पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७४९

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भर-भरोच' ७४. (भमृशीत चरितसरितनिनिमिमम्जिम्प उः । उण ११७) : भरैया (हिं० वि०) १ पोषक, पालन करनेवाला। २ भरने- १विष्णु। २ समुद्र । ३ स्वामी । ४ वर्ण ५ शिव। वाला, जो भरता हो। भरु (हिं० पु०) बोझ, वजन। भराच-बम्बई प्रदेशका एक जिला। यह अक्षा० २१ २५ भरमा (हिं० पु० ) १ टसर २। भड़ आ देखो । से २२. १५२० तथा देशा० ७२ ३१ से ७३ १० पू०के भरुक (सं० पु०) दक्षिणदेशभेद । - मध्य अवस्थित है। भूपरिमाण १४६७ वर्ग मील है। इस- भरुकच्छ (सं० पु०) प्राचीन देशभेद । यह भरोच नामसे के उत्तरमें माही नदी, पूर्व में बडोदा और राजपिप्पलीका ही प्रसिद्ध है। भरोच देखो। सामन्तराज्य, दक्षिणमें किम नदी तथा पश्चिममें कोम्ब भरुका (हिं० पु० ) पुरवेके आकारका चुक्कड़।। (खम्भात : उपसागर है। भरुज (सं० पु०) भेति शब्देन रुजतीति रुज-क । क्षुद्र खम्भात उपसागरवत्तीं स्थान पलिमय मट्टीसे शृगाल, छोटा गीदड़। गठित है। बीचमें बालुकास्तूपकी तरह इतस्ततः विक्षिप्त भरुटक (सं० क्लो०) भृ-वाहुलकात् उट, संज्ञायां कन् । कितने गण्डशैल सागरोपलके वांध रूपमें दण्डायमान भृष्टामिष, भूना हुआ मांस । हैं। माही और किम नदीके अलावा यहां धाधर और भरुहाना (हि० कि० ) १ घमण्ड करना, अभिमान करना। नर्मदा नामको और दो नदी बहती हैं। किमारा अधिक २ बहकाना, धोखा देना। ३ उत्तेजित करना, बढ़ावा ऊंचा होनेसे नदीके जल द्वारा खेतीवारीमें सुविधा नहीं देना। होती। समतल जमोनका जल गडढे में गिर कर नदी में भरुही (हिं० स्त्री०) १ कलम बनानेकी एक प्रकारकी कच्ची अथवा स्वयं : पश्चिमउपकूलवती ढालू जमीनसे खाड़ी में किलक । २ भरतपक्षी देखो। गिरता है। धाधर नदीके विस्तृत मुहानेके सिवा यहां भरेंड ( हिं० पु० ) रेड देखो। मोटा, भूखी और बंद नामक कितनी खाड़ियां हैं। भरे ( सं० अव्य० ) भृ बाहुलकात् ए । संग्राम । यहांकी मिट्टो काली होनेसे रूई बहुतायतसे भरेङ्ग-काश्मीर राज्यके अन्तर्गत एक उपत्यका विभाग। उपजता है। इसके अलावा यहां आम, ताड़, इमली, यह अक्षा० ३३ २० से ३३ ३० उ० तथा देशा० ७५ बबूल आदि वृक्ष भी हैं। इस ताड़ पेड़के रससं एक १० से ७५३६ पू०के मध्य अवस्थित है। यह स्थान प्रकारको शराब तैयार होती है। भरोच नगरसे ६ कोस सुरम्य गिरिकन्दर और निझरादिसे परिशोभित है।। उत्तर नर्मदा नदीके किनारे एक छोटे द्वीपमें 'कवीरवट' आचावाद नामक विख्यात प्रस्रवणसे भरेङ्गी नदी नामका एक बड़ा बटवृक्ष है। साधुश्रेष्ठ कबीरने इस वृक्ष- निकली है। मोरवल नामक गिरिसङ्कट हो कर इस को डालसे दतधन किया था, ऐसा सुना जाता है । उपत्यकामें पहुंचते हैं। वर्तमान भरुच ( Bronch) जिलेका प्राचीन नाम भरेगी-काश्मोरराज्यमें प्रवाहित एक नदी । भरेङ्ग उपत्यका देशमें प्रवाहित होनेके कारण इसका भरेङ्गो नाम पड़ा है।

  • यूरोप भ्रमणकारीके पानसे मालूम होता है, कि १७८०

भरेट (हिं. पु०) दरवाजे के ऊपर लगी हुई वह लकड़ी ईमें इस वृक्षों ३५० बड़े और ३ हजार छोटे छोटे तने थे। १०५ जिसके ऊपर दीवार उठाई जाती है। इसे 'पटाप' भी. मूल तनेकी परिधि प्रायः २०.० फुट थी। एक समय इस वृक्षके नीचे ७ हजार सेनाने आश्रय ग्रहण किया था। १८२६०में कहते हैं। भरेषुजा (सं० पु.) सोमका नामान्तर । विशाप हेवर ( Bishop Helver )-ने इस वृक्षको देख कर भरेहनगरो (सं० स्त्री०) चर्मण्वती नदीके सङ्गम पर लिखा है, कि कुछ दिन हुए, नदीकी बाढ़से इसका कुछ अंश अवस्थित एक नगर । यहांके राजा भगवान्देवके राज्य- : बह गया है। अभी भी जो मौजूद है उसके जोड़का पृथ्वी कालमें पण्डितपर नीलकण्ठ द्वारा श्राद्धमयख रचा भर नहीं है। काल और वन्याके प्रभावसे इसका पूर्वगौरव जाता गया।