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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२९५

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अत्यसम-अत्याल

मालाधर, पृथिवी, शिखरिणी और हरिणी ।इत्यादि।

अत्यसम (सं० त्रि०) बहुत ऊंचा-नौचा, निहायत नाहमवार।

अत्यहम्(सं० त्रि०) मुझसे बढ़कर, मुझसे अफजल।

अत्यह्न (सं० त्रि०) १ एकदिनसे समयमें अधिक, एक रोजसे वक्त में ज्यादा। २ दिनसे भी बढ़कर।

अत्याकार (सं० पु०) अतिशयेन आकारः, अति-आ क-घञ्। १ तिरस्कार, बेइज्जती। २ अपयश, बदनामि अतिशयित आकारः शरीरम्, प्रादि-तत् ।३ प्रकाण्ड शरीर, लम्बा-चौड़ा जिस्म। (त्रि०)अतिशयित आकारः शरीरं यस्य, बहुव्रौ । दीर्घाकार, बृहत्कलेवरविशिष्ट ; कद्दावर।

अत्याग (सं० पु०) न त्याग, त्यज-घञ्; अभावार्थे नञ्-तत्। त्यागाभाव, ग्रहण, न छोड़ना।

अत्यागिन्, अत्यागी (सं० त्रि.) न-त्यज-धिगुन्। जो कर्मको फलाकाङ्क्षा रखके कर्मानुष्ठान करे, त्यागिभिन्न;फायदा उठानेकी तबीयतसे काम करनेवाला, त्याग न करनेवाला, न छोड़नेवाला।

अत्याचार (सं० पु०) नियमातिक्रान्त आचारः,प्रादि-स० । १ आचार-सदाचारका उल्लङ्घन, अन्याय ; ज्यादती, जुल्म। २ असङ्गत आचरण, बुरा चलन।३ यथेच्छाचरण, पाखण्ड ।

अत्याचारी (सं० त्रि०) १ अत्याचार करनेवाला,जालिम। २ ढोंगी, पाखण्डी।

अत्याज्य (सं० त्रि०) न-त्यज अर्हे ण्यत्, न कुत्वम् ।

त्यजिपूज्यीय । (काशिका.)त्यजेरुपसंख्यानम् । ( पतञ्जलिः)

अत्यजनीय, त्यागकरनेके अयोग्य, जो छोड़ा न जा सके।

अत्यादर (स० पु०) अतिशय मान, ज्यादा इज्जत ।

अत्यादान (स० त्रि०) अतिक्रान्तं आदानम्, अतिक्रा०'तत्। १आदान-अतिक्रान्त, बहुत ज्यादा लेनेवाला। (क्लो०) अतिशयितमादानम्, प्रादि 'स०। २ अत्यन्त आदान, बहुत ज्यादा ले लेनेको हालत।

अत्यादित्य ( स० त्रि०) १ सूर्य से बढ़कर, आफताबसे अफजल। २ सूर्यमन्डलको भी उल्लङ्घन करके जानेवाला योगीश्वर।

अत्याधान (स० अव्य०) १ अग्न्याधानके अतिक्रमसे।अति-आ-धा-ल्यु ट्, अतिशयितमाधानम् । (क्ली०)२ ऊपर स्थापन, ऊपरका रखना। ३ अतिक्रमण,लांघ जाना। ४ सम्बन्धमात्र। ज्येष्ठमतिक्रम्य आधानम्, अतिक्रा०-तत् । ५ ज्येष्ठको अतिक्रम कर अग्न्याधान, ज्येष्ठका अग्न्याधान न होते कनिष्ठका अग्न्याधान । यह व्यवहार अत्यन्त शास्त्र-गहित है,-

"अग्रजोऽस्य यदानग्रिरधिकार्योंऽनुजः कथम् । अग्रजानुमतः कुर्यादग्रिहोवं यथाविधि ॥"

अत्यानन्दा (सं० स्त्री०) कफजन्य-योनिरोग-विशेष ।इस रोगके होनेसे स्त्री ग्राम्यधर्मसे सन्तोष नहीं पाती, यानी कितने हो सहवाससे भी वह सन्तुष्ट नहीं होती।

अत्यानन्दा न सन्तोष ग्राम्यधर्न्मेण विन्दति। (भावप्र०)

अत्याप्ति (सं० स्त्री० ) पूर्ण विज्ञप्ति, पूरी पहुंच।

अत्याय (सं० पु०) अति-इण् -ण् । १ अतिक्रम,कसरत। २ अत्यन्तलाभ, अजहद फायदा। (त्रि०)अतिक्रान्तं आयम्, अतिक्रा०-तत्।

श्याद्यधास्रुसंस्रवती णवसावह्रलिहश्र्लिषश्र्लषश्र्वसश्र्च। पा ३।१।१४१।

३ बड़े लाभका,निहायत फायदेमन्द।

अत्यायु (स. क्लो०) अति-आ-या-कु। १ यज्ञीय पात्र- विशेष, एक खास बरतन जो यज्ञमें काम आता है। २ अधिक आयुका पुरुष, वृद्ध ।

अत्यारक्ता (सं० स्त्री०) जवापुष्पवृक्ष, चमेली।

अत्यारूढ़ि (सं० स्त्री०) अति-आ रुह-क्तिन् । १ अतिशय आरोहण, अजहद चढ़ाव। २ अतिशय विख्याति,अज़हद नामवरी,-

"अत्यारूढिर्भवति महतामप्यपभ्रंशहेतुः।” (शकु०)

अत्याल (सं० पु०) अति-आ-अल् अच्, अतिशयेन अलति अचिरेंण समन्तात् पर्याप्नोति। रक्तचित्रक,लालचित्रक। यह सदावसन्तो झाड़ी शिकम और खसियाकी उपत्यकाओंमें स्वतन्त्रभावसे उत्पन्न होती है। इसकी जड़ पीस कर लगानेसे शरीरपर फफोले