पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/९७

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फिरा-फिरङ्गीबाजार पिण्ड बनाये कि उसमें पारद जरा भी दिखाई न दे।' पिप्पली, वंशलोचन, जटामांसी और तेजपत्र प्रत्येकका अनन्तर लवङ्गचूर्णं उसके चारों तरफ लगावे। अब चूर्ण एक एक तोला, मधु एक पाव और घी एक पाव, उस गोलोको जलके साथ निगल जावे, पर याद रहे, . सबको एकल पीस कर एक एक तोलेका इक्कीस खुराक निगलते समय वह दाँतसे छू न जाय। इस प्रकार रस बनावे। प्रतिदिन एक एक खुराक खानेसे सब प्रकारके कपूरका सेवन करके पीछे पान चबाना उचित है। इस फिरङ्ग रोग नष्ट होते हैं । इन इक्कीस दिनों तक नमकका औषधका सेवन करनेके बाद शाक, अम्ल, लवण, परिश्रम, बिलकुल व्यवहार न करे। फिरङ्गरोगमें जितने प्रकार- रौदसेवन, पथपर्यटन और स्त्रीसङ्ग बिलकुल निषिद्ध है। को औषधोंका व्यवहार बतलाया गया है, उनमेंसे पारद इन सब निषिद्ध व्योंके सेवनसे रोग बढ़ जाता है। ही प्रधान है। (भावप्रकाश ) पारद आध तोला, खदिर आध तोला, आकरकरा फिरङ्गरोटी ( स० स्त्री०) फिरङ्गप्रिया रोटी, फिरङ्गाणां एक तोला इन सब दुव्योंको एक साथ खलमें पीस कर रोटोति वा। रोटिकाविशेष, पावरोटी । यह रोटी फिर- सात गोली बनावे। प्रतिदिन सबेरे जलके साथ एक गियों को अतिशय प्रिय है अथवा फिरङ्गदेशमें ही खास एक गोली सेवन करनेसे फिरङ्गरोगका आठवें दिनमें कहीं कर प्रस्तुत होती है, इसीसे इसको फिरङ्गगेटो कहते पता न रहेगा। इस औषधका सेवन करके अम्ल और है। पाकराजेश्वरमें इसकी प्रस्तुत प्रणाली इस प्रकार लवणका बिलकुल परित्याग करना पड़ता है। इस लिखी है. -गेहूंके चूरमें ताल या खजूरका रस और सौंफ- औषधका नाम सप्तसालिवटी है। इस रोगमें धूमप्रयोग का पानी डाल कर उसे कुछ समय तक गूधते हैं । पीछे भी हितकर बतलाया गया है। पारद २ तोला, गन्धक मोटी मोटी लिट्टी बना कर तन्दुरपाकमें पकान हैं। इस १ तोला और विधङ्ग २ तोला इन सब ढव्योंको एक प्रकार जो रोटी बनती है, उसीका नाम फिररोटी है। साथ पीस कर कजली करे, पीछे उससे सात गोलो फिरङ्गिणी (सं० स्त्री० ) हिन्देशोजन्मस्थानत्वेना- बनावे । प्रतिदिन एक एक गोली द्वारा धूम प्रयोग करने- स्त्यस्या इति फिरङ्ग इनि, ङी। फिरङ्गन्देशाद्भव नारी, से फिरङ्गरोग अवश्य दूर हो जाता है। अलावा इसके मेम । आध तोला पारदको बड़े लाके रसमें घिसे, जब तक पारद "गन्धरोगः फिरङ्गोऽय जायते देहिनां ध्रव । दिखाई न दे, तब तक घिसते रहे। अनन्तर इसके द्वारा। फिरङ्गिणोऽतिससर्गात् फिरङ्गिण्याः प्रमङ्गतः॥” ७ दिन पाणिखेद देनेसे फिरङ्गरोग नष्ट हो जाता है । यह (भावप्रकाश) खेद देकर अम्ल और लवणका बिलकुल व्यवहार न फिरङ्गी ( हिं० वि० ) १ फिरंगद शमें उत्पन्न । २ फिरंग करे। देशमें रहनेवाला, गोरा। ३ फिरंग देशका । (स्त्री०) ___एतद्भिन्न नीमकी पत्तियोंका चूर्ण आठ तोला, हरी- - ४ यूरोपद शकी बनी तलवार, विलायती तलवार । तकी चूर्ण एक तोला, आमलकी चूर्ण एक तोला और फिरङ्गीपुर--दाक्षिणात्यके कृष्णा जिलान्तर्गत एक प्राचीन हरिदा चूर्ण आध तोला इन सबको एक साथ मिला कर नगर। यह गुण्टूरसे ६॥ कोस पश्चिममें अवस्थित है। जल वा मधुके साथ आध तोला तोबचीनीका चूर्ण खाने- निकटवत्तीं कोण्डबिडू पर्वतमाला पर एक प्राचीन दर्ग से फिरङ्गरोग जाता रहता है। इस औषधके सेवनमें । देखनेमें आता है। रेडीसरदारगण उन दुर्ग का निर्माण लवणका परित्याग करना पड़ता है। एकांत पक्ष कर गये हैं। पर्वतके नीचे बहुतसे प्राचीन हिन्दू देव- में लवणका परित्याग नहीं कर सकनेसे सैन्धव-सेवन मन्दिर और मसजिद विद्यमान हैं। किया जा सकता है। पारद दो तोला, गन्धक दो तोला, फिरङ्गीबाजार--ढाका जिलेसे अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम । और खदिरकाष्ठ दो तोला इन सबको एक साथ पीस ! यह अक्षा० २३ ३३ उ० तथा देशा० ६० ३३ पू०के मध्य कर कजली बनावे। पीछे हरिद्रा, नागकेशर, लिकटु, इच्छामती नदीकी एक शाखा पर अवस्थित है। बश्वर स्थूलजीरा, कृष्णजीरा यवानी, रक्तचन्दन, श्वेतचन्दन, साईस्ता खाके शासनकालमें १६६३ ई०को पुतंगोजीने