पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७१४

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७०८ भड़भूजा-भड़ियाद जातबालकके १२वें दिन प्रसूतिका अशौचान्त होता बाद उस शवके ऊपर फूल और पान छिड़क कर सभी है। इस दिन सन्ध्या समय पुरोहित आ कर बालकका उसे प्रणाम करते तथा उसके दोनों हाथों में गेहूं के पिण्ड नामकरण करते हैं। एकसे सात वर्षके मध्य शभ देते हैं। श्मशानमें शवको चिता पर रख कर मुखाग्निके दिनमें बालकका मुण्डन होता है । युवकोंका ३० वर्षमें मुख्य अधिकारी मुहमें जल और अग्नि देते है, बाद में और युवतियोंका १२-१६ वर्षमें शुभ विवाह होता है। शवदह जलाई जाती है। अन्त्येष्टि क्रिया समाप्त होने जब कन्या व्याहने योग्य होती है तब कन्याकर्ता वर पर सब कोई स्नान कर घर लौटते हैं। तीन दिनके कर्ताके पास जा कन्याग्रहणको प्रार्थना करते हैं । वर- बाद उस भस्मको साफ कर दाहस्थानको गोबर और कर्ताके स्वीकार करने पर एक दो रुपये या एक वरतनमें चूनेसे परिष्कार करते तथा वहां मृतकी प्रेतात्माको तुष्टि- थोड़ी चीनी वरके हाथ दे कर कन्याकर्ता अपने घरको के लिये खाद्यादि रख देते हैं। स्त्री होनेसे : दिनमें और लौटते हैं। विवाहके पहले वर और कन्याके घर में एक पुरुषको मृत्यु होनेसे १० दिनमें अशौचान्त हो कर विवाह मण्डप बनाया जाता है। उस दिन एक कुमारो श्राद्धादि करते हैं। वर और कन्याके शरीरमें उबटन लगाती है । विवाहके दिन वोजापुरके भड़भूजे एक स्वतन्त्र श्रेणोके है। ये एक तालपत्रका मौर वरके सिर पर रख कर बारात लोग अपने में हो कन्यापुत्रका विवाहादि करते हैं। प्रबाद घरको ले कन्याके घर जाती हैं। कहीं कहीं कन्या है, कि स्थानीय भोई नामक जालिकगण इसलाम-धर्ममें हो वरके घर लाई जाती है। जहां कहीं भी क्यों न हो, दोक्षित हो कर इस प्रकार अवस्थान्तरको प्राप्त हुये हैं। वर और कन्याके विवाहस्थल पर उपस्थित होनेसे उनके अन्य विषयमें मुसलमानोंका अनुकरण करने पर भी माथेके ऊपर रोटो और जल परछन कर स्नान कराया हिन्दू देवीको पूजा और पार्वणादि प्रतिपालनसे ये पराङ्ग जाता है। इसके बाद एक लोहार पर और कन्या मख नहीं हैं। किन्तु विवाह या सत्कार्य होने पर काजी- दहिने और बायें हाथमें लोहेका कङ्कण दे कर सूता बांध को बुला कर कार्य सम्पादन करते हैं। ये लोग हनफो जाता है। तदन्तर वर और कन्याको चौंकी पर बिठा सम्प्रदायो सुन्नी मुसलमान हैं। पुरोहित सम्प्रदान कार्य शुरू करते हैं। बाद कन्याकर्ता हिंदू भड़भूजोंमें कहीं कहीं वाल्य-विवाह, विधवा वरके दोनों पैर जलसे धो कर पूजा करता है। उठने- विवाह और बहु विवाह प्रचलित है। के समय घर और दम्यतीके सिर पर हाथ रख आशीर्वाद भड़वा (हि पु० ) भड़ आ देखो। देता तथा दो या पांच रुपये यौतुक दे जाता है। यही इन भड़सार (हि स्त्रो०) भोज्यपदार्थ रखनेके लिये किवाड़ी लोगोंके कन्या-दानकी प्रथा है। विवाह हो जाने पर जाति- दार आला या ताक, भंडरिया। कुटुम्बको खिलाया जाता है। बादमें बारात विदा होतो भड़हर (हिस्त्री० ) भँडेहर देखो। हैं, किन्तु वरका वह मौर कन्याके पित्रालयमें ही रहता ! भड़ाल (हि० पु० ) योद्धा, सुभट । है। जब तक एक और शुभ विवाह नहीं हो जाता तब तक भड़ित (सं० पु० ) पाणिनिके गर्गादिगणोक्त ऋषिभेद । माङ्गलिक जान कर उसे घरमें यत्नपूर्वाक रखते हैं । बाद __ (पा० ४।१।१०५) यह मदीके किनारे अथवा तालाबमें फेक दिया जाता है। भड़ियाद-बम्बई प्रदेशके अहमदाबाद जिलेके धन्धुका तालुकके साधारणतः ये लोग शवदेहको जलाते हैं । वसन्तरोगसे अन्तर्गत एक प्राचोन स्थान । यह धोलेरा नगरसे १ कोस यदि किसीको मृत्यु होती है तो लाशको जमीनमें गाड़ते उत्तर पश्चिममें अवस्थित है। यहांकी पीर भडियाद् रोजा हैं। मृत-व्यक्तिके ऊपर गरम जल डाल कर नये नामक विख्यात अट्टालिका मुसलमान और गुजरातवासी वनसे उसकी देह ढंक देते हैं। विधवा होनेसे उजला निम्नश्रेणीके हिन्दुओंका पवित्र तीर्थस्थान है। उस रोजा- थान, पुरुष होनेसे उजला बाफ्ता और सधवा-रमणी के मध्य सैयद बोखारी महमूद शाह वालिस सैयद अबदुल होनेसे हरा कपड़ा पहना दिया जाता है । उसके रहमानको का है । प्रायः ६ वर्ष पहले उक्त महात्मा १५वें