|
था । प्राचीन चम्पा भागलपुर ही था। भागलपुर नगर के पास आजतक चम्पानगर नामक एक प्राचीन शहर है । चम्पा देखो। १३ सूर्यवंशीय राजाके ओरस और आग्नेयोके गर्भ- से हुई अङ्ग नामको एक सन्तान । अङ्गको स्वीका नाम सुनीता और उनके पुत्रका नाम वेण था । अङ्ग (क्लो०) १४ पाणिनिग्टहीत संज्ञा विशेष । यस्मात् प्रत्यय- विधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् । पा २ । ४ १३ । यस्मात् प्रत्ययो विधीयते धातोर्वा प्रातिपदिकाद्दा तदादि शब्दरूपं प्रत्यये परतोऽङ्गसंज्ञ' भवति । (वृत्ति) जिस धातु या प्रातिपदिकके उत्तर जिस प्रत्ययका विधान किया जाता और वही प्रत्यय जिसके बाद रहता है, उस प्रकृतिवाले समुदायको अङ्ग कहते हैं । जैसे, राम शब्द एक प्रकृति है । इसके बाद मानो सुप्रत्यय लगाया गया। यहां प्रत्यय परे रहने से व्यपदेशिके समान भावमें राम शब्दको अङ्ग संज्ञा हुई । अङ्गसंज्ञा करनेका फल है,-एङ् खात् संबुद्ध । पा ६।१।६ । एङन्त या हुखान्त अङ्गके परे सम्बोधनका जो हल् हो, उसका लोप हो जाये। राम एक हुखान्त शब्द । इसके बाद सम्बुद्धिका हल् वर्ण सु रहनेसे ।सकारका लोप होगा। जैसे, —राम + सु, सम्बोधन- में, — हे राम । अङ्गकर्म, अङ्गकर्मन् (सं० क्ली०) अङ्गस्य कर्म, ६ तत् । अङ्गसेवा। हाथ-पैरका मलना । शरीर दबाना । शरीरमें तेल आदि सुगन्धित पदार्थोंका लगाना । अङ्गग्रह (सं० पु० ) अङ्गस्य ग्रहः रोगहेतोर्वेदना, ६-तत् । १ शरीरका दर्द । देहका जकड़ना । २ वह रोग जिसमें जोड़-जोड़ दुखे । अङ्ग-ग्रह कोई ख़ास रोग नहीं, यह दूसरे रोगों- का उपसर्ग मात्र है। कितने ही कारण से अङ्गग्रह होता है । जवानीमें जिन्होंने बराबर कसरत को, प्रौढ़ावस्था आने पर उसके छोड़ देनेसे, उन्हें अङ्गग्रह हो जाता है। गठिया, कमर के दर्द, पुराने उपदंश आदि रोगोंमें बीच-बीच अङ्ग दुखने लगता है । रात- के समयको अथवा पूर्वी हवा लगनेसे गांठमें दर्द बढ़ जाता है। शरीर रोगी रहनेसे थोड़ा भी कुपथ्य -हुआ, कि हाथ-पैर की गांठमें दद होने लगा । मले- |
रिया ज्वरका तो अङ्गग्रह एक प्रधान लक्षण है । ज्वर आने से पहले समस्त शरीर कांपता और ठण्डा पड़ जाता, उसी समय पैर को गांठ और कमर में दर्द होने लगता है । स्नायुशूल रोग में (Neuralgia) कोई स्थान फूलता नहीं, परन्तु हाथ-पैर में सुइयां जैसी चुभा करती हैं। चिकित्सा— चालीस वर्ष से अधिक वयःक्रममें जो सचित वात रोग और उसीके कारण वदनमें दर्द होता है, उसे धन्वन्तरि आकर भी नहीं हटा सकते । इस अवस्थामें थोड़ी अफ़ौमको सेवन करना चाहिये। इससे यद्यपि रोगका प्रतीकार नहीं होता, एक नया उपसर्ग लग जाता और सभी धीरे-धीरे अफ़ीमखोर हो जाते हैं, तथापि यह दोष होते भी, सञ्जित बात रोग में अफोम खानेस े शरीर कितना ही अच्छा रहता है । जो बहुत आलसी हैं, उन्हें सवेरे और सन्ध्याके समय मैदानमें हवा खाना और दिनमें सोना और दही और रात्रिमें अनको भोजन करना तो एकदम ही छोड़ देना चाहिये । हिन्दुओंमें एकादशीके दिवस उपवास करनेको प्रथा है। एकादशीके दिन उपवास करनेसे वात प्रभृति कई रोगमें बड़ा लाभ पहुंचता है । होमियोपैथी — शरीरको एक ओरके स्नायुमें बीच-बीच बहुत तेज दर्द होनेसे आर्सेनिक (Arsenic), कमज़ोर मनुष्यको स्नायुशूल होने से फसफोरस् (Phosphorus), रातके जागरण, ठंडी हवा के सेवन, दुश्चिन्ता आदिके कारण माथेमें दर्द होनेसे ऐकोनाइट् (Aconite) और मलेरियासे उत्पन्न हुए अङ्गग्रहमें चायना (China) देना चाहिये । कैजूपुट तेल मलनेस ऐलोपैथी – युवा और वृद्ध मनुष्योंकी कमर और हाथ-पैरके जोड़में दर्द होनेसे विशेष लाभ होता है। सेवन करनेके लिये दो बूंद एकोनाइट्का अरिष्ट जलके साथ नित्य दो बार देना चाहिये। ऊर्ड्स पातित गन्धक दूधके साथ खानेसे दर्द कितना ही कम हो जाता है । चमड़े के भीतर मर्फियाको पिचकारी मारनेसे भी लाभ होता है । यह चिकित्सा विज्ञ चिकित्सकसे कराना चाहिये । |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१५८
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१५२
अङ्ग अङ्गग्रह