पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७००

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६४ मा मुजफ्फर खांके विद्रोही होने पर दीवानसिंहने विशेष । अहमदशाह उक्त दोनों भङ्गी सरदारों के हाथ लाहोरका निपुणताके साथ उनका दमन किया था। इसी बीच में | कतत्व सौंप कर काबुल चले गये। बादमें ३० वर्ष तक अह्मदशाहके पुल तैमूरशाह काबुल के सिंहासन पर बैठ इन्होंने शान्तिसे लाहोर राजधानीमें रह कर राज्य भोगा कर पञ्जावराज्य दखल करनेकी मनशासे सेना तयार था। पीछे शाह जमानने काबुलसिंहासन पर करने लगे। उधर सिखोंने भी विपत्तिको सम्भावना देख | बैठ कर भारत-साम्राज्य स्थापनके लिए १७९३, तयारियां करनी शरू कर दी। १७७७-७८ ईमें मुलतान १७९५ और १७९६ में लगातार तीन बार प्रदेशमें अफगान और सिख सेनामें घोरतर युद्ध हुआ। पञ्जाब पर आक्रमण किया। पहलेके दोनों युद्धमें अफगानीसेनापति हाइनीखा इस युद्धमें बन्दी हुए । वे सफल न होने पर भी तीसरे युद्धमें उन्होंने सिखोंने बड़ी निपुणताके साथ उन्हें तोपसे उड़ा दिया। लाहोर पर कब्जा कर ही लिया। १७६७ ई०में ३री जन- इस प्रकार कठोर अत्याचारसे प्रपीड़ित हो कर शाह- वरीको लहनासिंह नगरकी चाबी दे कर भाग गये। शाह तैमूरने पुनः दूसरे वर्ष शीतकालमें भङ्गीदलका दमन करने जमानके लौट जाने पर उसी वर्ष लहनासिंह और शोभा- के लिए जङ्गोखाको भेजा। इस दुरानी सरदारने युसुफ- सिंहने लाहोर अधिकार कर लिया; किन्तु थोड़े ही समय जै, दुरानो, मुगल और काजलवासियोंकी सहायतासे बाद उन दोनोंकी मृत्यु हो जानेसे लहनाके पुत्र चेत्- सिखोंको परास्त कर मुलतान पर अधिकार कर लिया | सिंह और शोभाके पुत्र मोहरसिंहने शासनकर्ताको पद और सुजाखांको वहांका शासनकर्ता बना दिया। अफ प्राप्त किया। राज्यशासनमें अक्षमता और मद्यपानादि गान-विप्लव शान्त होने पर भङ्गो सरदार देशासिंह चिनि- | दोषसे उनके राज्यमें विशृङ्खलता होने लगी। मौका देख ओत-वासीयोंके दमनाथ अग्रसर हुए। शुकेर्चकिया सर प्रसिद्ध शुकेर्चिया सरदार रणजित्सिंहने लाहोर-आक्रमण- वार महासिंहके साथ किसी एक खण्ड युद्धके बाद १७८२ | का सङ्कल्प किया। १७६६ ई०में अन्यान्य भङ्गी सरदारों के हमें रणक्षसमें उनकी मृत्यु हो गई। षड़यंत्रसे बुलाये जाने पर उन्होंने सेना-सहित लाहोरमें ___ भङ्गी सरदार हरिसिंहके प्रसिद्ध सेनापति गुरुबक्स प्रवेश किया ; इससे चेसिंह और मोहरसिंह भाग गये। सिंहने कुछ समय तक अपने उपद्रवादि द्वारा भी गौरव उधर भंगो मिसलके दलपति देशासिंहकी मृत्युके बाद की रक्षा की थी। उनको मृत्यु के बाद दत्तक पुत्र लहना उनके नाबालिग पुत्र गुलाब सिंहने १७८२ ई०में पितृ- सिंह और उनके दौहित्र गूजरसिंहमें विरोध खड़ा हुआ। पद प्राप्त किया । उनकी बुद्धिपत्ति विशेष परिष्फुट न होने- पीछे उस सम्पत्तिके समानरूपसे विभक्त हो जाने पर से उनके भाई करम सिंह मिसलका सब काम-काज देखते दोनों सरदारके झण्डासिह और गण्डासिंहके सहयोगसे थे। गुलाब सिहने पहले हो कसूर पर कब्जा कर लिया युद्ध विग्रहादि करने पर भी उन्होंने स्वतन्त्ररूपसे जो था, परन्तु वे ज्यादा दिन उसका शासन न कर सके। कार्यादि किये थे, भङ्गो इतिहासमें वे भी उल्लेख- १७६४ ईमें कसूरके पठान सरदार निजामउद्दीन खां योग्य हैं। ने उसे पुनः अपने अधिकारमें कर लिया। १७७७ ई० में अह्मदशाह भारतसे लौटते समय लाहोरमें काबुली. रणजित् सिंहकी लाहोर विजयसे उर कर गुलाबसिंह मल्ल नामक एक हिन्दुको शासनकर्ता नियुक्त कर गये थे। भंगी, जैसासिंह रामगड़िया और निजामउहीनने एक लहना सिंह और गूजर सिंहने दल-सहित आक्रमण कर साथ मिल कर रणजिसिहके प्रभावको खर्वित करनेकी लाहोर लूट लिया। १७६५ ई०में गूजर सिंहने उत्तर- चेष्टा की । लाहोर और अमृतसरके बीचके भसिल नगरमें पक्षाव अधिकार करनेकी चेष्टा की। लाहोरमें दो वर्ष दोनों दलोंकी मुठभेड़ हुई। इस युद्ध में मिलित सरदार रहनेके बाद, १७६७ ई०में अह्मदशाहके आखिरी बार सेनादलको पराजय स्वीकार करनी पड़ी। यहीं पर मद्य भारत-भाक्रमणके समय, वे अफगानो-सेनाके आनेकी पान-जनित कम्पप्रलाप रोगसे गुलाबसिंहकी मृत्यु हुई। खबरसे डर कर लाहोर छोड़ पञ्चावकी तरफ भागे; परन्तु गुलाबकी मृत्युके बाद १० वर्षके पुल गुरुदीतसिंहने