पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/८८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


फाल (सं० क्ली० ) फलाय शस्याय हित फल-अण वा फालरुए स्थान पर पेशाब नहीं करना चाहिये। फल्यते विदार्यते भूमिरनेनेति फल-घम् । १ हलोपकरण। २कर्षितभूमिमें उत्पा, जो हलसे जोते हुए खेतमें उत्पन्न २ लोहे की चौकोर लम्बी छड़ जिसका सिरा नुकीला हो। बहुतसे व्रतोंमें फालकृष्ट पदार्थ नहीं सस्ये जाते। और पैना होता है। यह हलकी अकड़ीके नीचे लगा फालखेला (सं० स्त्री०) भारतो पक्षी।। रहता है। जमीन इसीसे खुदती है। हिन्दीमें यह फालगुप्त ( स० पु०) बलरामका एक नाम । शब्द स्त्रीलिङ्ग माना गया है। संस्कृत पर्याय-कृषिक, फालजुर--श्रीहजिलेके अन्तर्गत एक गण्डग्राम और कृषक, फल, कृषिका, कुशिक । ३ महादेव । ४ बलदेव । पीठस्थान । ५ कार्पासवस्त्र, सूती कपड़ा । ६ फावड़ा । ७ नौ प्रकारको श्रीहट्टजिलेके उत्तरपूर्वा शमें जयन्ती-राज्य है। यह दैवीपरीक्षाओं या दियोमसे एक । दिव्यतत्व में लिखा राज्य १८ परगनोंमें विभक्त है। जिनमेंसे फालजुर एक है, कि जो चोरी करते हैं, उन्हें यह दिव्य करना होता परगना है। इसकी गिनती एक प्रधान पीठस्थानमें है। है। बारह पल लोहेका एक फाल बना कर उसे अच्छी यहां देवीकी वामजड़ा गिरी थी। इस कारण इसे वाम- तरह तप्त कर ले। विचारक यथाविधाम धर्म और जङ्गापीठ भी कहते हैं। वामजङ्गापीठका साधारण नाम अग्निकी पूजा करके चोरके मस्तक पर निमलिखित फालजरकी कालीबाड़ी है। तन्वयूडामणिके मतसे,- मन्त्रसे एक जयपट्ट लिख दे। "जयन्त्यां वामजङ्घा च जयन्ती क्रमदीश्वरः।" मन्त्र यथा- यहांकी देवीका नाम जयन्ती है। इन्हींके नामा- “त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि पावक। नुसार यह स्थान जयन्तिया नामसे प्रसिद्ध है। यहाँके साक्षिवत् पुण्यपापेभ्यो न हि सत्यं कर मम॥ भैरवका नाम क्रमदीश्वर है । तन्त्र कहते हैं- यह मन्त्रलिखित जयपट्ट उसके मस्तक पर दे कर! "कैलाशे दशलक्षणे जयन्त्यां पञ्चलक्षतः।" विचारक उससे कहे, 'इस तप्प की हुई फालको जीभले अर्थात् पश्चलक्षमात्र मन्त्र के जपसे ही यहां सिद्धि चाटो, यदि जीभ जल जायेगी तो तुम दोषी और यदि होती है। न जलेगी, तो निर्दोष समझे जाओगे। अनन्तर उसके श्रीहट्ट नगरसे उत्तर-पूर्व पर्वतके नीचे एक खण्ड फलानसार विचारक अपराधीको दण्नु थे। समतलभमि है जहां टेकी एक प्रकाण्ड भित्तिके फाल ( हिं० स्त्री० ) १ किसी ठोस चीजका. काटा या मध्यस्थित एक चतुष्कोण गर्त है, उसी गर्समें यह महा- कतरा हुभा टुकड़ा जिसका दल पतला होता है। २ पीठ एक चतुष्कोण पत्थर पर अवस्थित है। भैरव भी की सुपारी, छालिया। (पु.) ३ उग, फलांग। ४ प्रस्तररूपी हो कर देवीके साथ एकत्र अवस्थान करते हैं। कदम भरका फासला, च। १८३७ ई० तक इस मन्दिरके सामने सैकड़ों नरवलि हो फालकाराव अनोवा-वालियर-वासी एक महाराष्ट्र गई हैं । वृटिश-गवर्मेण्टने यह नृशंस प्रथा उठा देने के लिये ब्राह्मण। इनका जन्म-संवत् १९०१में हुआ था। ये जयन्ती राज्यको अपने दखलमें कर लिया है। तभीसे लछमीनारायणके मन्त्री थे तथा भाषाके भन्छे कवि थे। मरवलि बन्द हो गई है। इन्होंने केशवदास विरचित कविप्रियाको सुन्दर टीका देवी मन्दिरके पूरब एक अति प्राचीन पुष्करिणी है। लिखी थी। वर्षाके समय भी इसका जल परिष्कार और पतला अथव फालकृष्ट ( सं० वि०) फालेन कृष्टः ३-सत् । १ फाल द्वारा एक भावमें रहता है। कभी भी घटता बढ़ता नहीं अष्ट, हलसे जोता हुआ। देखनेसे चमत्कृत होना पड़ता है। "न फालकृष्टे न जले न चिल्यां न च पर्वते। जयन्तीकी स्वाधीनताके समय राजोचित भावमें ही न जीर्णरेषायतने न बरमीके कदाचन ॥" देवीकी सेवा होती थी। राजा कहते थे, “समस्त जयन्ती- (मनु. ४४६) | राज्य देवीजीके हैं-उनके लिये फिर पृथक होत