पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७६७

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. भवनीय-भवति भवनीय (स० लि. ) भावमा मिति भू-अनीयर सिवि- प्रसिद्ध महावि भवतिने मालतीमाधवके अति- तष्य, भव्य। ति, उत्तरराचिरित और वीरचरित नामक और भी दो पु०) भवत्यति भू-(तृ-भू-वहिवसीति । उण ३) नाटक रच क नाट्यजगतमें प्रसिद्धि प्राप्त की है। इन 5) इति झन्, स च षिद्भवति । वर्तमान काल । के रचे ग्रन्थोंक पढ़नेसे नाट्यकारके अत्यन्त रचना. पनयन के बाद ब्राह्मण भिक्षा करनेके समय, ब्राह्मणः । कौशलका परिचय मिलता है। कविने नाटकाङ्कमें. अभि- को भवत्-पूर्व, क्षत्रियको भवन्मध्य और वैश्यको भवदन्त नव दृश्योंकर अवतारणा कर अपनी नाट्यशक्ति और सम्वोधन करके भिक्षा करे। बुद्धिवृत्तिके तीक्ष्ण प्रस्फुरणको साधारणके गोचरीभूत "भवत पूर्व चरेद्भक्षमुपनीतो द्विजोत्तमः । किया है। नाटककी भाव-गभीरता और अभिनय-निपु- भवन्मध्यं तु राजान्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ॥" णताका अनुधावन करनेसे अन्तःकरणमें युगपत् विस्मय (मनु २।४६ ) और अपूर्वत्व समुदित होता है। उत्तरचरितमें शम्बुक- भवन्ति (सं० पु०) भू (भुवो मिच् । उण. ३१५०) इति झिच् । को मारनेकी इच्छासे रामचन्द्र जो जनस्थानमें लाये गये वर्तमानकाल। है, उसमें कविने ऐसे कौशलसे काम लिया है कि वे सब भवनाथ (संपु०) विष्णु । तरफसे अपनेको बचा ले गये हैं। पूर्वस्मृतितोंके सन्द- भवन्मन्यु (संपु०) राजपुत्रभेद । र्शनसे कहीं उनके हृदयमें अवश्यम्भावी परिताप और भवपाली (स. स्त्री० ) तान्त्रिकोंके अनुसार भुवनेश्वरी-: वेदना उपस्थित न हो तथा उसके कारण भविष्यमें कोई देवी जो संसारको रक्षा करनेवाली शक्ति मानी दुर्घटना न हो जाय, इस आशङ्कासे कविने अपूर्व कौशल- जाती है। से रामचन्द्र के चितमें शान्ति-विधानके लिए छायारूपी भवपीठ -शिवलिङ्गाधिष्ठित पोठभेद । ( शिवपुराण ) । सीताको ला कर नाट्यशक्तिकी पराकाष्ठा दिखा दी है। भवप्रत्यय (सं० स्त्री०) समाधिकी एक अवस्था जो . उक्त ग्रन्थके प्रथमाडूमें उन्होंने रामचरित्र अभिनयकी प्रकृति लयोंको प्राप्त होती है। अवतारणा कर नाट्यशक्ति और बुद्धिका अपूर्णविकास भवबन्धन (स० पु०) सांसारिक दुःख और कष्ट संसार प्रकट किया है। नाट्याभिनयको ऐसी अलौकिक आलोक- की झंझट। रश्मि भवभूति ही अपनी प्रखर-कुशली बुद्धिके प्रभाबसे भवभञ्जन ( सं पु० ) १ परमेश्वर । २ संसारका नाश सर्व प्रथम प्राचीन संस्कृत जगत्में प्रदोपित कर गये हैं*। करनेवाला, काल। ग्रन्थकारके जीवनेतिहासकी कोई विशिष्ट घटना भवभट्ट-एक ग्रन्थकार। इन्होंने तत्त्वकौमुदी नामक लिपिवद्ध नहीं हुई है। इस कारण उनके वाल्यजीवन शिशुपालबधको टीका और सुबोधिनी नामक रघुवंश और वाक्यकी कोई अपूर्व आख्यायिका नहीं मिलती। को टीका लिखो है। वीरचरित और मालती-माधवकी प्रस्तावनामें कविने भवभय (स.पु.) संसारमें बार बार जन्म लेने और सूत्रधारके मुखसे इस प्रकार आत्मपरिचय ज्ञापन किया मरनेका भय। है, दक्षिणापथके विदर्भदेशके अन्तःपति पद्मपुर नगरमें भवभामिनी ( स० स्त्री० ) पार्वती, भवानो । कविका जन्म हुआ था। उस नगरमें यजुर्वेदकी तैत्तरीय भवभावन (सपु०) विष्णु। शाखाके अध्यायो, काश्यपगोत्र-सम्भूत, धर्मानुष्ठानरत, भवभूत ( स० क्ली० ) भवरूप, अवितथस्वरूप परमेश्वर । ...-----....... ......... भवभूति (स० पु०) भवेन शिवेन भूतिरैश्वर्यादिकं . * उक्त उत्तर रामचरितके अनुवादक पण्डितवर विलसन् साहब यस्य भव एव भूतिर्यस्पेति वा, शिवोपासनयैवास्य विद्या ने लिखा है, कि यूरोपीय कवि Shakespear, Beanmont उत्पत्ते स्तथा त्वं । मालतीमाधवादि नाटककोंके कर्ता, और Fletcher आदि नाटकोंमें नाटककी अवतारणा कर तो एक कवि । पर्याय-भूगर्भ । ( जटाधर ) गये हैं, पर वे भारतीय महाकवि भवभूतिके परवर्ती हैं। Tol, xy 191