पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७५३

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भत कत्य-भन्न हरि प्रभु, ईश्वर, विभु, ईशित, इन, नायक । २ स्वामी, कात्यायन श्रौतसूत्रभाष्यके प्रणेता अनन्त और याविक- खाविन्द । ३ विष्णु । ( त्रि०) ४ धाता और पोटा। देव तथा हेमाद्रि, शूलपाणि आदिने इनका नामोल्लेख भन्न कृत्य (स' क्लो०) स्त्रीके प्रति स्वामीका कर्त्तव्य, किया है। . • एलीको स्वास्थ्यरक्षा और गर्भाधानादिके सम्बन्धमें भर्तीवता (सं. स्त्री०) भर्ता एव व्रतं यस्याः । पति- पतिका कर्त्तव्याकर्त्तव्य भावप्रकाशमें इस प्रकार लिखा व्रतास्त्री। भक्त सात् ( सं० अन्य ) भक्त साति । भर्राके अधीन । "आयुःक्षयभयाद्भर्ती प्रथमे दिवसे स्त्रियम् । भत्तु स्नान (सं० क्ली० ) १ तीर्थभेद । २ पतिस्थान । द्वितीयेऽपि दिने रत्यै त्यजेतुमती तथा ॥ भत्त स्वामिन् - एक प्राचीन कवि । भट्टि देखो। तत्र यश्चाहितो गर्भो जायमानो न जीवति । भत्तहरि (सं० पु०) स्वनामख्यात एक वैयाकरण और आहितो यस्तृतीयेऽहि स्वल्पायुर्विकलाङ्गकः ।। कवि। आप उज्जयिनी-राज विक्रमादित्यके भ्राता थे। अतश्चतुर्थी षष्ठी स्याइष्टमो दशमी तथा। राजावलीमे लिखा है, गन्धर्वसेनके औरस और दासीके द्वादशी वापि या रात्रिस्तस्यां तो विधिना भजेत् ॥" गर्भसे इनका जन्म हुआ था। भत्तघ्नी (सं० स्त्री० ) भर्तारं हन्तीति हन-ढक् ङाप् । “अथ कालेन कियता रममाणा महीतले । पतिघातिनी। दास्यां गन्धर्वसेनस्तु पुत्रमेकमजीजनत् ॥ भत्तत्व (सं० क्लो० ) भत्तुर्भावः त्व। पतित्व, पतिका तस्य भर्तृहरीत्येवं नाम चक्र महामतिः।" भाव या धर्म। (राजावली ४।१-२) भर्श दारक (स० पु० ) भर्ता द्रियते इति गुङ् भादरे बत्तीस-सिंहासनमें इनका विवरण इस प्रकार मिलता कर्मणि घम् ततः स्वार्थे कन् । नाट्योक्तिमें युवराज। है :---विक्रमादित्य के पिताके औरस और उनकी मातृ- नाटकमें युवराजको भरी दारक नामसे संबोधन किया सखीके गर्भसे भर्तृहरिने जन्मग्रहण किया था। विक्रमा- जाता है। दित्यके परामर्शसे उनके मातामहने उन्हें राजसिंहासन- भर्ग प्राप्तिवत-स्वामिलाभके लिये स्त्रियोंका आचरणीय : सोंप दिया। ये अत्यन्त स्त्रण थे । पोछे स्त्रीको दुश्च. व्रतभेद । वराहपुराणमें लिखा है, कि बासन्तो शुक्ल- रित्ताको देख कर संसार त्यागी हुए। इनके द्वारा प्रणीत पक्षको द्वादशी तिथिको यह व्रत किया जाता है। हरिकारिका, वाक्यप्रदीप और शृङ्गारशतकादि ग्रन्थ- (वराहपु० २६६ अध्याय) : विशेष प्रसिद्ध हैं। बहुतसे विद्वान् इनके इस राज- भत्त भट्ट-गुहिलवंशीय एक राजपूत राजा। ये मङ्गल के भ्रातृत्वको अनुमान सापेक्ष समझते हैं। प्रवाद है, कि बाद चित्तोरके सिंहासन पर बैठे। उनके द्वारा प्रतिष्ठित राजा भत्तु हरि अपनी प्रियतमा पत्नीके चरितमें सन्देह भजयगढ़ और धरणगढ़ आज भी विद्यमान है। उनके : हो जानेसे राजपाट छोड़ कर काशी चले गये थे। वहां १३वे पुत्र मालव और गुर्जरराज्यमें राज्यप्रतिष्ठा करके । संन्यासवत ले कर उन्होंने योगधारण किया था। 'भाया तिहोट नामसे परिचित हुए थे। उसी समय उन्होंने शृङ्गारशतक, नीतिशतक और भत्तुंमती ( स. स्त्रो० ) भर्ता विद्यतेऽस्य मतुप । स्वामि वैराग्यशतक नामक सौ सौ श्लोकों के तीन अन्य रचे युक्ता स्त्री, सधवा स्त्री। थे। इन प्रन्थों का अनुवाद १६७० ई०में पहले फरासी भत्तु मेण्ठ–एक प्राचीन कवि । श्रीकण्ठरचित शाङ्गधर भाषामें, फिर लैटिन, जमैन और अङ्ग्रेजी भाषामें हुआ। पद्धति मौर सुवृत्तितिलकमें इसके रचित श्लोक उद्धत व्याकरण-शास्त्र में भी इनकी विशेष व्युत्पत्ति थी । इनका वाक्यप्रदीप चा हरिकारिकासून पाणिनिकी तरह आदर भत्तु यह एक प्राचीन पण्डित । इन्होंने कात्यायन-श्रीतः प्राता है। इसके सिवा आपने महाभाष्यदीपिका और सूत्रका एक भाष्य और श्राद्धकल्प प्रणयन किया। महाभाष्यतिपदी व्याख्या नामक दो अन्य और भी लिसे