पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७०७

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भाज-भटकना भजि ( स० पु० ) भज-धातुनिर्दे शे इन् । १ भजधातु । २ ब्रह्मभञ्जदेव . सात्वतनृपके एक पुत्रका नाम । (भा० ६।९४६) दिवभादेव भजियाउर (हिं० स्त्री० ) चावल, दही, घीआ आदि एक साथ पका कर बनाया हुआ भोजन । इस प्रकारके शिलीभञ्जदेव. भोजनमें नमक भी डाला जाता है। इसे उझिया और __महाराजविद्याधरभादेव भिजियाउर भी कहते हैं। भक्षक (स त्रि०) भञ्ज ण्वुल । १ भञ्जनकर्ता, निरासक । भजेन्य (सं० वि० ) भज-वाहु कर्मणि-पन्य । भजनीय। । २ भङ्गकारक, तोड़नेवाला। भजेरथ (संपु०) राजभेद । भजन ( सं क्ली०) भन्ज-ल्युट । १ भङ्गकरण, भंग भजि-पञ्जाब प्रदेशके अन्तर्गत एक छोटा पहाड़ी राज्य । करना। २ भङ्ग, ध्वंस, नाश । ४ अर्कक्ष, मंदार । यह अक्षा० ३१७ से ३१ १७ उ तथा देशा० ७७°२ ५ शिरःकर्णादिका आमर्दन। ६ वायु जन्य व्रणघेदना से ७७ २३ पू०के मध्य अवस्थित है । भूपरिमाण ६६ । विशेष, व्रणकी वह पोड़ा जो वायुके कारण होती है । वर्गमील और जनसख्या प्रायः १३३०६ है । यहांके सर- सिद्धि भांग। (त्रि०) ८ भाक, तोड़नेयोला । दार राजपूत वंशीय और राणा उपाधिधारी हैं । काङ्गड़ा भजनक (सं० पु. ) भनक्ति आमद यतीति भञ्ज ल्यु, ततः राजवंशके किसी वंशधरने इस स्थानको जीत कर वर्त- स्वार्थे संज्ञायां वा कन् । मुखरोगविशेष । लकवा । इस मान राजवंशकी प्रतिष्ठा की है। १८०३ और १८१५ ई०में में मुह टेढ़ा हो जाता है। मुखरोग देखो। गुरखा लोगोंने इस स्थानको लूटा। पीछे अंगरेजोंने | भञ्जनागिरि ( स० पु०) पाणिनिके किंशुलुकादिगणोक्त गुरखाओंको यहांसे मार भगाया और राणाको उस पर्व तभेद। सम्पत्तिका भोगाधिकार प्रदान किया। इसी उपकारके भारु (सं० पु०) भनक्तीति भञ्ज बाहुलकात् अरु । देवकुलो- लिये यहांके राणा वृटिशस्.रकारको वार्षिक १४४० रु० द्भत तरु। कर दिया करते हैं। वर्तमान सरदार राणा दुर्गा सिंह दुगा सिह भक्षा ( स० स्त्री० ) भनक्ति भयादिकमिति भञ्ज-अच, १८७५ इ०में राजगद्दी पर बैठे। आय २३००० रु०की है । टात् । अन्नपूर्णाका एक नाम ।। जिसमेंसे १४४० रु० वृटिशसरकारको करमें देने पड़ते भट ( म० पु. ) भटयते म्रियते, या भटतीति भट्-अच् । हैं। यहां अफीम बहुतायतसे उपजती है। राणाको फांसी १ योद्धा, युद्ध करने या लड़नेवाला। २ म्लेच्छभेद । ३ देनेका अधिकार नहीं है। वोर । ४ पामरविशेष। ५ रजनीचर । ६ वर्णसङ्कर भज्य (सत्रि०) भज-यत् । विभागयोग्य । २ सेवनोय, जातिविशेष । सेवा करनेयोग्य। ३भजनेके योग्य । भटकटाई ( हि० स्त्रि०) एक छोटा और काँटेदार रूप। भा--एक प्राचीन राजवंश। ये लोग उड़ीसा प्रदेशमें यह क्षुप बहुधा औषधके काममें आता है। इसके पत्तों पर राज्य करते थे। शिलालिपिसे इस भावंशकी जो दो भी कांटे होते हैं। इसमें बैंगनीरंगके फूल लगते हैं और तालिका पाई गई है वह इस प्रकार है। फूलका जीरा पीला होता है। कहीं कहीं सफेद फूलकी शत्रुभञ्जदेव वा कोट्टभञ्ज भटकटैया मिलती है। विशेष विवरण कण्टकारी शब्दमें देखो। दिगभञ्ज भटकना (हि० क्रि०) १ व्यर्थ इधर उधर घूमते फिरना। रणभञ्जदेव २रास्ता भूल जानेके कारण इधर उधर घूमना। ३ भ्रममें पड़ना। राजभादेव नेत्रिभादेव भटकना (हिं० क्रि०) १ गलत रास्ता बताना, ऐसा रास्ता दूसरी शिलालिपिसे इस वंशके कुछ राजाभोंकी बताना जिसमें आदमी भटके । २ धोखा देना, भ्रममें वंशावली इस प्रकार पाई गई है- डालना। Vol, XV, 176