पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/८

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प्रेतशौच-तत्रादः अन्येषां यातनास्थानां प्रेतलोकनिवासिनाम् । स्ट. "नसे लौट कर स्नान कर ले, पीछे यमसूक्त तेषामुद्धरणार्थाय हम पिण्डं ददाम्यहम् ॥ पा सके से तर्पणाहवारने होते हैं। संसार पशुयोनिगता ये च पक्षिकीटसरीनृपाः । 'अनित्य है, एक न एक त मोदी मृत्यु होगी हो, अथवा वृक्षयोनिस्थास्त भ्यः पिण्डं ददाम्यहम् ॥ ऐसा सोच कर मृत व्यतिपाय ..ये रोना धोना उचित असंख्ययातनासंस्था ये नीता यमशासने । नहीं। अनन्तर घर जा के दरवाजे पर रखे हुए नीम- नेपामुद्धरणार्थाय इम पिण्डं ददाम्यहम् ॥ की पत्तीको दांतसे काट कर जलसे हाथ धो डाले । पीछे जात्यन्तरसहस्राणि भ्रमन्तः स्वेन कर्मणा। आचमन और अग्निस्पर्श करके घरमें प्रवेश करे। घरको मानुष्यं दुर्लभं येषां तेभ्यः पिण्डे ददाम्यहम् ॥ चारों ओर गोवरसे पोत देता आवश्यक है। घर जिस- ये वान्धवावान्धवा वा येऽन्य जन्मनि वान्धवाः। से पवित्र रहे उस पर विशेष ध्यान देना चाहिये । ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा ॥ “प्रेतशीचं प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्व यतव्रताः। ये केचित् प्रेतरूपेण वर्त्तन्ते पितरो मम । ऊणद्विषं निखनेन्न कुर्यादुदकं ततः ॥” इत्यादि ॥ ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा ।। (गरुडपु० १०६ अ०) ये मे पितृकुले जाताः कुले मातुस्तथैव च। ज्ञाति भिन्न जो सब व्यक्ति प्रेतके अग्निकार्यके लिये गुरुः श्वशुग्वन्धूनां ये चान्ये वान्धवा मृताः ॥ । श्मशान गये थे, उन्हें केवल एक दिन तक अशौच होता ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः। । है। एक दिनके बाद उनकी शुद्धि होती है। जो शाति क्रियालोपगता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा ॥ हैं, उन्हें पूग अशौच मानना पड़ता है। विरूपास्त्वामगर्भा ये ज्ञाताशाताः कुले मम । ___ अशौच का विषय प्रेताशौचमें देखो। तेषां पिण्डं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठताम् ॥ प्रतश्राद्ध ( स० क्ली०) प्रेताय प्रेतोद्देश्यक वा श्राद्ध। साक्षिणः सन्तु मे देवाः ब्रह्म शानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितृणां निष्कृतिः कृता॥ - प्रतोद्देश्यक श्राद्ध, किसीके मरनेको तिथिसे एक वर्षके आगतोऽह गयां देवपितृकार्ये गदाधर । । अन्दर होनेवाले सोलह श्राद्ध जिनमें सपिण्डी, मासिक तम्मे साक्षी भवस्वाद्य अनृणोऽहमृणत्रयात् ॥” और पाणमासिक आदि श्राद्ध सम्मिलित है। (गयामा०८६ अ०) "द्वादश प्रतिमास्यानि आद्य पाण्मासिके तथा।


:ोप्रणिता --...-.- पान मपिरा

षोड़शम् ॥” (श्राद्धतत्त्व) पद्धके