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अजयगढ़-बुंदेलखण्डके अन्तर्गत एक गिरिदुर्ग। यह कालञ्जर पर्वतसे आठ, बांदेसे साढ़े तेईस और प्रयाग से पैंसठ कोस दूर है। अजयगढ़ राज्यका विस्तार ४४७ वर्ग मील है; इसमें ६०८ ग्राम है; सर्वसमेत लोकसंख्या कोई एक लाख होगी। राज्यको वात्मरिक आय दो लाख तीस हजार रुपया है। नये शहरमें अजयगढ़ राज्यकी राजधानी प्रतिष्ठित है। यहां मलेरिया ज्वरका अतिशय प्रादुर्भाव होता है। इस गिरिदुर्गकी उपत्यकामें अनेक प्रकारकी प्रस्तर-मूर्तियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। टूटे मन्दिर, बड़े-बड़े खम्भे और खम्भोंकी चित्रकारी और देवमूर्तियाँ देखनेसे बोध होता है, कि मानो किसी काल में इस जगह जैन-देवालय रहा था। उपत्यका के चढ़ावमें बड़े-बड़े दालान बने और उनमें ५। ६ हाथ ऊचे मोटे-मोटे खम्भे लगे हैं। खम्भों में विचित्र बेल-बूटे खोदे हुए हैं। कार्णिसके ऊपर स्त्रियों की मूर्तियां हैं, जिनको बनावट वहुत ही अच्छो देख पड़ती है। अब इन सकल देवालयों में मनुष्य नहीं केवल वानर और बृहत् बृहत् सर्प रहते हैं। अजयगढ़ देखने में कितना ही कालञ्जर जैसा है। पहाड़पर चढ़नेके पथमें पहले सात हार थे। रामजे साहब जिस समय देखने गये, उस समय चार हार टूटे थे, तोनको अवस्था कुछ कुछ अच्छी थी। हारों के वाम पार्श्वमें दो कुण्ड हैं, जिनका नाम गङ्गा-यमुना पुकारा जाता है। पहले तीर्थयात्री इन कुण्डोंके जलसे स्नानदान करते थे। कालञ्जर पर्वतमें भी ठीक ऐसे ही कुण्ड विद्यमान हैं। कुण्डोंके ऊपर पहाड़में संस्कृत भाषासे कुछ शिलालेख था। उसका कितना हो अंश मिट गया है, कितना हो नहों भौ मिटा ; किन्तु वह स्पष्ट पढ़ा नहीं जा सकता। पर्वतको चढ़ाई में कहीं गणेश, कहीं हनूमान् और कहीं नन्दीको मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। प्रधान हारके कुछ भीतर बड़ा तालाब है। तालाब कुछ उपत्यका और कुछ पहाड़ खोदकर बनाया गया है। इस तालाबसे कुछ दूर एक पुरातन अट्टालिकाका भग्ना |
वशेष देख पड़ता है। अट्टालिकाकी टूटी छतके पास पार्श्वनाथकी कई मूर्तियां बनी हैं। कोई मूर्ति बैठी और कोई खड़ी है। अट्टालिकाके भीतर नेमीनाथकी तीन बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं। मूर्तियां निर्वस्त्र हैं,दोनो हाथों में पद्म विराज रहा है, छातीपर रत्नजटित आभूषण खचित है, शिरके बाल घूंघरवाले और छोटे-छोटे कड़े हैं। अट्टालिकासे कुछ दूर एक बृहत् पुष्करिणी है। पुष्करिणी के किनारे अनेक लिङ्ग और योनिमूर्ति हैं, जिनमें एक गणेश और एक पञ्चानन लिङ्ग भी देखा जाता है। पुष्करिणीसे दक्षिण पञ्चमूर्ति लिङ्ग है और महादेव, पार्वती और नन्दीकी मूर्तियां विराज रही हैं। अजयगढ़ पहले अजयनगर नामसे प्रसिद्ध था।अजयनगरवाले राजा छत्रशालके अपने राज्यको विभाग करनेसे अजयगढ़ जगत्राज के अंशमें आया। सन् १८०३ ई० में पेशवाने ब्रटिश गवर्नमेण्ट के हाथों बुंदेलखण्डके कियदंशको समर्पण किया। इसलिये कर्नल मेसेन्वाक्, जमान् खां और अण्डार्सन अनेक सैन्य ले अजयगढ़को अधिकार करने गये। अंग्रेजों की सैन्य देवग्राम पर्वतके नीचे पहुचनेसे लक्ष्मणदांव नामक अनेक व्यक्तिने हठात् ससैन्य आकर आक्रमण किया। उन्होंने कितनो ही बन्दूकें छीन ली थीं। इस युद्ध में अंगरेजों की विस्तर सैन्य हित और आहत हुई। महा-महा वीर भी शत्रुके सामने स्थिर न रह सकनेसे चारो ओर भाग खड़े हुए। शेषमें मेसेन्वाक्ने जाकर शत्रुओंसे पुनर्वार बन्दूके. छीन ली एवं लक्ष्मणदांवने भी १८,००० रुपया देकर निष्कृति पाई । अब अजयगढ़के राजा अंगरेजोंको कर देते हैं। अजयनद-वीरभूम जिलेमें अजय नामका वृहत् नद है। हज़ारीबाग जिले में यह उत्पन्न हुआ है। इसके वाद सन्थाल परगनेसे कुछ दक्षिण, दक्षिण दिक्से कुछ पूर्वको बहते वीरभूम और वईमानके भीतरसे भेदियाग्राममें इसने प्रवेश किया है। अन्तमें भेदियासे पूर्वमुख आकर कंटोयाके निकट भागीरथौके साथ मिल गया है। इसी नदके उत्तर-कूलमें सुप्रसिद्ध |
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अजयगढ़—अजयनद