पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७६२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


भल्लुकशोर--भवावस्मर नेपालके समीपयती हिमवत् प्रदेशमें एक प्रकारका ! भवरी ( हि स्त्री० ) भंवरी देखो। बिडालमुखी भल्लुक ( Ailurus fulgens) देखनेमें भवंत ( हिं० वि० ) भवत्का बहुवचन, आप लोगोंका, आता है। उनके शरीरका रंग गेरू मिट्टीकी तरह लाल आपका। होता है और मुख तथा कर्णकुहर सफेद लोमोसे ढके होते भवलिया (हि. स्त्रो०) एक प्रकारको नाव । यह बजरकों हैं। कानोंका बाहरी हिस्सा तथा नीचेसे ले कर पूछ। तरहको पर उससे कुछ छोटी होती है। इसमें भी बजरे- तकका भाग काला होता है। मुखसे ले कर समस्त की तरह ऊपर छत पटी होती है । इसे भौलिया भी देह भागकी लम्बाई २२ इञ्च और पूछ करीब १६ इञ्चकी कहते हैं । होती है। | भव (सं० पु०) भूपते इति भू-भावे अप । १ जन्म, यह सुन्दर पशु नेपालमें “ओआ" कहलाता है । इस- उत्पत्ति । भवत्यस्मात् भू अपादाने अप् । २ शिव । महा: का खाना भालुओंके सदृश ही है, सिर्फ जलपान और देवकी जल-पूर्तिका नाम भव है। 'भवाय जलमूर्तये नमः' मूत्रत्याग बिडालके समान है। परन्तु इसका गुर्राना ( पार्थिव शिवपूजाप्र०) शतपथ ब्राह्मणमें इसकी नामनिरुक्ति भालुओं जैसा ही है। दुग्ध मिश्रित अन्न इनको बहुत हो । यों लिखी है,--."तमब्रवीद भवोऽसीति तयदस्य तन्नामाकरोत् अच्छा लगता है। वसन्त ऋतु में गर्भिणो भल्लुकी दो पर्य्यन्यस्तद्र पमभवत् पर्यन्या वै भवः" (२.त० वा० ६।१।३।१५ ) बच्चे जनती है। भवति प्रभवत्यनेनेति भू-अप् । ३ क्षेम, कुशल । भवति भल्लुकशोर --चतुष्पद प्राणिविशेष ( Iictiony s colli: उत्पद्यतेऽस्मिन्निति भू-आधारे अप्। ४ संसार । ५ ) पूर्ववङ्ग. आसाम, श्रीहट्ट, आराकान और नेपालको सत्ता । ६ प्राप्ति । ७ कारण, हेतु। ८ फलभेद । । मेघ, तराईमें ये बहुतायतसे पापे जाते हैं। इनका मस्तक, वादल । १० कामदेव । ११ संसारका दुःख, जन्म मरणका गला और वक्षस्थल पीलापन लिये सफेद और पश्चा- दुःख। . द्भाग कृष्णाभ धूसर होता है। एक वयःप्राप्त पशु प्रायः भव ( हि० पु०) १ भय, डर। (वि०) २ कल्याणकारक, २५ इञ्च लम्बा होता है। शुभ । ३ उत्पन्न, जन्मा हुआ। दिनको ये गाढ़ी नींदसे सोते और रातको शिकार- भपक ( स० त्रि०) भवतादिति भूवुन् । १ उत्पन्न, जन्मा को खोज में वाहर निकलते हैं। स्थूलदेहके कारण इन हुआ। २ आशीर्वाचक । को चाल धीमी है। जरूरत पड़ने पर ये भालूको तरह भवकल्प ( स० पु०) कल्पभेद । पिछले पैर पर बल दे कर खड़े रहते है। फलमूल और | भवकाण्डार ( स० क्लो० ) भवाटवी, संसाररूप अरण्य । मांसादि इनका प्रधान भोजन है। भवकेतु ( स० पु०) केतुभेद । वृहत्संहिताके अनुसार भालूक (स० पु०) भन्लुते इति भल्ल (उलुकादयश्च । उण एक पुच्छल तारा । यह कभी कभी पूर्व में दिखाई देता है ४।४१) इति ऊक प्रत्ययेन साधुः । १ जन्तुविशेष, भालू ।। और इसकी पूंछ शेरको पूंछकी भांति दक्षिणवर्त होती पर्याय-मन, भल्ल, सशल्य, दुर्घोष, भल्लुक, वृष्ठदृष्टि, | है। कहते हैं, कि जितने मुहर्त तक यह दिखाई देता है, दाषित, चिरायु, दुश्चर, दीर्घदशी भालुक, भालूक, अच्छ, उतने महीने तक भीषण भाकाल या महामारो भादि भालु का शमदरल्ला०) २.कोषस्य प्राणिविशेष, सुश्रुतके | होती है। अनुसार शंखको तरहका कोशमें रहनेवाला एक प्रकार- भवक्षिति (स. स्त्री० ) भवस्य जन्मनः क्षितिः। जन्म- का जोव । ३ एक प्रकारका श्योनाक । ४ कुक्कुर, भूमि । भवगुप्त-चन्द्रवंशीय एक राजा । थे विकलिङ्गके भधि- भयं (हिं० स्त्रो०) भौंह देखा। पति थे। भवर (हि.पु.) भँवर देखो। भवघस्मर ( स० पु०) भवस्य वनस्य धस्मरः ध्वंस- भवरकलो ( हि स्त्रो० । भँवरकली देखो। कारक । दावानल। फुत्ता।