। आखिर ऐसा हुआ, कि अब आपसमें मेल करा दिया। मीरजुमला पटनाका सूवे. | दुल्ला अपना वजीरी-काम भी खो बैठे । चारों ओर दार बन कर आये । फरुग्वमियरके अभिषेकके २२ वर्षमें | गोलमाल उपस्थित हो गया । बहुतेरे दूसरोंकी यह घटना घटी। जागीर वा मनसद आत्मसात् करने लगे। इस समय ___३रे वर्ष, गुजरात के अहमदावादमें मुसलमानों के हुसेन अली दाक्षिणात्यमें दाऊद खाँ और महाराष्ट्रोंकी हिन्दूधर्ममें आक्षेप और गोहत्याका आयोजन करनेके | क्षमता ह्रास करनेकी चेष्टा कर रहे थे. नाना स्थानोंमें कारण दोनों में घोरतर नंगा हुआ था। इस समय सूबे युद्ध विग्रह चल रहा था। इस समय बालाजी विश्व दार दाउद ग्या हिन्दके पक्ष में थे। नाथके प्रभावसे मुगल सेनाने कई जगह हार खाई थी। जिस समय दिल्लीका सिंहासन ले कर भाई भाईमें हुसेन अलीने महाराष्ट्रपति शाहु के साथ सन्धि करनेकी युद्ध चल रहा था, नाना स्थानों में अराजकता फैलनेको सनद भेजी थी। किन्तु बादशाहने उनके प्रस्तावको नौबत आ गई थी, उस समय पञ्जावमें सिख लोग गुरु- ग्राह्य नहीं किया। पेशवा दे। वंटाकी अधिनायकतामें स्वाधीन होनेकी चेटा कर रहे ! दिल्लीके दरबारमें महम्मद मुराद नामक एक नीच थे। फरुखसियरके चौथे वर्ष में ( १७६४ ईमें ) अब- वंशीय काश्मीरी बादशाहका प्रियपात्र हो सैयदोंके दमन- दुससमद दिलेर जङ्ग लाहोरके सूबेदार हो कर गये । वहाँ को चेष्टा कर रहा था । उन्होंने सिखोंको परास्त कर उनके गुरुको बन्दी रूपमें 'योधपुरके राणा अजितसिंहकी कन्या अति रूपवती भेज दिया । मीरजुमलाको पटनेकी सूबेदारी पसन्दमें थीं। बादशाहने उससे विवाह करना चाहा। परन्तु वे न आई। उनकी सेनाने आपसमें सलाह कर वेतन- एकाएक ऐसे बीमार पड़े, कि उनकी आशा पूरी न हो वृद्धिकी दरखास्त पेश की। यहां तक, कि उनको उत्ते। सकी। इस रोगमें यथासाध्य चिकित्सा चली रही जनासे मीरजुमला पटनामें और अधिक दिन तक ठहर थी। इसी समय अङ्करेजवणिक बेरोकटोक वाणिज्य न सके। वे फौरन दिल्ली में आ धमकं । उनके ऐसे करनेका फरमान लेनेको आशासे कई लाख रुपये उप- आचरणसे बादशाह बढ़े विरक्त हुए। मीर जुमलाने ! ढीकनके साथ गजदरबारमें उपस्थित थे । उनमेसे आखिर बादशाहका अनुग्रह पानेकी आशासे सैयद एकका नाम आकर हामिल्टन था। हामिल्टनकी