पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७३७

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भरत ७३१ अपुत्रक राजा दशरथने वशिष्ठ के परामर्शानुसार पुत्रेष्टि- | पुष्करावती नामक दो नगर स्थापित किये और वहीं या कराया । लोमपादके पुत्र ऋष्यशृङ्ग इस यक्षमें | रहने लगे। पोछे भरतने रामचंद्रके साथ खर्गारोहण अध्वर्यु बने थे। यज्ञ समाप्त होने पर स्वयं अग्निदेवने किया। रामचन्द्र देखो। ( रामायण, विष्णुपु०, भाग०) वहिकुण्डसे आविर्भूत हो कर दशरथके हाथमें खीर दी, जैनमतानुसार भरत जैनधर्मके परमभक्त थे और जिसे राजाने अपनी रानियों में बांट दिया। जीवनके शेषभांगमें उन्होंने दिगम्बरी दीक्षा ग्रहण की उस खोरको खा कर कौशल्या देवीने रामचन्द्रको, थी । भरत और रामचंद्रके मोक्षकालमें बहुत कैकयीने भरतको और सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्नको अन्तर है। प्रसव किया। भरतने मोनलग्न और पुण्यानक्षत्रमें तथा २ ऋषभदेवके पुत्र । भागवतमें लिखा है कि ये लक्ष्मण और शत्रुघ्नने कर्कलग्न और अश्लेषानक्षत्र में जन्म विष्णुभक्ति-परायण थे। राजा हो कर इन्होंने विश्व ग्रहण किया । लक्ष्मणके कनिष्ठ भ्राता शत्रुघ्न भरतके अति रूपात्मजा पञ्चजनाके साथ विवाह किया था। उनके शय प्रिय थे। भरत अपनी ननसारमें रहते थे । कुश- गर्भसे सुमति, राष्ट्रभृत, सुदर्शन, आवरण और धूमकेतु ध्वजको कन्या माण्डवोके साथ उनका विवाह हुआ। नामक पांच पुत्र उत्पन्न हुप थे। राजाने पुत्रोंको राज्य विवाहके बाद भरत शत्रु नके साथ पुनः ननसार चले बांट कर स्वयं तपस्या धारण की थी। एक दिन घे गये । रामके पितृसत्य पालनार्थ वनवास करने पर पुत्र- नदोके तट पर स्नान करनेके बाद सध्या-वन्दनादि कर शोकमें दशरथको मृत्यु हो गई। उस समय भरतको नन- रहे थे, कि इतनेमें वहां एक आसन्नप्रसवा हरिणी आ सारमें अत्यत दुःस्वप्न दिखाई दिये; वादमें अयोध्यासे दूत कर जलपान करने लगी। मगीको देख कर नदी-तटवत्तों गया और वह मरतको ले आया। भरतने अयोध्या आ कर अरण्यस्थित सिंह गर्जन करने लगा। सिंहकी गर्जना पिताके ऊर्ध्वदेहिकार्य सम्पन्न किये। कैकयीके आदेशसे सुन कर मृगी वहांसे भागी और भय एवं शीघ्रताके राम निर्वासित हुए हैं, सुन कर भरतने माता कैकयोका कारण फिसल कर गिर पड़ी, जिससे उसकी अत्यन्त तिरस्कार किया। विमातृ-तनय होने पर भी : उसी क्षण मृत्यु हो गई और गर्भभ्रष्ट हो गया । भरत ज्येष्ठ भ्राता रामचन्द्र के प्रति उनकी अचला भक्ति थी। उस मृगशिशुको अपने आश्रममें ले आये और उसे पालने उसी प्रवलभक्तिके वश ही अपने ज्येष्ठ भ्राता रामचंद्रको लगे। मायाका कैसा आश्चर्य प्रभाव है। निःसङ्ग वापस लानेके लिए चित्रकूट पर्वत पर पहुंचे। वहां तापस भी मृगके मोहमें क्रमशः तपको भूल गये और जटाधारी रामचंद्रको देख कर वे शोकसे गुह्यमान हो गये मृगकी चिंता करते करते मृत्युको प्राप्त हुए। दूसरे और रामचंद्रसे अयोध्या लौट चलने के लिए उन्होंने बहुत जन्ममें वे मृग हुए, किंतु भगवत् प्रसादसे जातिस्मरण अनुनय-विनय की । रामचंद्रने सत्यभङ्ग कर लौटना किसी हो जानेसे कालञ्जर पर्वत पर पुलहाश्रममें देह- प्रकार भी स्वीकार नहीं किया। तब भरतने वहांसे । त्याग किया। जन्मान्तरमें वे आङ्गिरसगोत्र और ब्राह्म- रामचंद्रकी पादुका ला कर ब्रह्मचारीके वेशमें नन्दीग्राममें कुलमें उत्पन्न हुए थे। उस जन्ममें उनके । वैमात्रेय रह कर राज्यशासन किया था। चौदह वर्ष बाद राम- अग्रज और एक सहोदरा भगिनी थी। ये लोकसङ्ग- चंद्रके भयोध्या लौटने पर इन्होंने ज्येष्ठ भ्राता रामचंद्र विवर्जित रहनेके अभिप्रायसे जड़वत् रहते थे। काला- को राज्य लौटा दिया। न्तरमें इनके मातापिताको मृत्यु हुई । इनके साथ किसी- भरतके तक्ष और पुष्कर नामके दो पुत्र थे। भरतने का कैसा ही व्यवहार क्यों न हो, ये उस पर ध्यान नहीं अपने दोनों पुत्रोंको साथ ले कर सपुत्र गन्धर्वराज देते थे। इनकी भौजाइयां इनका बहुत अनादर शैलूशसे युद्ध कर सिन्धुनदके उत्तरस्थित गंधर्वदेश जय करती थीं। यहां तक कि अखाद्य तक खिला देती थीं। किया और उस प्रदेशको दो भागोंमें विभक्त कर अपने अंतमें उनके ज्येष्ठ भाताने अपनी स्त्रीके कहे अनुसार उन दोनों पुत्नोंको बांट दिया । पुत्रोंने तक्षशिला और खेत रखानेका काम सौंप दिया।